Friday, July 30, 2010

शशि प्रकाश मेरे आदर्श थे !

हमने महसूस किया कि शशि प्रकाश का शातिर दिमाग पुनर्जागरण-प्रबोधन की बात करते हुए प्रकाशन और संस्थानों के मालिक बनने की होड़ में लग गया और हमलोग उसके पुर्जे होते गए.मेरा साफ मानना है कि शशि प्रकाश को हीरो बनाने में कुछ हद तक कमेटी के वे साथी भीजिम्मेदार रहे हैं जिन्होंने सब कुछ समझते हुए भी इतने दिनों तक एक क्रांति विरोधी आदमी का साथ दिया.
जय प्रताप सिंह
रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया एक कम्पनी है जो शहीदे आजम भगत सिंह नाम पर युवाओं को भर्ती करती है.इसके लिए कई तरह के अभियानों का नाम भी दिया जाता है. उदाहरण के लिए 'क्रांतिकारी लोग स्वराज अभियान. कार्यकर्ता चार पेज का एक पर्चा लेकर सुबह पांच बजे से लेकर रात 8बजे तककालोनियों, मोहल्लों, ट्रेनों, बसों आदि में घर-घर जाकर कम्पनी के मालिक माननीय श्री श्री शशि प्रकाश जी महाराज द्वारा रटाए गये चंद शब्दों को लोगों के सामने उगल देते हैं । लोग भगत सिंह के नाम पर काफी पैसा भी देते हैं। पैसा कहां जाता था यह सब तो ईमानदार कार्यकर्ताओं के लिए कोई मायने नहीं रखता था लेकिन इतना तो साफ था कि पारिवारिक मंडली ऐशो आराम की चीजों का उपभोग करती थी । उदाहरण के लिए लखनऊ और दिल्ली केपाश इलाके में रहने, और उनके बेटे जिन्हें भविष्य के लेनिन के नाम से नवाजा जाता था, उसके लिए महंगा से महंगा म्यूजिक सिस्टम, गिटार आदि उपलब्ध कराया जाता था।
इसी संगठन के एक हिस्सा थे कामरेड अरविन्द जो अब नहीं रहे। अरविंद एक अच्च्छे मार्क्सवादी थे, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी संगठन का मुखर विरोध नहीं करते थे,जो उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। अरविंद चूंकि जन संगठनों से जुड़े हुए थे और जनसंघर्षों का नेत्रृत्व भीकरते थे इसलिए कार्यकर्ताओं के दिल की बात को बखूबी समझते थे। कभी-कभी शशि प्रकाश से हिम्मत करके चर्चा भी करते थे। लेकिन शशि प्रकाश के पास से लौटने के बाद अरविंद उन्हीं सवालों को जायज कहते जिन संदेहों पर हमलोग सवाल उठाये होते. हालाँकि वह बातें उनके दिल से नहीं निकलती थी क्योंकि ऐसे समय में वह आंख मिलाकर बात नहीं करते थे। और फिर लोगों से उनके घरपरिवार और ब्यक्तिगत संबंधों की बातें करने लग जाते थे।
बाद में पता चला कि शशि प्रकाश और कात्यायनी के सामने अरविंद जब संगठन की गलत लाइन पर सवाल उठाते हुए कार्याकर्ताओं के सवालों को अक्षरश:रखते थे तो शशिप्रकाश इसे आदर्शवाद का नाम देकर उनकी जमकर आलोचना करते। उसके ठीक बाद अरविन्द को बिगुल, दायित्ववोध पत्रिकाओं के लिए लेख आदि का काम करने में शशि प्रकाश लगा देते.
वैसे एक बात बताते चलें कि इस दुकान रूपी संगठन में जब भी कोई साथी अपना स्वास्थ्य खराब होने की बात करता तो उसे उसकी ऐसे खिल्ली उड़ाई जाती थीकि वह दोबारा चाहे जितना भी बीमार हो उल्लेख नहीं करता था। इस संगठन में आराम तो हराम था। शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि दिन रात काम करते रहने के कारण साथी अरविंद का शरीर रोगग्रस्त हो गया। दवा के नाम पर मात्र कुछ मामूली दवाएं ही उनके पास होती थीं। इससे अधिक के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे क्योंकि महंगे अस्पतालों में जा कर इलाज कराने का अधिकारतो शशि प्रकाश एंड कम्पनी को ही था।
जवाब दीजिये: हिंदी कवयित्री का सांगठनिक चरित्र
शशि प्रकाश के आंख का इलाज अमेरिका में होता था। सबसे दु:ख की बात तो यह थी कि इस क्रांति विरोधी आदमी के इलाज में जो पैसा खर्च होता था वह उन मजदूरों का होता था जो अपनीरोटी के एक टुकड़ों में से अपनी मुक्ति के लिए लड़े जा रहे आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करते थे।
जहां-जहां अरविंद ने नेत्रृत्वकारी के रूप में काम किया, वहां-वहां सेउन्हें मोर्चे पर फेल हो जाना बताते हुए हटा दिया गया। अंत में उन्हें गोरखपुर के सांस्कृतिक कुटीर में अकेले सोचने के लिए पटक दिया गया। यहां तक कि उस खतरनाक बीमारी के दौरान जब किसी अपने की जरूरत होती है उस समयसाथी अरविंद अकेले उस मकान में अनुवाद कर रहे थे और दायित्वबोध और बिगुल के लिए लेख लिख रहे थे। उधर उनकी पत्नी मीनाक्षी दिल्ली के एक फ्लैट में रहकर युद्ध चला रही थीं। उन्होंने दिल्ली का फ्लैट छोड़कर अरविन्द के पास आना गवारा नहीं समझा या फिर शशि प्रकाश ने उन्हें अरविन्द के पासजाने नहीं दिया। यहां तक की किसी अन्य वरिष्ठ साथी तक को साथी अरविन्द के पास नहीं भेजा। जिस समय हमारा साथी अल्सर के दर्द से तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहा था उस समय उनके पास एक-दो नये साथी ही थे। इन सब चीजों पर अगर गौर करें तो शशि प्रकाशको अरविन्द का हत्यारा नहीं तो और क्या कहा जाएगा?
मेरा मानना है है कि शशि प्रकाश ने बहुत सोच-समझकर अरविन्द को धीमी मौत के हवाले किया था.क्योंकि वरिष्ठ साथियों और संगठनकर्ता में वही अब अकेले बचे थे। और सही मायने में उनके पास मजदूर वर्ग के बीच के कामों का शशि प्रकाश से ज्यादा अनुभव था।
मैं भी इस संगठन में 1998 से लेकर 2006 तक बतौर होलटाइमर के रूप में काम किया हूं। इस दौरान संगठन की पूरी राजनीति को जाना और समझा भी। हमने महसूस किया कि शशि प्रकाश का शातिर दिमाग पुनर्जागरण-प्रबोधन की बात करते हुए प्रकाशन और संस्थानों के मालिक बनने की होड़ में लग गया और हमलोग उसके पुर्जे होते गए. मेरा साफ मानना है कि शशि प्रकाश को हीरो बनाने में कुछ हद तक कमेटी के वे साथी भीजिम्मेदार रहे हैं जिन्होंने सब कुछ समझते हुए भी इतने दिनों तक एक क्रांति विरोधी आदमी का साथ दिया.
ऐसे साथियों का इतने दिनों तक जुडऩे का एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जिस मध्यवर्गीय परिवेश से आये थे वह परिवेश ही रोके रहा हो. शशि प्रकाश के शब्दों में-हमें सर्वहारा के बीच रह कर सर्वहारा नहीं बन जाना चाहिए बल्कि हम उन्हे उन्नत संस्कृति की ओर ले जाएंगे। इसके लिए कमेटी व उच्च घराने से आये हुए लोगों को ब्रांडेड जींस और टीशर्ट तक पहनने के लिए प्रेरित किया जाता रहा है। ऐसा इसलिए कि शशि प्रकाश और कात्यायनी भी उच्च मध्यवर्गीय जीवन जी रहे थे। कोई उन पर सवाल न उठाए इसलिए कमेटी के अन्य साथियों के आगे भी थोड़ा सा जूठन फेंक दिया जाता रहा है। कई कमेटी के साथी शशि प्रकाश और उनके कुनबे के उतारे कपड़े पहनकर धन्य हो जाते थे। यह रोग आगे चल कर ईमानदार साथियों में भी घर कर गया और वे सुविधाभोगी होते गये।
यह भी एक सच्चाई है कि किसी को अंधेरे में रख कर गलत रास्ते पर नहीं चला जा सकता। यही कारण रहा कि शशि प्रकाश को जब भी लगा कि अब तो फलां कार्यकर्ता या कमेठी सदस्य भी सयाना हो गया और हमारे ऊपर सवाल उठाएगा तो उन सबको किनारे लगाने का तरीका अख्तियार किया। इतना तो वह समझ ही गए थे कि इन लोगों को इस कदर सुविधाभोगी बना दिया है कि अपनी सुविधाओं को ही जुटाने में लगे रहेंगे.
शशि प्रकाश इस बात को जीतें हैं कि समाज के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों में ख्याति तो ही गयी है,लोग आते रहेंगे, दुकान से जुड़ते रहेंग। रही बात कार्यकर्ताओं की तो वे चाहे ज्यादा दिनों तक रुकें या न रुकें फिर भी जितना दिन रुकेंगे भीख मांग कर लाएंगे ही और उसकी झोली भरकर चले जाएंगे। कुल मिला कर शशि प्रकाश एंड कंपनी अपनी सोच में कामयाब हो गयी है।
इसमें मैं भी अपने आप को साफ सुथरा नहीं मानता क्योंकि जब यह संगठन इतना ही मानव द्रोही था तो इतने दिनों तक मैंने काम ही क्यों किया? मैं भी सिद्धार्थ नगर जिले के ग्रामीण परिवेश से आया और भगत सिंह की सोच को आगे बढ़ाने के नाम पर देश में एक क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करने के लिए काम में जुट गया। इसके लिए मैंने ज्यादा पढऩा लिखना उचित नहीं समझा। मुझे यहशिक्षा भी मिली कि पढऩा लिखना तो बुद्धिजीवियों का काम है। हमें संगठन के लिए अधिक से अधिक पैसा जुटाना और युवाओं को संगठन से जोडऩा है। और मैंइसी काम में लग गया। मुझे संगठन की ओर से घर भी छोडवा़ दिया गया और मर्यादपुर में तीन सालों तक रहकर देहाती मजदूर किसान यूनियन,नारी सभा औरनौजवान भारत सभा के नाम पर काम करने के लिए लगा दिया गया। पीछे के सारे रिश्ते नाते एवं घर परिवार से संगठन ने विरोध करवा दिया जिससे कि हम बहुत जल्द वापस न जा पाएं। यही नहीं बल्कि अपना घर और जमीन बेचने के लिए अपने ही पिता के खिलाफ कोर्ट में केस भी लगभग करवा ही दिया गया था। लेकिन पता नहीं क्यों (शायद मैं अभी पूरी तरह उसकी गिरफ्त में नहीं आया था),मेरा मन ऐसा करने को नहीं हुआ।
मैं शशि प्रकाश को ही आदर्श मानता था। मुझे यह शिक्षा दी गयी थी कि भाईसाहब दुनिया में चौथी खोपड़ी हैं। मेरे अंदरयह सवाल कई बार उठा कि जब यह चौथी खोपड़ी हैं तो प्रथम, दूसरी और तीसरी खोपड़ी कौन है? बाद में पता चला कि पहली खोपड़ी मार्क्स थे,दूसरी लेनिन,तीसरी खोपड़ी माओ थे। अब माओ के बाद तो कोई हुआ नहीं। इसलिए चौथी खोपड़ी भाई साहब हुए न।
भाईसाहब कहते थे कि वही एक क्रांतिकारी संगठन है। बाकी तो दुस्साहसवादी और संशोधनवादी पार्टियां हैं। लेकिन सब्र का बांध तो एक दिन टूटना ही था। जो आप के सामने है। यदि इन सबके बावजूद कहीं कोने में भी इस मानव विरोधी संगठन को सहयोग देने के बारे में आप में से कोई सोच रहा है तो उसे बर्बाद होने से कौन रोक सकता है?

Tuesday, July 20, 2010

भीख मांगते वनवासी

-अनिल दूबे, जौनपुर
पिछले दिनों जब मैं उत्तर प्रदेश स्थित जौनपुर जिले के अंतर्गत सुजानगंज के भुइधरा गांव लौटा तो वहां की स्थिति देखकर दंग रह गया। ब्राह्मण बाहुल्य इस गंाव में कई अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं, जो इस व्यथा को दर्शाता है कि जाति सदैव कर्म से जुड़ी होती है। आप सिर्फ अपनी जाति द्वारा किया गया कार्य ही कर सकते हैं। खैर बढ़ती जनसंख्या एवं घटते संसाधनों ने अधिकतर नौजवानों को बड़े शहरों में जाकर कमाने के लिए मजबूर कर दिया है। गांवों में बस बूढ़े मां-बाप ही बाकी बचे हैं। इसी गांव में एक जाति है वनवासी, हालांकि उन्हें मुसहरा के नाम से भी पुकारा जाता है। गांव में बिजली, सड़क, परिवहन, विद्यालय आदि का विकास हुआ या नहीं, यह नहीं कह सकते लेकिन एक कार्य अवश्य देखने को मिला है कि पहले जहां शादी या भोज के अवसर पर लोग पत्तलों में भोजन करते थे और मिट्टी के कुल्हड़ों में पानी पीते थे। वहीं अब बाजार से खरीदे गए प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ढाक एवं बरगद के पत्तों से पत्तल बनाने वाले बनवासियों के जीवन पर संकट के बादल छा गये हैं। ऐसे बादल जो शायद इस जाति के समाप्त होने पर ही हटेंगें।
एक माह पूर्व मैं सुजानगंज स्थित एक मंदिर में अपनी माताजी के साथ दर्शन के लिए गया था। मंदिर से निकलते ही सीढिय़ों पर बैठा भीखरियों का हुजूम हमारी ओर बढ़ता चला आया। मैं जैसे ही दो कदम आगे को बढ़ाया कि भिखारियों का एक परिवार जिसमें दो औरतें एक बूढ़ा और दो बच्चे हमारी तरफ आये। माताजी ने उनसे कहा कि फूटकर पैसे समाप्त हो गये हैं। इस पर एक भिखारी ने कहा कि आपने हमें पहचाना नहीं, हम आपके गांव के बनवासी हैं। माताजी ने दस रुपये के सिक्के को उन्हीं लोगों के बीच में बांट दिया।
जब परिवार के अन्य सदस्य अन्य समानों की खरीदारी में लगे हुए थे, उस समय मैंने उनसे उनकी समस्या को जानने की कोशिश की। जो कुछ उन्होंने बताया उसे सुनकर बड़ा अचंभा हुआ।
उन्होनें बाताया कि अपने पूर्वजों की तरह ढाक एवं बरगद के पत्तों से पत्तल बनाने, खलिहानी खत्म होने पर खेतों में पड़े अन्न को बीनने एवं भोज कार्य में कुत्तों से भोजन छीन कर जीवन निर्वाह करते थे। इसमें सबसे मुख्य कार्य पत्तल बनाकर बेचना था जिसमें 20 से 25 रुपये में 100 पत्तल और दोने दिये जाते थे, लेकिन पिछले दो सालों में शहर की हवा गांवों में पहुंच चुकी थी। लोग पत्तलों की बजाय प्लास्टिक के बर्तनों, जो 200 रुपये सैकड़ा था, का प्रयोग करना शुरू कर दिया। ऐसे में बनवासियों के दोने और पत्तल कौन खरीदता। जिसका सीधा असर उनके वर्तमान स्थिति से जुड़ा था। चूंकि बनवासी होने के कारण वे अन्य कार्य करने के लिए निषेध थे। गरीबी और भुखमरी के कारण उनके बच्चे कुपोषण के शिकार हो गये या असमय बूढ़े हो गये। वे काम की तलाश में आसपास के शहरों में पलायन कर चुके हैं। पिछे रह गये घर के बुजुर्ग, औरतें और बच्चे जो अब मंदिरों या गलियों में भीख मांग कर अपना तथा अपने परिवार का पेट भर रहे हैं।
जो सबसे बड़ा प्रश्न है वह यह है कि बनवासीयों की व्यथा के लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, प्रशासन या हम सभी। वैसे तो हम सभी शामिल हैं। बनवासी हमसे कुछ नही मांगते और न ही हमे दोष देते हैं। वे अपने बच्चों के लिए शिक्षा और बीमारी से मर रहे बुजुर्गों के लिए दवाइया व ईलाज पैसे भी नहीं मांगते। उन्हें सिर्फ पेटभर भोजन चाहिए, क्यों न दिन में एक बार ही मिले। लानत है, इस व्यवस्था, प्रशासन और समाज पर जो उन्हें पेट भर भोजन मुहैया नहीं करा सकता। मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि कल अगर मेरे अपने गांव से एक और नक्सलबाड़ी आंदोलन का उदय होता है, क्योंकि हमारी आदत बन चुकी है कि जब तक हमें चोट नहीं लगती तब तक हमें दूसरों के दर्द का एहसास नहीं होता, जब तक हमारे कान में कोई जोर से न चिल्लाये हमें सुनाई नहीं देता। हम सो नहीं रहे, सोने का नाटक कर रहे हैं। हम देख नहीं पा रहे बल्कि हम देखना नहीं चाहते। अब भी समय है हम नहीं चेते तो बहुत देर हो जायेगी। इस जाति व्यवस्था के चक्कर में हम एक जनजाति की बली नहीं ले सकते। किसी भी तरह गांव के लोगों को समझना होगा कि प्लास्टिक का बर्तन न केवल बनवासियों के जीवन पर मृत्यू बनकर छाया है बल्कि पर्यावरण के लिए भी घातक है। बनवासियों हिम्मत मत हारना, हमे तुम्हारी आवष्कता है, कोशिश जारी है। तबाही की गर्त में जाने वाले अकेले तुम ही नहीं हो बल्कि हम सभी हैं। यह व्यवस्था खुद-ब खुद हमें तबाही गर्त की ओर ले जाने का प्रयास कर रही है। हमें इस व्यवस्था, इस समाज को ही बदलना होगा।

Saturday, July 17, 2010

अहा! कितने मजेदार थे वे दिन

गांव के बच्चे मुंह अंधेरे जानवरों को लेकर खेत में निकल जाया करते थे और देर शाम तक तरह-तरह का खेल खेलते रहते थे। उस समय किसी-किसी गांव में टीवी हुआ करता था। जो आम लोगों की पहुंच से बहुत दूर था। इसके बावजूद मनोरंजन के अनेक साधन थे। कठघोड़वा नाच, चंगेरा अदि तरह के नामों से विशेष मौकों पर प्रदॢशत करते थे, जिसे लोग काफी आनंद के साथ देखते थे। कुछ और भी उन्नत किस्म के कलाकार नौटंकी नाच का भी प्रदर्शन करते थे। जिसमें हारमोनियम, ढोलक के साथ-साथ नगाड़ा आदि वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता था, जिसकी आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती थी। नौटंकी करवाने के लिए लोगों को अधिक पैसा खर्च करना पड़ता था। यही कारण था कि चंगेरा और कठघोड़वा आदि को लोग ज्यादातर पसंद करते थे। चंगेरा तो गांवों के ही कुछ लोग मिल कर आयोजित करते थे। इस ड्रामा में गांवों में प्रचलित पौराणिक कथाएं जैसे सती बिहुला, बालेलखंदर आदि का मंचन किया जाता था, जिसका गांववाले भरपूर आनंद लेते थे। कठघोड़वा में मात्र तीन-चार कलाकार होते थे। उसमें से एक कलाकार काठ के बने घोड़े के अंदर खड़ा होकर अपना हावभाव घोड़े के आकार में बना कर नाचना शुरू कर देता था। बाकी कलाकार वाद्य यंत्र बजाने के साथ-साथ सुर व ताल मिलाकर समूह गीत गाते थे। जोकर तो अक्सर सभी नौटंकी में होता था जो गांवों की बुराइयों पर कमेंट कर लोगों को हंसाता रहता था। उसका एक कमेंट तो अभी भी नहीं भूलता हूं। हुआ यह कि नाटक की शुरुआत में देवी-देवताओं की जय-जयकार होती थी। उसी प्रकृया में जोकर ने शंकर भगवान की जय, गऊ माता की जय के नारे लगाते-लगाते सांड़ बप्पा की जय के नारे भी लगा दिया। आवेश में आ कर दर्शक भी सांड़ बप्पा की जय के नारे लगाए। अचानक लोग चौंक पड़े कि यह क्या है? बिना देर किये लोग जोकर पर टूट पड़े और वह अपना आंसू पोछ कर सफाई देते हुए कहा कि जब गऊ माता हो सकती हैं तो सांड़ बप्पा क्यों नहीं? कुछ लोग ठहाका मार कर हंसने हंस दिये। इसके बाद लोग सबकुछ भूलकर ड्रामा देखने में मस्त हो गये थे। इसको देखने के लिए दूर-दूर के गांवों तक जाना पड़ता था। काफी रोने-धोने के बावजूद अनुमति नहीं मिलती थी। लेकिन किसी भी कीमत पर देखना तो था ही, चाहे जो कुछ भी हो जाए। शाम को ही यह तय कर लिया जाता था कि भोजन करने के बाद जब सब लोग सो जाएंगे तो हम गांव के नुक्कड़ पर मिलेंगे। बनी-बनाई तरकीब के तहत रात में भागकर दूर-दराज के गांवों में नाच दखने के लिए चले जाते थे।
दादा की भूतों की कहानियां
बच्चों को डराने के लिए दादा भूतों की मनगढ़ंत कहानियां सुनाया करते थे। एक बार तो उन्होंने अति ही कर दिया था। वह कह रहे थे कि बागीचे में आज एक भूत मिला था और वह खैनी मांग रहा था, लेकिन उसको मैंने खैनी नहीं दी। क्योंकि खैनी को हाथ में देने पर भूत पकड़ लेता है। इस बात को सोच कर डर तो बहुत लगता था, लेकिन नाच देखने के समय सारे डर हवा हो जाते थे। मैं दादा जी के पास इसलिए सोता था कि वह रात में छोटी-बड़ी कहानियां सुनाया करते थे। वह दिन भर की भागदौड़ के बाद जल्दी ही सो जाते थे। जैसे ही उनका नाक बजना शुरू होता कि मैं उठकर मित्रों द्वारा तय किये गए जगह पर पहुंच जाता और नाच देखकर मुंह अंधेरे वापस आकर सो जाता था। किसी को पता तक नहीं चलता। लेकिन कभी-कभार पकड़ भी लिए जाते थे।
जब जाते थे भैंस को चराने
भैंसों को चराने का मात्र एक बहाना था। मुख्य काम तो रात को देखी हुई नौटंकी का नकल करके खेतों में ही ड्रामा करने का होता था। घरवालों को पता चलने पर पिटाई भी होती थी। उनका कहना था कि ऊंची जातियों के लड़के यह सब खेल नहीं खेलते। वे जितना ही रोकने की कोशिश करते खेलने की लालसा उतनी ही अधिक बढ़ती जाती थी। एक मोटी सी लाठी लेकर भैंस पर ऐसे बैठते थे जैसे कि हाथ में तलवार लिए कोई राजा हाथी पर सवार हो। कभी-कभी तो भूल ही जाते थे कि हम भैंस पर बैठे हैं और हाथी के ख्वाबों में खो जाते थे। अचानक भैंस को पोखर का याद आता था और वह दौडऩा शुरू कर देती थी। उसके भागने की देर थी कि मैं जमीन पर चारो खने चित हो जता था। जब तक मैं संभलता कि भैंस पोखर में डुबकी लगा रही होती थी। खेतों में डाक्टर तो हाते नहीं थे इसलिए अन्य साथी ही शरीर को इधर-उधर खींच-तान करके सही कर देते थे। क्योंकि वही एक मात्र दवा थी। चोट कितना भी हो डाक्टर के पास बहुत ही कम जाना पड़ता था। आसपास कोई सरकारी अस्पताल भी नहीं होता था। जो था भी उसमें डाक्टर ही नहीं होते थे। इस बात की जानकारी घर वालों को होने पर ऊपर से डांट भी पड़ती थी।
स्कूलों में पढऩे जाने का था अपना मजा
गांवों में बहुत सारे बच्चे होते थे, जो साथ में प्राइमरी स्कूल में पढऩे जाते थे। हमारे गांव से डेढ़ किलो मीटर दूर दूसरे गांव में एक ही प्राइमरी स्कूल था। उसमें भी दक्षिण टोला के बहुत ही कम बच्चे पढऩे जाते थे। उनके पास फीस देने के लिए पैसे नहीं होते थे। उनका कहना था कि हम पढ़ कर क्या करेंगे, भगवान ने तो हमें हरवाही करने के लिए ही बनाया है। जब बाप-दादा हरवाही कर रहे हैं तो हमें करने में क्या दिक्कत है। सवर्णों के लड़कों के साथ-साथ कुछ अन्य जाति के लोग भी शामिल हो जाते थे। जात-पात भूलकर साथ-साथ स्कूल जाते थे।
पटरी पर छपते थे गोल-गोल चमकते अक्षर
स्कूल जाते समय सभी के हाथ में एक ही तरह की लकड़ी की पटरी हुआ करती थी। तब एक से पांचवीं तक की पढ़ाई में स्याही का इस्तेमाल नहीं होता था। दवात में खडिय़ा घोलकर नरकट के कलम से लिखा जाता था। फिर पटरी को कलर किया जाता था। जो तवे के नीचे पड़े कालिख या भूजा भूनने वाले हंडी के नीचे की कालिख का प्रयोग होता था। लोग अपनी-अपनी पटरी की सुंदरता निखारने में पीछे नहीं रहते थे। उसके लिए कांच की दवात से पटरी को रगड़ा जाता था। दवात को रगडऩे से पटरी में चमक आ जाती थी, और उसपर लिखने से अक्षर निखर जाते थे। स्कूलों में अलग-अलग गांवों के गुट हुआ करते थे। हफ्ते दस दिन में इन गुटों में एक बार भिड़ंत जरूर होती थी। इन संघर्षों का एक मात्र हथियार होता था पटरी, जिससे लोगों का सिर भी फट जाता था। लेकिन दो-तीन दिन बाद ही एक-दूसरे के साथ बैठकर दोपहर के खाने का लुत्फ लिया जाता था।
जब स्कूल में बेहया के डंडे से हुई पिटाई
एक बार स्कूल में बहुत देर से पहुंचा। और उस समय मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे-बैठे ऊंघ रहे थे। वहां पर पहुंचते ही एक लड़के से मेरी लड़ाई हो गई और मास्टर साहब की नींद हराम हो गई। उन्होंने आव देखा न ताव और बेहया (एक प्रकार का पौधा) के डंडे से मेरी जमकर पिटाई कर दी। वे पिटाई बंद नहीं करने वाले थे लेकिन अफसोस कि मास्टर साहब का डंडा टूट गया और मैं बच गया। वैसे मास्टर साहब बहुत मारते थे। इसी डर से कुछ लोग उनके हाथ-पांव भी दबाते थे। दलित बच्चों के साथ मास्टर का नजरिया कुछ और ही था वे हर वक्त बच्चों को उनके दलित होने का एहसास दिलाते थे। मास्टर भी ज्यादातर सवर्ण होते थे। पढ़ाई के समय बच्चों को खेतों से मूंगफली लाने के लिए भेज दिया करते थे। पढ़ाते-पढ़ाते मास्टर साहब सो जाते थे। बच्चे इसका फायदा उठाकर खेलने निकल जाते थे। वे तबतक खेलते रहते थे जबतक कि मास्टर साहब के हाथ में बेहया का डंडा नहीं लहराता। छुट्टी होने से एक घंटा पहले स्कूल के सभी बच्चे गोलाई में बैठ जाते थे और जोर-जोर से गिनती गिनते थे। वह भी गाने की तर्ज पर। इसकी आवाज इतनी तेज होती थी कि गांव तक सुनाई देती थी। घंटी बजते ही घर की तरफ भागते थे। रूखा-सूखा खाने के तुरंत बाद ही गांव के बीचो-बीच खाली पड़े मैदान में कंचा खेलने निकल जाते थे।
छोटे-छोटे बेलों से खेलते थे गोली
कंचा खेलने के लिए कांच की गोलियां हमारे पहुंच से बहुत दूर थीं। इसकी जगह बगिया में से छोटे-छोटे बेल को तोड़कर उसी से खेलते थे, जिसमें बड़ा मजा आता था। छुट्टियों में तो खेलते-खेलते पूरा दिन बीत जाता था। बेलों को टकराने से कई-कई बेल टूट जाते थे और दोबारा बगिया में जा कर पेड़ों से बेल तोड़ लाते थे और फिर जुट जाते थे ङ्क्षजदगी के महत्वपूर्ण खेलों में। भइया या बाबूजी के पहुंचने पर नौ-दो ग्यारह हो जाते थे। बाद में पकड़े जाने पर मारने-पीटने के बाद हाथ में किताब पकड़ा कर बैठा दिया जाता था। लेकिन दूसरे दिन फिर वही प्रकृया शुरू हो जाती थी।
जब लटक रहे थे पीले-पीले आम
छुट्टियों में जब आम पकने का समय होता था तो उस समय बच्चे कभी-कभार ही घर पर दिखते थे। पूरा समय वे छोटे-छोटे पेड़ों पर चढ़ कर आम को तोड़ते और नमक के साथ चटकारे ले-लेकर पेड़ों की टहनियों पर लटक कर लखनी खेलते थे। उस समय लखनी और चिक्का दो ही मुख्य खेल था। चिक्का तो बहुत ही खतरनाक खेल होता था जिसमें चोट लगना आम बात थी। लेकिन फिर भी खेल बहुत ही मजेदार होता था। उसमें जमीन पर गोलाई लिए हुए एक जगह बनाई जाती थी और लकीर के बाहर के व्यक्ति के पैर में पैर से मारा जाता था। देर शाम को घर लौटते थे। उस समय घर पर कभी-कभी ही मार खानी पड़ती थी। क्योंकि लौटते समय कुछ आम बड़े भाई को दे देते थे, जिसे खाने में ही वे मस्त हो जाते थे। उस समय एक-दूसरे के पेड़ों से आम तोड़कर खाते थे। गिरे हुए आम को खाने के लिए कोई बोलता नहीं था। यहां तक की लोग बगीचे को बेचते भी नहीं थे। धीरे-धीरे पूरा का पूरा बागीचा सूना होता गया। लोग पेड़ों को काटकर खेती करने लगे। कुछ लोग खेतों में कलमी आम लगाने लगे जो बौर लगते ही पूरा बागीचा बेच देते थे। अब तो देसी आमों के बगीचे गांवों में इक्के-दुक्के ही नजर आते हैं। जो बचे-खुचे हैं वे पर्यावरण की मार झेल रहे हैं और एक भी फल नहीं देते।
जब पिछवाड़े चिपक जाती थीं जोंकें
हमारे गांव में कई-कई पोखर थे। उन पोखरों में हमेशा पानी भरा रहता था। जिसमें भैंसों को नहलाते थे। भैंसें जबतक पानी में डूबी रहती थीं तबतक हम लोग भी पानी में डूब कर तमाम तरह के खेल खेलते रहते थे। कुछ बच्चे तो तैरना सीखते थे। कई-कई लोग तो पानी के ऊपर तैरने वाले विशेष किस्म के एक जाति के कीड़े को पानी के साथ घोंट जाते थे। बच्चों का मानना था कि इन कीड़ों को जिंदा पी जाने से शीघ्र तैरना आ जाता है। लेकिन ढेर सारे जिंदा कीड़े पानी के साथ घोंट जाने के बावजूद मुझे कभी भी तैरने नहीं आया। नहाते वक्त सारे बच्चे बिलकुल प्राकृतिक अवस्था में होते थे, जिसका फायदा उठाकर पिछवाड़े जोंकें चिपक कर खून चूसने में मस्त हो जाती थीं। खुजली होते ही हम समझ जाते थे कि मामला कुछ गड़बड़ है। भागकर पानी से बाहर आते और उन्हें एक-एक कर निकाल फेंकते। कपड़े पहन कर भैंसों को लेकर घर वापस आ जाते थे।
तीज-त्योहारों में आता था खूब मजा
तीज त्योहार में तो बहुत ही आनंद आता था। खासकर होली और दिवाली में। होली की तो एक महीने पहले से ही तैयारी चलती थी। पंद्रह दिन पहले से ही सम्मत गाडऩे के बाद उस पर खर-पतवार रखने की तैयारी होती थी। गांवों के लगभग सारे लोगों की भागीदारी होती थी। जिस रात होलिका दहन का समय होता था, उस रात तो सोना भी हराम था। लोगों के उपले, खर-पतवार यहां तक की छप्पर तक भी सम्मत के हवाले कर दिया जाता था। लोग एक-दो दिन गाली-गुप्ता करके फिर सामान्य हो जाते थे। होलिका दहन के बाद गांव के बच्चे/बुजुर्ग हारमोनियम, ढोलक, तबला आदि वाद्य यंत्र लेकर होलिका गीत गाते थे। उस दिन सारे गिले-शिकवे माफ होते थे। सुबेरे लोगों के नाबदान तक में कीचड़ और पानी नहीं बचता था। लोग इसी से होली खेलते और एक-दूसरे को पकड़कर कीचड़ में सराबोर हो जाते थे। उस समय रंग का बहुत कम चलन था। लोग रंग में पैसा खर्च करना मुनासिब नहीं समझते थे। होली खेलने के बाद घर-घर जाकर होली गीत गाते, होली खेलते और लोगों से गुड़ और कुछ राशन इक_ा कर शाम को सामूहिक भोज करते थे। उस समय लोग भंग के रस में सराबोर रहते। किसी का भी परिवार भंग पीने के लिए मारता-पीटता नहीं था। यही नहीं बल्कि दीपावली में भी लोग एक-दूसरे के घर जा कर पटाखा फोड़ते और अधिकार पूर्वक पकौड़े, गुलगुले, पूड़ी आदि मीठे पकवान मांग-मांग कर खाते थे। ऐसा करने में लोग अपने को बहुत खुशनशीब समझते थे। लेकिन एक बात तो थी कि इस तरह के माहौल की वजह से लोगों की चेतना भी पुरानी मुल्य मान्यताओं पर आधारित थी। शहर की तरफ जाना लोग मुनाशिब नहीं समझते थे। मां-बाप भी अपने बेटे को आंखों से ओझल नहीं होने देते थे। यही कारण था कि लोगों में काफी हद तक अशिक्षा मौजूद थी।
काका-काकी और दादा-दादी का प्यार
अब तो काका-काकी और दादा-दादी का प्यार भी पैसों के तराजू में तौला जाने लगा है। उस समय आपसी प्रेम-भाव होने के बावजूद जातीयता हाबी थी। मजाल क्या कि कोई ऊंची जाति वालों के सामने चारपाई पर बैठ जाये। काम की मनाही करने पर उसकी पिटाई भी कर दी जाती थी। लोगों से काफी हद तक बेगार भी करवाया जाता था। अब तो जातियता के नाम पर केवल दिखावा मात्र ही रह गया है। गांवों में पुराने मूल्य मान्यताओं को मानने वाले बहुत ही कम लोग रह गये हैं। सवर्ण भी अब दलितों के घरों पर बैठ कर पानी पीते हैं। वहां उनके लिए अलग से कुर्सी नहीं बल्कि उसी चारपाई पर साथ-साथ बैठते हैं। बच्चे तो एक-दूसरे के साथ सामान्य रूप से झगड़ लेते हैं। जो पहले नामुमकिन था। ऐसा बदलाव बहुत ही जरूरी था। लेकिन इसके साथ-साथ लोगों के यहां आना-जाना भी बंद हो गया। जो लोग जाते हैं उनके बारे में कहा जाता था कि जरूर इनको कोई मतलब होगा।
ठंडक में जब कौड़े पर जमती थी मंडली
पहले ठंडक के समय में लोगों के दरवाजे पर कौड़ा रखा जाता था जहां पर हमेशा सुबह-शाम आग जलती रहती थी। गांव के बुजुर्ग वहां पर बैठकर गांव की राजनीति पर बहस करते थे। मजेदार बात तो यह होती थी कि सभी लोग बैठकर किस्से कहानी गढ़ते रहते थे। उसमें से जो पहले चला जाता था उसकी वहां पर उपस्थित लोग बुराई करने में जुट जाते थे। फिर दूसरे के जाने के बाद बाकी लोग उसे भी नहीं छोड़ते। यह प्रकृया तबतक चलती रहती थी जबतक की कौड़े पर एक आदमी बचता है। वह बची-खुची बुराइयों को कौड़ा में राख से अगले दिन तक ढक देता और बिस्तर पर जा कर सो जाता। यही नहीं बल्कि वह सूचना के आदान-प्रदान का भी एक जगह हुआ करता था। उससे लोगों के अंदर एक-दूसरे के प्रति प्रेम की भावना भी उत्पन्न होती थी। यह भी अब खत्म हो गया।
जब बढऩे लगी लोगों में दूरियां
जैसे-जैसे हम बड़े होते गये। वैसे-वैसे गांव के बच्चों से दूरियां बढ़ती गयीं। कई ऐसे बच्चे थे जो 6वीं, 7वीं तक पढऩे में काफी तेज थे। लेकिन अब उनके मां-बाप इससे आगे पढ़ाने में असमर्थ थे। बचपन में ही रोटी-रोजी के लिए उन्हें शहर में जाकर मजदूरी करनी पड़ी। गांव की खेती बिलकुल तबाही की कगार पर पहुंच गयी थी। जिनके पास ज्यादा खेती थी वे उसका कुछ ही हिस्से पर किसानी कर रहे थे क्योंकि खाद-बीज इतना महंगा होता जा रहा था कि उसके लिए बाहर की कमाई की जरूरत थी। जो बहुत ही कम लोगों के पास थी। अनाज भी लोगों को बाजार से खरीदना पड़ रहा था। धीरे-धीरे बाजार व्यवस्था गांवों में पैठ बनानी शुरू कर दी। खेती भी बाजार के हिसाब से होने लगी। जिनके पास पैसा था वे अच्छा खाशा पैदावार काटते थे और बाकी लोगों के खाने के लाले पड़ जाते थे। यही कारण था कि लोग शहरों की तरफ पलायन करना शुरू कर दिए। बच्चों के बीच में भी खाई पैदा हो गयी है। कुछ लोग तो शिर्फ छुट्टी मनाने के लिए ही गांव जाते हैं। सवर्णों और दिलितों के बीच की खाई, गरीब और अमीर के रूप में बदल गई है।
लहलहा रहे थे कालानमक के धान
जहां पर हम रहते थे वह क्षेत्र चावल के अच्छे पैदावार के रूप में जाना जाता था। वहां पर एक विशेष किश्म के धान की पैदावार होती थी जिसका नाम था कालानमक। जिस खेत में कालानमक की बिजाई होती थी उधर से गुजरने पर पूरा वातावरण सुगंधित हो उठता था। मोटा चावल जैसे सरजूउनचास, सरजूबावन आदि को कोई पूछता नहीं था। गरीब हो या अमीर सभी लोग कालानमक जरूर खाते थे। लेकिन बाजारवाद ने ऐसी पल्टी मारी कि पूरे के पूरे गांव को तबाह कर दिया।
गांवों की बहुत सारी बुराइयां भी थीं, जिसको बाजारवाद ने खत्म तो किया ही साथ ही उन अच्छाइयों को भी खत्म कर दिया जिसे बचाना बहुत ही जरूरी था। मानवीय मूल्य जैसे धरोहर का भी नाश हो गया। मां, बाप और बेटे के प्यार को भी पैसे से तौला जाने लगा। धीरे-धीरे लोग खेतों में नये-नये बीज बोना शुरू कर दिए। जिसका असर यह हुआ कि कालानमक धान जैसे अच्छे किश्म के स्वादिस्ट अनाज भी खत्म हो गये। प्राकृतिक आपदाओं को भी नहीं झेल पाये। महंगाई इस कदर हाबी हो गई कि अब गांवों में रहना दूभर हो गया। जो लोग शहर में चले गये उनका परिवार काफी मजे में रहने लगा और बच्चे भी अच्छे स्कूलों में पढ़ाई करने लगे। लेकिन गांव में रहने वालों को न तो अच्छी शिक्षा मिलती है और न ही अच्छी तरह की खेती कर पाते हैं। खेती करने के लिए उनके पास पैसा भी नहीं होता है। कर्ज लेकर अगर कोई किसान धान लगा भी देता है तो उसमें रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं की कमी से ऐन वक्त पर सबकुछ तबाह हो जाता है। खेती युक्त जमीनें इस कदर ऊसर हो चुकी हैं कि महंगे रसायनिक खाद और कीटनाशक के पैदावार ही नहीं काट पाते। जो पैदा भी होता है उसका आय के अपेक्षा लागत मूल्य अधिक होता है। ज्यादातर लोग पूरी खेती भी नहीं कर पाते हैं। अब लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं।
कबड्डी चिक्का और कंचे ने ले लिया जुआ का रूप
कंचा, चिक्का, कबड्डी और लखनी जैसा खेल तास के पत्तों ने ले लिया है। जो जुआ का रूप धारण कर लिया है। जब अपने गांव जाता हूं तो वहां दूर-दूर तक गुल्ली-डंडा और कबड्डी का खेल नजर नहीं आता। लेकिन क्रिकेट का टुर्नामेंट जरूर दिखाई दे जाता है। खाली पड़े घरों या पेड़ों के नीचे ज्यादातर बच्चे पूरा का पूर दिन जुआ खेलने में मस्त रहते हैं। कभी कभार पलिस हत्थे चढऩे पर पुलिस वालों को कुछ चढ़ावा देकर छुट्टी पा जाते हैं। गांवों की राजनीति भी बहुत गंदा हो चुकी है। लोगों के बीच पार्टीबंदी इस कदर हाबी है कि चुनाओं के समय एक-दूसरे की हत्या तक करने में पीछे नहीं रहते। युवा वर्ग तो लगभग शहरों की ओर पलायन कर चुका है। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो शिर्फ बिजाई, रोपाई और कटाई के समय ही गांवों में आते हैं। बाकी समय वे अपने जीवकोपार्जन के लिए शहर में ही रहते हैं। लोगों के अंदर धीरे-धीरे मानवीयता भी खत्म होती दिखाई दे रही है। दबंगों की दबंगई अभी भी जारी है। पहले वे खेतों में काम करवाते हुए अपनी दबंगई दिखाते थे, लेकिन अब राजनीति में आकर करते हैं। पहले के न तो बच्चे रह गए और न ही दादा काका और बाबा ही हैं। सारे परिवार के सदस्य अलग-अलग अपनी जीविका चला रहे हैं। किसी के घर जाने पर लोग यही सोचते हैं कि यह जरूर किसी काम से आया होगा। पढऩे-लिखने और मेहनत मशक्कत करने वाले शहर की ओर पलायन कर रहे हैं।
प्राइमरी स्कूलों की स्थिति और भी खराब है। कहने के लिए तो गांव में एक मिडिल स्कूल है लेकिन तीन सालों में कोई अध्यापक ही नियुक्त नहीं हुआ है। बीच में एक अध्यापक आए भी थे लेकिन छह माह बाद उनकी मौत हो गयी। इसके बाद अध्यापक नियुक्त होना तो दूर उसकी चर्चा तक नहीं होती। यही है मेरे गांव की राम कहानी।
-पुर्वांचल के एक गांव की तस्वीर-

-जय प्रताप सिंह

Saturday, July 10, 2010

शब्दों का बाजीगर

जून की तपती गर्मी में पसीने से लथपथ हाथ में एक बैग टांगे राज निकल पड़ा। खुद को उसे पता नहीं था कि वह जायेगा कहां। लेकिन फिर भी वह चला जा रहा था। उसके दिमाग में बादलों की तरह प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे। उसे अगर किसी चीज की जरूरत थी तो वह थी रोटी की। वह भूख और प्यास से व्याकुल था। सबसे बड़ी समस्या तो आशियाने की थी, लेकिन भूख को तो मिटाना ही था क्योंकि अभी उसे जिंदा रहना है और जिंदा रहने के लिए जरूरत थी रोटी की। उसे अपने ऊपर इस बात पर गुस्सा भी आ रहा था कि कम से कम रोटी तो खा ही लेनी चाहिए थी। तभी किनारे से एक कार गुजरी और वह उसकी चपेट में आते-आते बचा। उसके सारे प्रश्न हवा हो गये थे। सड़कों पर लोग इधर-उधर भागते हुए नजर आ रहे थे। उसका सिर चकरा रहा था। वह पेड़ की छाया की तलाश में था, जहां पर कुछ देर बैठकर आराम कर सके। लेकिन इन कारखानों के बीच उसे छाया कहां नसीब होती। फिर भी भी वह चला जा रहा था। कि अचानक उसे एक प्याऊ नजर आया, जहां पर मटके में पानी भरा था। पानी देखते ही उसके चेहरे पर चमक आ गयी। उसने भर पेट पानी पिया और वहीं पर बैठ गया। पानी पीने से उसकी भूख लगभग मिट-सी गयी। एक बार फिर उसे इतने बड़े शहर में एक छोटे से किराये के मकान की जरूरत महसूस हुई।
एक चाय के ढाबे पर ढेर सारे मजदूर चाय की चुस्कियां लेते हुए गप्पें लड़ा रहे थे। वह भी उनके बीच जा पहुंचा और जेब को टटोलने लगा। जेब से पचास का एक नोट निकाला, उसे उलट-पलट कर देखा और फिर दुखी मन से जेब में वापस रख लिया। उसका मन मसोस कर रह गया। यही तो उसके पास अमूल्य धन था जिसे चलते वक्त छोटे नेता जी ने काफी गुणा-भाग करके राज को दिया था। इसी नोट से आशियाना और खाने के लिए रोटी का व्यवस्था करनी थी। वह किसी के ऊपर गुस्सा भी नहीं कर सकता था। आखिर यह रास्ता उसने खुद ही तो चुना था, कोई पकड़कर लाया तो था नहीं। गर्मी के मारे उसकी जान निकल रही थी। जेब से रुमाल निकाल कर पसीना पोंछा। वह सबकुछ भूल जाना चाहता था, लेकिन उस रात की घटना साये की तरह उसका पीछा कर रही थी। भाई साहब की बातें बार-बार उसके दिमाग को कुरेद रही थीं। मन कितना खुश था जब भाई साहब के आने की उसने खबर सुनी थी। भाई साहब के आने की खबर सुनकार वह महीनों से उनका इंतजार कर रहा था। उनसे बहस करने के लिए ढेर सारी किताबें उलट-पलट डाली थी। क्रांतिकारी अभियानों में जमकर हिस्सा भी लेता था। इस बार वह अपने सारे पश्नों का उत्तर हल कर लेना चाह रहा था जो वहां पर मुमकिन नहीं था। इसी बीच वह एक बार फिर छोटे नेता के टारगेट पर आ गया। उसे नहीं मालूम था कि एक छोटी-सी बात तिल का ताड़ बन जायेगी। सुबह पांच बजे वह सो कर उठा और साथियों के साथ एक छोटी-सी मीटिंग हुई, जिसमें पार्टी का दस-दस अखबार बेचने का टारगेट रखा गया। टारगेट के सवाल पर वह बेचैन हो उठा, लेकिन कुछ बोला नहीं और चल दिया। बोलता कैसे, भाई साहब का आदेश जो था।
अभियान टोली एक मजदूर बस्ती में पहुंची। हाथ में पार्टी अखबार लेकर लोग अलग-अलग दिशाओं में बिखर गये। उस समय मजदूर फैक्ट्री में जाने की तैयारी कर रहे थे। राज के साथी मजदूरों को देश-दुनिया में उनकी समस्याओं के बारे में समझाते हुए उन्हें तीन रुपये का मजदूर अखबार खरीदने के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे थे। सभी लोगों ने मजदूर अखबार बेचने का अपना-अपना टारगेट पूरा कर लिया लेकिन राज के मन में सवालों का अंबार लगा हुआ था। वह अपना अजदूर अखबार बेचने का टारगेट तो पूरा नहीं कर पाया लेकिन कुछ मजदूरों को संगठन में जुडऩे के लिए सहमत जरूर कर लिया। धीरे-धीरे सारे मजदूर फैक्ट्री जाने लगे। अभियान टोली भी मजदूरों की बस्ती से होते हुए अपने कमरे में वापस आ गयी। कमरे में पहुंचते ही राज को आलोचना के टारगेट पर ले लिया गया। चारो ओर से आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया।
तुमने अखबार बेचने के टारगेट को नकारा है, तुम स्वीकार करो कि तुम गलत हो। गुस्से में हाथ को इधर-उधर हिलाते हुए छोटे नेता ने कहा। नहीं मैं बिलकुल सही हूं। अखबार बेचने के लिए टारगेट रखना गलत है। हम लोग यहां अखबार और किताब बेचने के लिए नहीं आए हैं। हम इंकलाबी हैं और इंकलाब के लिए जरूरी है लोगों को संगठित करना। कभी-कभी मजदूरों के पास पैसा नहीं होता, जिससे वे तीन रुपये का अखबार खरीदने से कतराते हैं। ऐसे में उनकी भावनाओं का खयाल न रखना गलत है। लेकिन हमारी बातें उन्हें अच्छी लगती हैं। वे अखबार को पढऩा चाहते हैं, संगठन से जुडऩा चाहते हैं। और हम हैं कि उनकी भावनाओं को पैसे से आंकते हैं। आप भी मजदूर के बेटे होते तो तीन रुपये की कीमत जरूर समझते। अखबार बेचने का टारगेट बिलकुल गलत है। राज की बात सुनते ही नेता जी भड़क उठे। उनके मध्यवर्गीय अहम पर जबर दस्त चोट लगी थी। आखिर वह भाई साहब का चमचा ऐसे ही नहीं बना था।
छोटे नेता सिकिया पहलवान थे। वह दुबले-पतले सवा पांच फुटा नौजवान थे। उनकी उमर बत्तीस को पार कर चुकी थी। लेकिन शारीरिक बनावट ऐसी थी कि उमर को सही-सही नहीं आंका जा सकता था। उसके शरीर से यदि कपड़ों को उतार दिया जाये तो हड्डियों का ढंचा मात्र दिखाई देता। उसका दिमाग भी उसकी शारीरिक बनावट की तरह ही था। उसके चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी लटक रही थी जिसे गुस्से में वह हाथ से खींचता रहता था। इस बार भी उसने जोर से अपनी दाढ़ी खींची और हाथ में कलम को कसकर पकड़ते हुए राज की कही हुई बातों को नोट कर लिया। उसने अपना तुगलकी फरमान जारी करते हुए कहा कि राज कुछ दिन छुट्टी लेकर इन बातों पर सोचें। सोचने के बाद इस पर अपनी आत्मलोचना रखें। छोटे नेता के मुखारबिंदु से इस तुगलकी फरमान के बस निकलने भर की देर थी कि समूह ने उसपर अपनी मोहर लगा दी।
राज ने जेब से मुड़ी-तुड़ी एक सिगरेट निकाली और जलाकर धुएं का बादल छोडऩे लगा। तभी कारखाने का सायरन बजा और सारे के सारे मजदूर फैक्टरी के अंदर गायब हो गये। बाहर लगभग वीरान-सा हो गया। ऐसे मालूम होता था जैसे सबके सब फैक्टरी के पेट में समा गये हों। उसने बैग को कंधे पर टांगा और झुग्गियों की ओर रुख कर दिया। झुग्गी ही उसका एक मात्र सहारा था जहां पर उसे आशियाना मिलने की उम्मीद थी। इन झुग्गियों में ऐसे लोग रहते थे जो कई देशों को पहनने के लिए फैक्टरियों में कपड़े तैयार करते थे। लोगों के ऐशोआराम की चीजों के पार्ट-पुर्जे बनाते थे। लेकिन यह भी एक विडम्बना थी कि उनके बच्चे कड़ी धूप में अधनंगे घूम रहे थे। कुछ तो फटे-चीथड़े और गंदे कपड़ों में खेल रहे थे। आपस में लड़-झगड़ रहे थे और अपने में मस्त थे। जैसे कि दुनिया की सारी खुशी उनके पास हो। यह लोग खाते-पीते लोगों के लिए तो नाली के कीड़े थे, लेकिन जो भी थे उतने में ही खुश थे। इन्हें किसी की परवाह नहीं थी और अलग ही मेहनतकशों की एक दुनिया थी। इन्हें किसी का डर था तो बस टीन और टाट से बनाई गई झुग्गियों के छिन जाने का। इन झुग्गियों पर भी बड़ी-बड़ी इमारतों में रहने वालों की निगाहें गड़ी हुई थीं। उन्हें खूबसूरत शहर में झुग्गियां धब्बा दिखाई दे रही थीं। झुग्गियों में रहते तो मजदूर ही थे, लेकिन खाते-पीते घरानों की भी कुछ झुग्गियां थीं जिन्हें वे कब्जा करके पांच-सात सौ रुपये किराये पर उठा रखे थे। कुछ लोग इन झुग्गियों में रहने का ढोंग भी करते थे, क्योंकि मजदूरों को लड़ाकर अपनी रोजी-रोटी चलाते थे। छुटभैया नेता इनके वोट को चुनाव के समय बेच देते थे और अच्छी खासी रकम इक_ा कर लेते थे। कुछ मजदूर तो इन्हीं को अपना रहनुमा मान बैठे थे।
राज जेब में पचास रुपये रखे किराये पर झुग्गी खोजने में जुट गया। उसे यह अच्छी तरह मालूम था कि पचास रुपये में किराये की झुग्गी नहीं मिलने वाली है। लेकिन वह हार मानने वाला नहीं था। उसने एक मजदूर से पूछ बैठा कि क्या किराये पर झुग्गी मिल जायेगी? क्यों नहीं, देख लो। झुग्गी का मालिक मोहन ने कहा। उसके पास एक ही झुग्गी थी लेकिन उसके ऊपर पत्थर रखकर पांच फुट लम्बी और तीन फुट चौड़ी एक और झुग्गी बना रखी थी। बगल में थोड़ी-सी खाली जगह थी। उसी के बराबर पाखानाघर बना रख था। पाखाना में सीट बैठा कर एक मोटा पाइप नाली में गिरा दिया था। ऊपर चारो ओर से प्लास्टिक के बोरे से घेर रखा था जिसमें बैठने पर सिर दिखाई देता था। उसके ऊपर से 33 हजार बोल्ट का तार गुजर रहा था। कितना किराया है? राज ने खुश होते हुए पूछा। किराया तो पांच सौ रुपये है लेकिन तुम साढ़े चार सौ रुपये दे देना। मोहन ने जवाब दिया। राज ने हामी भरते हुए कहा कि देखो! मेरे पास अभी पचास रुपया है। मैं दो दिन में तुम्हे पूरा किराया दे दुंगा। यह कह कर राज ने उसे पचास का नोट पकड़ा दिया।
राज को अब खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि उसे रहने का आशियाना जो मिल गया था। उसकी भूख भी रफुचक्कर हो गई। उसने बैग से एक फटी हुई चद्दर निकाली और नीचे बिछा दिया। कमरे में पंखा तो था नहीं और लगाने के लिए जगह भी नहीं थी। गर्मी बहुत तेज थी। छत के ऊपर से टाट भी फट गया था जिससे कमरे में भी धूप फैल गयी। वह लेटा ही था कि दिन भर की थकावट से वह जल्दी ही सो गया। उसकी नींद खुली तो पेट में जोर का दर्द हो रहा था। भूख तो मर गई थी लेकिन दर्द कम नहीं हुई। दवा के लिए पैसेे भी नहीं थे। एक बार फिर उसका हाथ जेब तक गया लेकिन फिर झटके के साथ ऊपर खींच लिया और जोर से हंसने लगा। आखिर नेता जी ने पचास ही रुपया तो उसे दिये थे और वह भी मोहन ले गया। उसे इस बात की खुशी थी कि चलो तेज भूख तो नहीं लगी है। उसने बैग में रखी होमियोपैथिक दवाओं को करीने से सजा दिया और खुद एक खुराक दवा पी ली। दवा पीने के थोड़ी देर बाद उसने राहत महसूस की। वह संगठन में से दवाएं ही तो बचा कर ला पाया था। बाकी तो छोटे नेता ने लाने ही नहीं दिया। एक बात छोटे नेता ने जरूर कही थी कि एक दिन यहां आकर खाना खा सकते हो। उन्होंने एक जून की रोटी खाने को कहकर कितना बड़ा एहसान किया था। ऐसे लोगों से और उम्मीद ही क्या की जा सकती है। अब यह सब सोच कर उसे घृणा-सी महसूस हो रही थी। कैसे अमानवीय लोग हैं जो मजदूर क्रांति शब्द को बदनाम कर रहे हैं। ऐसे लोगों को खत्म हो जाना चाहिए। पिछली रात की बातें फिर से उसके दिमाग में कौंधने लगी।
पार्टी मीटिंग के लिए जगह की तलाश की जा चुकी थी। लोग बड़े उत्साहित लग रहे थे। क्योंकि भाई साहब आने वाले थे। बाद में पता चला कि पुस्तक मेले मेें पांच स्टाल बुक करा लिया गया है। अब नेता जी आने वाले थे हिसाब-किताब की जानकारी लेने के लिए। ऐसे मौकों पर नेता जी कार्यकर्ताओं को उत्साहित करना अपना पुनीत धर्म समझते थे। जिससे साथी तरोताजा हो कर और अधिक मेहनत करके किताबें छापने के लिए पैसा इक_ा कर सकें। राज से लोग बात करने में कतरा रहे थे। उसके बारे में भाई साहब को पता भी चल गया था कि वह पार्टी पर सवाल उठा रहा है। राज को बहुत ताज्जुब हो रहा था कि इस बार आखिर भाई साहब ने आलोचना क्यों नहीं की। जो पार्टी पर सवाल उठाये उसे निकाल बाहर कर देना चाहिए। यह महान क्रांतिकारी भाई साहब का सबसे बड़ा क्रांतिकारी विचार था। राज की पार्टी में जो सवाल उठाता था उसके ऊपर कड़ी निगाह रखी जाती थी।
राज को याद आ रहा था कि कैसे भाई साहब की पत्नी का फ्रिज और कूलर के बिना एक दिन भी गुजारा कर पाना मुश्किल हो जाता था। भाई साहब भी कम नहीं थे। वे चाय तक भी उन्नत क्वालिटी की पीते थे। शयद इसी से उनकी खास तरह की उन्नत चेतना का निर्माण हुआ था। वैसे तो भाई साहब कभी भी मजदूर बस्ती में नहीं जाते थे। लेकिन यदि कभी-कभार मजदूर कार्यकर्ताओं की मीङ्क्षटग लेनी भी पड़ती तो भी वे मजदूर बस्ती के पास तक नहीं फटकते थे। वहां रुकने की बात तो बहुत दूर थी। यही वजह थी कि मजदूर कार्यकर्ताओं की मीटिंग भी उच्चमध्यवर्गीय ठिकानों पर की जाती थी। ताकि भाई साहब को कोई असुविधा न हो।
एक दिन लखनऊ में कार्यकर्ता मजदूर अखबार को बेचने के लिए कहीं अभियान पर जा रहे थे। तभी भाई साहब की पत्नी वहां पर आ धमकीं। उन्होंने एक सीनियर साथी को गुस्से में लगभग झिड़कते हुए कहा कि मेरे कमरे का कूलर खराब है। आज से फ्रिज भी नहीं चल रहा है और तुम्हे इसकी कोई चिंता नहीं है। पहले उसे ठीक करवाओ, अभियान बाद में चला लेना। राज किंकर्तव्यविमुढ़ होकर उनके तमतमाये चेहरे को देखता रह गया। एक तो गर्मी के मारे उसका अखबार बेचने का मन नहीं कर रहा था और यहां इन्हें फ्रिज और कूलर की पड़ी है। वह गुस्से से भर गया लेकिन कुछ कह नहीं पाया। भाई साहब की पत्नी के प्रति राज के मन में पर्याप्त आदर का भाव था लेकिन आज छोटी-सी बात पर उनका यह रौद्र रूप देखकर उसका मन घृणा से भर गया। उसे बड़ा आस्चर्य हो रहा था कि देश की यह इतनी बड़ी कवित्री कैसे बन गई? वह खुद तो उनका विरोध नहीं कर पाया लेकिन उसे उनसे भी ज्यादा गुस्सा उस सीनियर कलाकार साथी पर आ रहा था जिसने न शिर्फ उनकी बातों का कुछ भी विरोध नहीं किया वरन उनका फ्रिज और कूलर ठीक करवाने के लिए मजदूर अखबार के अभियान को ही स्थगित कर दिया। राज इस गुत्थी को सुलझाने की भरकस कोशिश कर रहा था लेकिन वह सफल नहीं हुआ। तभी ''पार्टी लोहे के हाथों से अनुशासन लागू करवाती हैÓÓ वाली भाई साहब की बात उसके दिमाग पर कौंध गई और वह ठहाका मार कर हंस पड़ा।
दिसम्बर महीने की एक सर्द रात में राज के साथी दाल रोटी बनाकर बिस्तर में दुबके छोटे नेता जी के आने का इन्तजार कर रहे थे। उन्हें क्या पता था कि नेता जी कहीं से दावत उड़ाकर आएंगे। रात के करीब बारह बजे होंगे कि नेताजी आ धमके। कमरे में आते ही उन्होंने आदेशात्मक शब्दों में पूछा कि अभी तुम लोगों ने खाना नहीं खया। बिस्तर में दुबके एक साथी ने बताया कि हम लोग आपका इंतजार कर रहे थे। चेहरे पर मुस्कराहट का भाव लाते हुए नेता जी ने कहा कि वे तो खना खा चुके हैं। तुम लोग जल्दी से खाना खा लो और सुबह ट्रेन में अभियान चलाने जाना है। उन्होंने कपड़ा उतारते हुए कहा कि पार्टी के लिए एक मकान की सख्त जरूरत है, जिसके लिए अलग-अलग टीमों से दो-दो लाख रुपये जुटाने का टार्गेट रखा गया है। हम लोगों को यह टार्गेट बहुत ही जल्द पुरा कर लेना है। नेताजी यह बात काफी उत्साह से कह रहे थे, जोकि उनमें बिरले मौकों पर ही नजर आता था।
राज ने एक दिन अचानक देखा कि भाई साहब अपनी पत्नी के साथ कार में बैठ कर घूम रहे हैं। भाई साहब की एक बहुत बड़ी खूबी थी कि वे न सिर्फ लोगों की मनोवैज्ञनिक विष्लेषण करने में माहिर थे बल्कि उनके मन को पढऩे में भी पारंगत थे। शायद फ्रायड जिंदा होता तो ऐसा शिष्य पाकर वह धन्य हो जाता। भाई साहब की इस खूबी का भी उनकी चेतना को उन्नत करने में विशेष योगदान था। इसीलिए तो कमरे में घुसते ही उन्होंने पल भर में कार्यर्ताओं के मनोभाव को पढ़ लिया। क्या बात है, तुम लोग ऐसे क्यों देख रहे हो? उनके इस सवाल का किसी ने जवाब नहीं दिया। फिर स्वत: उन्होंने अपनी कार के बारे में एक बनी बनाई कहानी सुना दी। उन्होंने कार्यर्ताओं को बताया कि इसे उनके किसी मित्र ने उन्हें गिफ्ट में दी है। ऐसी ही एक कहानी उनकी पत्नी ने लखनऊ में कार्यकर्ताओं को सुनाई थी। जब उच्चमध्यवर्गीय इलाके में उनके किराए के एक घर में बहुत ही महंगा म्युजिक सिस्अम आया था। उन्होंने भी कुछ इसी तरह से कार्यर्ताओं को बताया था कि उन्हें यह म्यूजिक सिस्टम उनकी एक सहेली ने दिया है।
राज कहीं खो-सा गया था। उसे ध्यान ही नहीं रहा कि सामने भाई साहब बैठे हैं। तभी उसके कानों ने भाई साहब की आवाज सुनी। राज तुम कहां खो गये हो? नहीं-नहीं, कोई बात नहीं। राज ने चौंकते हुए जवाब दिया। कोई बात तो है, क्योंकि तुम बहुत खोए-खोए से लग रहे हो। भाई साहब ने उसकी आंखों में आंखें डालते हुए कहा। राज ने भाई साहब के बार-बार पूछने के बाद भी उन्हें पता नहीं चलने दिया कि वह कहां खो गया था। मन ही मन उसने उनकी इस कहानी पर उनके लिए एक उपमा गढ़ लिया कि 'चोर की दाढ़ी में तिनकाÓ।
छह-सात माह पहले जब छोटे नेता ने कार्यकर्ताओं की मीङ्क्षटग ली थी तो उन्होंने बताया था कि पार्टी नोएडा में एक घर खरीदने की योजना बना रही है। पार्टी ने 25 लाख रुपये का एक घर तो ले ही लिया था लेकिन राज को लग रहा था कि बड़े नेता की गाड़ी भी उन्हीं पैसों से खरीदी गयी है। जिन्हें कार्यकर्ताओं ने जनता से जन कार्यों के नाम पर इक_ा किया था। तेज गर्मी और भूख ने राज को वर्तमान में ला पटका। उसे बड़ी खुशी हुई यह जानकर कि संगठन से निकलते समय उसके दूसरे वाले पैंट के जेब में पांच सिगरेट पड़ी है। भूख से उसका बुरा हाल था, लेकिन करता क्या? पचास रुपये तो झुग्गी मालिक को दे दिया था। उसने एक सिगरेट जलाई और उसका कश खींचते हुए रोटी की तलाश में कमरे से बाहर निकल गया। वह पागलों की तरह इधर-उधर घूमता रहा। दिन भर की थकावट से उसका शरीर तो टूट चुका था। लेकिन उसका दिमाग झुग्गी में अपने किसी हमदर्द का पता याद करने में लगा हुआ था। एकाएक उसकी आंखों के सामने अख्तर का चेहरा घूम गया।
अख्तर एक दुबला पतला नौजवान था। वह आंख पर चस्मा चढ़ाए अपने पान के खोखे पर हमेशा अखबार और किताबें पढ़ता रहता था। बीच-बीच में ग्राहकों को पान, बीड़ी और सिगरेट भी देता रहता था। उसके बीबी और बच्चे भी झुग्गी में ही रहते थे। राज को देखते ही उसने आगे बढ़कर हाथ मिलाया। राज के आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। वह अख्तर का हाथ थामे वहीं जमीन पर बैठ गया। उसे याद नहीं रहा कि अख्तर ने क्या-क्या बोला। लेकिन जब उसे होस आया तो वह खोखे के बगल में एक बेंच पर लेटा हुआ था। तुम्हे हुआ क्या था? तुम बेहोशी की हालत में क्यों हो गये थे? बस ऐसे ही। राज ने बैठते हुए जवाब दिया। पता नहीं कैसे अख्तर ने राज के मन की बात पढ़ ली। उसने राज के सामने अपना टिफिन बढ़ाते हुए कहा कि चलो खाना खाओ फिर बात करते हैं। मुझे संगठन से निकाल दिया गया है। मैंने झुग्गी में कमरा ले लिया है। मैं काम की तलाश में हूं ताकि जल्दी से झुग्गी का किराया दे दूं। राज ने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा। तुम्हें मैं कई दिन से खेज रहा हूं। मेरे पास दो-तीन मरीज आये थे। उन्हें होमियोपैथिक दवा देना है। वे पैसा भी अच्छा देंगे। यदि किराया देने के लिए कम पड़े तो सौ-पचास मुझसे ले लेना। सुबह दवा लेकर आ जाना। अख्तर ने उनके रोगों के बारे में बताते हुए कहा।
बहुत दिनों बाद उससे किसी ने अपनत्व से बात की थी। खाना खा लेने के बाद उसे कुछ राहत महसूस हुई। अख्तर के पास से वह सीधे झुग्गी में गया और टांग पसार कर जमीन पर ही लेट गया। वह सोने की कोशिश कर ही रहा था कि उसकी आंखों के सामने पार्टी वाले उस साथी का चेहरा घूम गया, जिसने पहली बार पार्टी से परिचित कराया था।
राज अभियान चलाकर कमरे पर आया ही था कि एक फोन आया। जल्दी से खाना बना लो, तुमसे कुछ बात करनी है। उसने जल्दी-जल्दी खाना बनाया और खाने के बाद सोचने लगा कि अखिर क्या बात होगी? रात के अभी दस ही बजे होंगे कि साथी आ धमके। उन्होंने बात करना शुरू कर दिया। 'जो बात बताने जा रहा हूं वह ङ्क्षजदगी की सबसे खूबसूरत बात है। इसे ध्यान से सुनना। आज तुम्हें पार्टी से परिचित करा रहा हूं। तुम जो काम कर रहे हो वह आज से पार्टी अनुशासन में करोगे। अब तुम होलटाइमर कार्यकर्ता हो। हमारे नेता भाई साहब हैं। भाई साहब ने क्रांति के रास्ते को एक कदम आगे बढ़ाने का काम किया है। माक्र्स, एंगेल्स, लेनिन और माओ के बाद भाई साहब ने क्रांति के रास्ते को विकसित करने का काम किया है। हम ही लोग क्रांति करेंगे। देश में दूसरी कोई पार्टी नहीं है जो हमारी विचारधारा की बराबरी कर सके। अब पार्टी का आदेश है कि तुम गांव में काम करने जाओ। इससे पहले तीन दिन बाद एक कार्यशाला लगेगी उसमें भाई साहब आने वाले हैं। भाई साहब हमेशा भूमिगत रहते हैं। उनसे तुम्हारी मुलाकात नहीं हुई है। आज बस इतना ही, अब मैं चलता हूं। तुम मीटिंग की तैयारी करो। यह कह कर पुराने साथी चले गये। राज को समझ में नहीं आ रहा था कि वह मीङ्क्षटग के लिए क्या तैयारी करे? बहरहाल उसे खुशी के मारे रात भर नींद नहीं आई। वह भाई साहब के बारे में सोचता रहा। कैसे होंगे भाई साहब? उसने अपने अंदर एक खाका बना लिया कि जरूर वे माक्र्स की तरह बड़े बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी रखे होंगे। राज ने तीन दिन तक जमकर अभियानों में हिस्सा लिया। उसने रात वाली मीटिंग के बारे में अपने किसी भी अन्य साथी से चर्चा तक नहीं की। आखिर तीन दिन के उसके इंतजार की घड़ी खत्म हुई। कार्यशाला एक स्कूल में लगा था। कई जगहों की टीमें वहां इक_ा थीं। खाना बनाने के लिए एक भण्डारी भी था, लेकिन सबसे ज्यादा काम कार्यकर्ता ही करते थे। राज भी काम कर रहा था लेकिन उसकी निगाहें भाई साहब को खोज रही थीं। एक बड़ा-सा मीङ्क्षटग हाल बनाया गया था। उस कमरे में एक लाइन से कुर्सी मेज लगी हुई थी। किनारे की तरफ सबसे अलग एक मेज और आरमदायक कुर्सी लगी थी। मेज पर कागज-कलम और कुछ किताबें रखी गयी थीं। दीवार पर माक्र्स, लेनिन, स्टालिन, और माओ की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी थीं। आरामदायक कुर्सी पर ठीक माक्र्स की तस्वीर के नीचे उसकी बड़ी-बड़ी दाढ़ी और बाल थे। जो बिल्कुल काले किए गये थे। वह गोरा-चि_ा इतना था कि उसे देखने पर ऐसे लगते थे कि किसी बड़े घराने के हों। उम्र भी पैंतालिस के लगभग थी। राज सोचने लगा कि क्या यही भाई साहब हैं। वह कभी भाई साहब को देखता तो कभी माक्र्स की फोटो को। उनसे मिलकर वह काफी खुश था। उसने सोचा कि देश में नये माक्र्स पैदा हो गये हैं और अब क्रांति होना लाजमी है। भाई साहब भाषण देते और बाकी लोग ध्यान से सुनते और कागजों पर नोट कर लेते। जब वे देश-दुनिया की क्रांतियों, समस्याओं और संगठन की जिम्मेदारियों पर बात करते तो उनके शब्दों का चयन बेहद उम्दा होता। राज को अधिकांश शब्द समझ में ही नहीं आते थे। लेकिन वह मुंह बाए सुनता और उन्हें एकटक देखता रहता।
'हमें देश में नई समाजवादी क्रांति करनी है। दुनिया में हमी ऐसे क्रांतिकारी हैं जिनके पास क्रांति का रास्ता है। बाकी सभी कठमुल्लाावादी हैं। हमारे पार्टी के पास जनवादी केन्द्रीयता है। नेता और कार्यकर्ता में कोई फर्क नहीं है। हर किसी को पार्टी में सवाल उठाने का अधिकार होता है।Ó भाई साहब बिना रुके बोलते रहे। बीच-बीच में एक घूंट पानी पी लिया करते थे। वह धीरे-धीरे माइक को हाथ में लेकर बोलते रहे। उन्होंने अपने भाषण में सुर-ताल, उतार -चढ़ाव का विशेष ख्याल रखते थे। हाथ से बनाए हुए एक नक्शे पर इधर-उधर घुमाते हुए उन्होंने कहा कि यहां पर बंकर खोदा जायेगा, यहां से हम दुश्मन पर वार करेंगे। फिर आगे बढ़़ेंगे और दुश्मन पर वार पर वार करते जाएंगे। यह सब हमारी सेना करेगी। यह सब कुछ राज की समझ में नहीं आ रहा था। वह पूछना चाह रहा था कि यह सब आप क्या कर रहे हैं? लेकिन भाई साहब थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उनका भाषण तब तक जारी रहा जब तक कि उनके नेतृत्य में कागजी फौजों ने दुश्मन के किले को फतह नहीं कर लिया। जब तक उनकी कागजी सेनाएं लड़ती रहीं, भाई साहब की आवाज भी युद्ध क्षेत्र के नगाड़े की तरह उस हाल में गूंजती रही जहां हम बैठे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे अपने को कार्यर्ताओं की मीटिंग में नहीं बल्कि युद्ध के मैदान में हों।
कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हे बचपन से ही दिन में सपने देखने की आदत पड़ जाती है। यदि माता-पिता ध्यान न दें तो बड़े होने पर भी वह आदत नहीं छूटती। ऐसे बच्चे ज्यादातर दूसरे बच्चों से पिटते रहते हैं। लेकिन हर बार वे अपने मन में योजना बनाते रहते हैं कि इस बार उसे ऐसे मारुंगा......। हाथ उठाएगा तो उसे पकड़ लुंगा.....। राज को उसके एक डाक्टर मित्र ने ऐेसे बच्चों के बारे में बताया था। झुग्गी के पांच बाई तीन के कमरे में पसीने से लथपथ राज ने सोचा कि लगता है कि यह बीमारी भाई साहब में भी थी। नहीं तो आखिर कैसे किसी पार्टी का सेक्रेटरी इस तरह हवाई किले बना सकता है। वह फिर से उस मीटिंग के बारे में सोचने लगा।
भाई साहब का भाषण जारी था। अब सारा समूह बिलकुल शांत हो चुका था। एक घंटे की मीटिंग में ही कई साथी सोने लगे थे। इनमें से कई कार्यकर्ता ऐसे थे जो सुबह पांच बजे से देर रात तक ट्रेनों, बसों, आफिसों और कालोनियों में किताबें छापने के लिए पैसे जुटाने का अभियान चलाते थे। कई महीनों से यही उनकी दिनचर्या थी। ऐसे लोग साल के तीन सौ पैंसठ दिन में से तीन सौ दिन यही काम करते थे। सामान्यत: ऐसे साथी पांच घंटे से ज्यादा कम ही सो पाते थे। इसलिए जब वे मीङ्क्षटग में आये तो वे अपने को सोने से नहीं रोक पाये। एक और वजह भी थी कि भाई साहब ज्यादातर मीटिंगों में अपने जनकार्यवाइयों के बारे में बड़ी बहादुरी से बताते थे। जिसे कार्यकर्ताओं ने इतनी बार सुन रखा था कि वे उसे सुनकर बोर हो जाते थे। और उन्हें नींद आने लगती थी।
भाई साहब ने जब कार्यर्ताओं को सोते हुए देखा तो वे गुस्से से तिलमिला गये। लेकिन उन्होंने बहुत संयत होते हुए लोगों को जागने के लिए कहा। उन्होंने उत्साह दिलाते हुए कहा कि आज नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का दौर है। इस समय कोई मजदूर आंदोलन नहीं खड़ा हो सकता। इसलिए इस समय उनका संगठन बनाकर उन्हें संगठित करने के बजाय, उनके बीच में क्रांतिकारी विचारों का प्रचार-प्रसार करें। हम जनता के दम पर राजकमल जैसे प्रकाशन से ज्यादा किताबें छापेंगे। और आने वाले पुस्तक मेले में उनसे भी बड़ा स्टाल लगाएंगे। इसके बाद थोड़ी देर के लिए उनके भाषण पर विराम लग गया। उन्होंने मेज पर पड़े टिशू पेपर को हाथ में लिया और बहुत गम्भीर मुद्रा में उससे अपनी आंख पोंछते हुए डस्टबिन तक गये। वहां पर उन्होंने टिशू पेपर को डस्टबिन में डाला और वापस आकर और गम्भीर मुद्रा में अपनी कुर्सी पर पसर गए। सारे कार्यकर्ता बहुत ही सहानुभूतिपूर्वक भाई साहब को देख रहे थे। तभी भाई साहब ने बहुत ही भावपूण मुद्रा में फिर से अपनी बातचीत शुरू की। दोबारा टिशू पेपर से अपनी आंखों को साफ करते हुए डन्होंने कहा कि मेरी तो आंखें भी कांति की भेंट चढ़ गयीं। डाक्टर ने बोला है कि इंफैक्शन से बचाना है। कहते हुए उन्होंने हाथ में पड़े टिशू पेपर को डस्टबिन में डाल दिया। इस मामले में कमेटी के साथी उनका मदद करते थे। यह सब देखकर राज का हृदय उनके प्रति दया से भर गया।
इस मीटिंग में और भी बड़ी-बड़ी बातें हुईं। कागजी प्रोग्राम बनाए गये। बात फिर आकर पेसे पर टिक गई। 'संगठन को पैसों की सख्त जरूरत है। टीम अलग-अलग जगहों से अभियान चलाकर पैसा इक_ा करे।Ó भाई साहब ने बात आगे बढ़ाते हुए अपना एक और निर्णय सुनाते हुए कहा कि इस समय टीम बहुत बड़ी है। क्यों न सभी लोग ट्रेन में जा कर डम्प पड़े अखबार और पत्रिकाएं बेच डाला जाये। इससे नये लोगों की ट्रेनिंग भी हो जायेगी। राज यह सुनकर अचंभित रह गया। सारी क्रांतिकारिता अखबार बेचकर पैसा इक_ा करने पर सिमट कर रह गयी। उसके सामने भाई साहब को ऐसे पेश किया जाता था जैसे कि वह साक्षात भगवान हों। वह लोगों के ऊपर अपने बातों को ऐसे प्रभाव जमाते थे कि वह चाह कर भी उनका विरोध नहीं नहीं कर पाते। उनकी हर बात को लोगों को मानना पड़ता था। जो नहीं मानते उनको राजनीतिक चेतना की कमी बताकर मनवा लिया जाता था। यह सब आलोचनात्मक मीटिंग में होती थी। यह मीटिंग किसी टार्चर रूम से कम नहीं होती थी। लोग रोने-बिलखने के बाद न चाहते हुए भी अपने को गलत साबित कर लेते थे। कार्यकर्ता अपने आप को सहमत कर लेते थे कि मेरी राजनीतिक चेतना कम है इसलिए समझने में दिक्कत होती है। रात ही में कार्यालय से वर्षों से डम्प पड़े अखबार और पत्रिकाएं मंगा ली गईं। सुबह सारे लोग अभियान टोली बनाकर ट्रेन में निकल पड़े। भाई साहब, उनकी पत्नी और अन्य बड़े नेता वहीं पर रुक गये, क्योंकि उन लोगों को आराम की सख्त जरूरत थी। ट्रेन अभियान में जमकर अखबार बेचा गया और रटी-रटाई जुमलों से लोगों की जेबें खली करवायी गयीं। हजारों रुपये इक_ा हुए और उसे लाकर भाई साहब को दे दिया गया। पैसा देखते ही भाई साहब का चेहरा खिल उठा। उन्होंने शाबासी देते हुए कहा कि तुम लोग घर-घर जाकर लोगों तक अपनी बातों का प्रचार-प्रसार करो और संगठन के लिए अधिक से अधिक पैसा इक_ा करो। उसी दिन भाई साहब भूमिगत होने के लिए दिल्ली चले गये। कार्यकर्ताओं को बताया जाता था कि नेता जी भूमिगत हैं और उधर दिल्ली-लखनऊ में गाड़ी से घूमते थे। बुद्धिजीवियों की गोष्ठी अटेंड करते थे। उनके जाने के बाद कमेटी के एक साथी रुक कर राज को भाई साहब का निर्णय सुनाते हुए कहा कि अब तुम्हें गांवों में जाना है। वहां से कार्यकर्ताओं को भर्ती करना है। वहीं तुम्हारे सारे सवालों का हल भी हो जायेगा। उन्होंने पता लिखा हुआ एक कागज थमाया और जेब से सौ का नोट निकाल कर पकड़ा दिया। इनके पास तुम्हें एक महीने तक खाना मिल जाया करेगा। इसके बाद तुम अपना देख लेना। वहां पर संगठन खड़ा करना नहीं तो घर भाग जाना। लेकिन वापस संगठन में मत आना। इसके बाद पुराने साथी चले गयेे। राज ने फटा-पुराना एक जोड़ी कपड़ा बैग में डाला और किसानों के बीच काम करने के लिए गांव की ओर रुख कर दिया। जिस पार्टी में इतने दिनों से काम कर रहा हूं उसकी क्रांतिकारी लाइन क्या है? पार्टी करना क्या चाहती है? मजदूर अखबार किसके लिए है? मजदूरों के लिए तो है नहीं? आदि ढेर सारे सवालों को दिमाग पर लादे राज चला जा रहा था। मात्र एक आश्वासन पर कि काम करते हुए पता चल जायेगा। उसे तो बस इंकलाब करनी थी और इंकलाब करने के लिए गांव की ओर निकल पड़ा।
राज को कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला। जब उसकी नींद खुली तब तक सुबह के सात बज चुके थे। मजदूर कारखानों में जाने की तैयारी में जुटे थे। कुछ तो जा भी चुके थे। वह जल्दबाजी में शौचालय में घुसा और फिर बाहर निकल आया। झुग्गियों से शौचालय के अंदर सब कुछ दिखाई दे रहा था। शौचालय चारो ओर से जीर्ण-शीर्ण बोरे से ढका हुआ था। काफी देर तक जब उससे नहीं रहा गया तो उसने 'मूदहुं आँख, कतहुं कछु नाहींÓ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए अंदर बैठ गया और आँख बंद कर लिया। नित्य कृयाक्रम से निबृत्त हो कर कुछ दवाइयां बनाई और अख्तर के पास चला गया। वहां पर तीन-चार मजदूर पहले से खड़े उसका इंतजार कर रहे थे। राज राज कहां चले गये थे? मैं कब से इंतजार कर रहा हूं। आओ चाय पीते हैं। एह कहते हुए अख्तर दुकान से चाय लाने के लिए चला गया। लो चाय पियो और हां इन लोगों को अच्छी दवा देना। अख्तर ने आंख मारते हुए कहा। उसने झोले से दवा निकाली और हाथ में पकड़ाते हुए कहा कि बाकी दवा कल देंगे। उन लोगों के चले जाने के बाद राज ने अख्तर को बिल बनाकर थमा दिया। उसने बिल देखते ही फाड़ दिया और कहा कि यह 150 रुपये की दवा थोड़ी होगी। मैं इन लोगों से पांच सौ रुपये लिया हूं और राज को पकड़ा दिया। नहीं, मैं पांच सौ रुपये नहीं लुंगा। दवा तो डेढ़ सौ रुपये का ही है। राज ने खीझते हुए कहा। यह लोग हजारों रुपये की दवा करा चुके हैं लेकिन ठीक नहीं हुए। तुम्हारी दवा से ये लोग पहले ठीक भी हो गये थे। तुम्हें झुग्गी का किराया भी तो देना है। अख्तर ने पैसे राज की जेब में डालते हुए कहा। पहले तो तुम यह बताओ कि तुम्हे संगठन से क्यों निकाल दिया गया? ऐसे हालात में घर क्यों नहीं चले जाते? राज ने दुकान से एक सिगरेट निकाला, माचिस की तीली को इतने जोर से रगड़ा कि वह टूटते-टूटते बची। जोर से सिगरेट का कश खींचा और धूएं का गुबार छोडऩे लगा। उस भयावह रात की घटना उसके दिमाग पर एक बार फिर छा गयी।
गाजियाबाद शहर में ही एक अच्छा खासा एमआईजी फ्लैट था। मकान बिना किराये का संगठन को मिला था जिसे कब्जा करने की बात चल रही थी। मीटिंग के दो दिन पहले से ही कमरे की साफ-सफाई की जा रही थी। लान में घास और फूल-पत्ती भी लगयाया जा रहा था। एक बड़े से हाल को मीटिंग रूम बनाया गया था। एक कमरे में बड़े-बड़े दो घड़े रखे गये थे जिसमें पानी भरा हुआ था। खाने के लिए बहुत ही अच्छा भोजन बनाने की तैयारी चल रही थी। क्योंकि भाई साहब मजदूर साथियों की तरह दाल-रोटी नहीं खाते थे। उनकी उन्नत चेतना में कोई बाधा न पहुंचे इसलिए उन्नत क्वालिटी का भोजन करते थे। कार्यकर्ता तो मजदूर थे और भाई साहब ठहरे उच्च मध्यवर्ग के। खैर, खुशी इस बात की थी कि दो-चार दिन अच्छा भोजन करने को मिलेगा। लेकिन बाद में पता चला कि भाई साहब और कुछ ऊपर के लोगों के लिए महंगे दामों वाली चाय की पत्ती अलग से मंगाई गई क्योंकि साधारण चाय की पत्ती उनके स्वास्थ्य के लिए घातक थी। मीङ्क्षटग हाल में आगे से तीन लाइन में कुॢसयां रखी गयीं थीं। किनारे एक मेज रखा हुआ था। जिस पर सफेद चद्दर बिछी हुई थी। उसके बगल में एक आरामदायक कुर्सी रखी गयी थी। डायरी हाथ में लिए लोग आपस में बातचीत कर रहे थे। अचानक कमरे में भाई साहब अवतरित हो गये। वे सफेद कुर्ता और पाजाम पहने हुए थे। दाढ़ी और बाल बिल्कुल काला किया गया था। भाई साहब ने रुमाल से आंख साफ करते हुए साथियों से हाथ मिलाया। हाथ मिलाने और बात करने का लहजा इस बार बिल्कुल बदला-बदला सा लग रहा था। आज तो वह असली नेता लग रहे थे। उन्होंने एक बार फिर जेब से तौलिया निकाला और आंख को साफ किया। जब भी कोई साथी उनके ऊपर सवाल उठाने के बारे में सोचता तो उसे भाई साहब के चेहरे को देखकर उसके सारे प्रश्न हवा हो जाते। वे कार्यकर्ताओं के सामने घडिय़ाली आंसू बहाया करते थे। वे बार-बार साथियों को अपने हाव-भाव से यह यहसास दिलाने की कोशिश करते कि मैं बहुत बीमार रहता हूं। मेरी आंखें खराब हो चुकी हैं। अमेरिका में इसकी दवा चल रही है। इसके बावजूद मैं खुश हूं और क्रांति का काम करता हूं। तुम लोग इससे शिक्षा लो। वह जब मीङ्क्षटग में लोगों से बात करते तो ऐसे लगता जैसे कि उनके एक-एक शब्दों में जादू हो। लोग उसके धारा प्रवाह बातों के बहाव में बह जाते थे। उसे बातों का जादूगर कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा।
मीङ्क्षटग की शुरुआत टीम लीडर द्वारा लिखे कुछ बिंदुओं से हुई। 'सबसे पहले हम संगठन की जरूरतों के बारे में बात करें, जो मुख्य है। भाई साहब ने टिशू पेपर से अपनी आंखों को पोछते हुए कहा कि इस बार हम लोगों ने पुस्तक मेले के लिए पांच स्टाल बुक कराये हैं। ढेर सारी किताबों को छापने का निर्णय भी लिया गयाा है। कुछ किताबें छप भी चुकी हैं। हमें राजकमल प्रकाशन को टक्कर देना है। इसके लिए तुम लोगों को अभियान चलाकर सहयोग राशि जुटानी होगी। दिल्ली एनसीआर में ढेर सारे बुद्धिजीवी बेकार पड़े हुए हैं। उनसे पैसे निकलवाने हैं। बुद्धिजीवी तो 'केंचुएÓ होते हैं, इनसे केवल पैसा ही खींचा जा सकता है। इसी में उनकी परीक्षा भी हो जायेगी।Ó बुद्धिजीवियों को 'केंचुआÓ की संज्ञा देना भाई साहब का जुमला था। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि संगठन में बहुत से ऐसे खर-पतवार भी उग आते हैं जो पार्टी को आगे बढऩे में बाधा पहुंचाते हैं। इन्हें 'लोहे के झाड़ूÓ से झाड़-पोंछ कर साफ कर देना चाहिए। कुछ महत्वपूर्ण लोगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। जिनके बारे में आप लोगों को जानना कोई मायने नहीं रखता, बल्कि और अधिक जोश के साथ काम में जुट जाना चाहिए। आवेश में बोलते हुए भाई साहब ने अपना हाथ मेज पर पटका। गुस्से से उनकी दाढ़ी के बाल फड़कने लगे थे। आंखें पहले से भी और ज्यादा लाल हो चुकी थीं। जो राज के ऊपर टिकी थीं। यह देखकर राज हर बार की तरह इस बार भी डर-सा गया। वह डर के मारे अपनी बातें वापस लेने के मूंड में आ गया था। वह सोचने लगा कि मैं कैसे बहस करुंगा? मैंने किताबें भी तो बहुत कम पढ़ी है। वह सोच ही रहा था कि भाई साहब की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।
''ऐसे समय में लोग संगठन में सवाल उठाते हैं, जो क्रांति के लिए गलत है।ÓÓ भाई साहब की आवाज इतनी ऊंची थी कि पुरा हाल गूंज उठा। सभी साथी ध्यान से सुनते हुए हां में हां मिला रहे थे। उसमें से किसी की हिम्मत नहींं थी कि वे कोई सवाल कर सकें। वह लोग क्रांति के प्रति बेहद ईमानदार लोग थे, इसमे कोई शक नहीं। इनकी पृष्ठभूमि गांव की थी इसीलिए जल्दी ही शब्दों के जाल में फंस जाया करते थे। राज की ओर हाथों से इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि 'तुम भी सोच लो कि तुम्हें क्या करना है? तुम जब से संगठन में आये हो लोगों को परेशान कर रखे हो। हर समय सवाल पर सवाल खड़ा करते जा रहे हो। सहयोग तो इक_ा नहीं कर पाते हो। चले हो मजदूरों का संगठन बनाने। आज हम मजदूरों को जोड़कर क्या करेंगे। अभी अगले बीस सालों तक क्रांति तो होनी नहीं है। हमें नौजवानों को जोडऩा है इसलिए नौजवान भारत सभा का गठन कर लिया गया है। आप लोगों को यह बात बताना जरूरी भी है। नौजवान जुड़ेंगे तो पार्टी गठन के लिए एक मौका मिल जायेगा।Ó भाई साहब ने राज की ओर उंगली उठाते हुए कहा कि 'तुम एक घंटे में सोच कर बताओ कि तुम्हें क्या करना है? मैंने सुना है कि तुम वर्षों से जिस लड़की से प्रेम करते हो, उसे घर से भगाकर शादी करना चाहते हो। तुम्हें नहीं पता कि क्रांतिकारियों को शादी नहीं करनी चाहिए। सोच लो! इससे संगठन की बदनामी होगी। ऐसा करने पर तुम्हें संगठन से निकाल दिया जायेगा। अब हम लंच करने के बाद दोबारा मीङ्क्षटग में बैठते हैं। उन्होंने कुर्सी से उठते हुए कहा।
राज बोझिल दिमाग से कुर्सी से उठा और कमरे में चहलकदमी करने लगा। सभी साथी आपस में बात करते और बीच-बीच में हंसी-मजाक भी कर लेते थे। वह भी उनमें शामिल होना चाहता था। लेकिन उसके साथी उससे बात करने में ऐसे कतरा रहे थे जैसे कि वह कोई क्षय रोगी हो।
जून का महीना था। ठीक-ठीक तारीख याद नहीं। बाहर भयंकर गर्मी थी, लू बरस रही थी। अगल-बगल पेड़ की छाया भी नहीं था। सड़कों के किनारे जो पौधे लगे हुए थे उसके पत्ते धूप में मुरझा गये थे। आदमी की छोड़ो उस कालोनी मे बाहर कोई कुत्ता भी नहीं दिखाई दे रहा था। वह सड़कों का चक्कर लगाता हुता कभी भाई साहब, तो कभी साथियों के बारे में सोच रहा था। उसके सवाल कभी हवा की ठंडे झोंके की तरह दिमाग पर आते तो कभी आंखों से ओझल हो जाते। क्या यही वह भाई साहब थे जिनकी लेखनी में जनवादी केंद्रियता साफ शब्दों में झलकती थी। पार्टी में सवाल उठाना हर कार्यकर्ता का धर्म होता है। लेकिन आज जब हम सवाल उठा रहे हैं तो वह धर्म कहां चला गया। समाजवाद में हर किसी को प्रेम करने का अधिकार है। अगर कोई नौजवान पुराने सामंती समाज से बगावत करके पे्रम करता है और प्रेमी युगल भाग कर शादी कर लेते हैंं तो इसमें गलती क्या है? लेकिन भाई साहब इसे अपने पार्टी के लिए गलत मानते हैं। यह कहां का इंशाफ है? वह घृणा से भर उठा और जोर से थुक की पीच मारा। उसने घड़ी पर नजर डाली जो शाम के तीन बजा रही थी। उसे बाहर घूमते हुए एक घंटा बीत चुका था। वह वापस मीङ्क्षटग हाल की तरफ मुड़ गया।
मीङ्क्षटग शुरू हो चुकी थी। वह खाली कुर्सी पर जा कर बैठ गया। डायरी के पन्नों पर कुछ लिखने ही जा राहा था कि निस्तब्धता को भंग करती हुई भाई साहब की आवाज से वह चौंक पड़ा।
''तुम्हारा टारगेट का सवाल लेनिन, माक्र्स, माओ और स्टालिन को ठेंगे पर रख दिया है। तुमने महान क्रांतिकारियों का अपमान किया है। तुम जानते हो, तुम्हारे ऊपर क्या कार्रवाई होगी? तुमको संगठन से निकाल दिया जायेगा। जो संगठन के खिलाफ खड़ा होता है, पार्टी की बात को बाहर ले जाता है, उसे रास्ते से हटा भी दिया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक बार रूस की पार्टी में एक जासूस घुस आया था। यही नहीं बल्कि लेनिन की कमेटी में भी जा बैठा। उनकी पैनी निगाह ने उसको पहचान लिया और बाद में उसे रास्ते से हटा दिया गया। तुम भी सोच लो! तुम्हें क्या करना है और अपनी बात रखो।ÓÓ भाई साहब का चेहरा गांजर की तरह लाल हो चुका था, आंखें मिचमिचा रही थीं। उसने अपने चेहरे को नीचे की तरफ झुकाते हुए अपनी बात को विराम दिया।
राज जवाब देने से पहले अपने बारे में सहानुभूति का एक शब्द सुनने की उम्मीद से साथियों की ओर देखा। लेकिन किसी साथी ने न ही कुछ बोला और नहीं किसी ने उसकी ओर अपना चेहरा घुमाया। वह बिल्कुल डर गया था। उसको रुलाई आ गयी। आंखों से आंसू टपक पड़े। आज उसको एहसास हुआ कि काश वह माक्र्स, लेनिन और माओ को पढ़ा होता तो गलत सही का निर्णय कर सकता था। वह संगठन में दस वर्षों तक विचारधारा तो कम बल्कि भावनाओं के आधार पर अपने आप को क्रांति को समर्पित कर चुका था। जब भी वह सवाल करता तो संगठन का एक ही जवाब होता कि तुम्हारे अंदर किसानी मानसिकता हाबी है, इसलिए काम के समय ऊलजलूल सवाल करते हो। राज इस बार किसी भी कीमत पर अपने सारे सवालों को रख देना चाहता था। क्रांति के लिए जीवन मरण का सवाल है। उसने आंख से आंसू पोछा और डायरी का पिछला पन्ना पलटते हुए बोलना शुरू किया।
आज तक आपने मेरे किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया। हर मीङ्क्षटग में आप टालते रहे। लेकिन इस बार जवाब देना ही होगा। राज बिना रुके बोलता रहा। पहला सवाल तो यह है कि हमारी पार्टी की लाइन क्या है? हम क्यों सभी संगठनों से अलग हैं? यही नहीं बल्कि पंद्रह-बीस सालों में हमारा कोई दस्तावेज नहीं निकला। दूसरी बात यह है कि जो मजदूर अखबार हम निकालते हैं, उसके एक-एक शब्द मजदूरों की जिंदगी से मेल नहीं खाते, पढ़कर समझ पाना तो खयाली पोलाव होगा। वह शिर्फ बुद्धिजीवियों का अखबार है, इसे पार्टी क्यों नहीं मानती? जब भी कोई आंदोलन खड़ा किया गया, पार्टी उसे हर समय रोकने का भरसक कोशिश की है। यही नहीं बल्कि आंदोलन का नेतृत्व कर रहे साथी को डाउन करने का प्रयास किया गया। उसके अंदर व्यक्तिवाद और मध्यवर्गीय भटकाव की सोच कहकर वहां से हटा दिया गया। ऐसा क्यों? संगठन के साथियों से बिना बताये देहाती मजदूर किसान यूनियन से किसान यूनियन हटा देना कहां का न्याय है? वह जवाब के लिए भाई साहब की ओर देखने लगा। लेकिन भाई साहब लिखने में व्यस्त थे। बाकी साथी डायरी के पन्नों के बीच खोये हुए थे। एकाएक भाई साहब ने अपना सिर ऊपर उठाया और आवेश आते हुए कहा कि 'तुम्हारे सारे सवाल बे-बुनियाद हैं। उनका जवाब देने की जरूरत नहीं है। जवाब उसे दिया जाता है जो संगठन में होता है। तुम्हें तो पार्टी पहले ही निकाल चुकी है। इसके बावजूद यदि साथी चाहें तो तुम्हें एक मौका और दिया जा सकता है। तुम टारगेट के सवाल पर स्वीकार करो कि तुम गलत हो। और सारी बातों का लिखित आत्मलोचना दो। इसके लिए कुछ समय भी दिया जा सकता है। इसके बाद भी संगठन में किस स्तर पर काम करोगे यह बात पार्टी तय करेगी।Ó भाई साहब ने कहा। तीन रुपये का अखबार बेचना माओ का टारगेट नहीं है। आप क्यों माओ और लेनिन को बदनाम कर रहे हैं? हम विचारधारा को किनारा कर केवल अखबार बेचें, क्रांति के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है। माओ और स्टालिन के टार्गेट के बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था। यह तो मात्र दस-दस अखबार बेचने का सवाल है। उसने समूह पर चारों ओर एक नजर डाली और पहले से तय किये गये जवाब का इंतजार करने लगा।
''तुम्हारे सारे सवाल मनगढ़ंत हैं। यह पार्टी के प्रति तुम्हारा पूर्वाग्रह है। तुम्हे किसी विरोधी ने गुमराह किया है। मजदूर अखबार बेेचने का टारगेट मेरा था और पार्टी कोई भी निर्णय सोच समझकर लेती है। आज के समय में क्रांति के लिए आंदोलन नहीं बल्कि पार्टी गठन जरूरी है, जिसके लिए अपने आप को खपा देना है। आंदोलन में फंसकर हम शिर्फ आंदोलनकारी होकर रह जाएंगे।ÓÓ उन्होंने समूह को अपनी बातों में लेते हुए कहा कि आज नौजवानों को भर्ती करना और किताबें छापना हमारे लिए मुख्य है। राज के साथ क्या किया जाए? इस पर समूह सोचे। भाई साहब ने कुर्सी से उठते हुए कहा।
समूह का भी निर्णय वही था जो भाई साहब का था। भला उसके इतर कोई कैसे बोल सकता है। राज को पार्टी से निकाल दिया गया। उसे उसी रात यह कह कर कि बाद में साथी तुम्हारे सवालों का जवाब दे देंगे, नोएडा आफिस में जाने को कह दिया गया। इधर बाकी साथियों के साथ एक और मीटिंग हुई।
रात भर वह इसी उधेड़बुन में लगा रहा। उसके अंदर सवालों के अंबार लगे हुए थे। यही वह जगह थी जहां से उसे सही जवाब मिलने की उम्मीद थी। जिन्हें वह आज तक आदर्श मानता रहा आज उसी ने अपना असली चेहरा दिखा दिया। आज आदर्श का ओढ़ा हुआ लबादा उठाकर फेंक दिया। जैसे कि मानो कह रहा हो कि यही मेरा असली रूप है। तुम देख लो। तुम अदने से कार्यकर्ता आखिर क्या कर सकते हो। वह तो बस लोगों को पार्टी से जोड़ सकता था, लेकिन मध्यवर्ग से पैसा वसूलने में फिसड्डी था। हर बात में वह तर्क करना चाहता था लेकिन ऐसा करने के लिए साहस नहीं जुटा पाता।
सुबह दस बजे के करीब सभी साथी नोएडा कार्यालय पहुंचे और राज के साथ एक छोटी-सी मीटिंग हुई। 'संगठन ने यह निर्णय लिया है कि तुम शाहबाद डेरी वाले क्षेत्र में जाकर अपनी होमियोपैथिक दुकान चलाओ। वहां पर तुम्हें पार्टी साहित्य भेज दिया जायेगा। तुम वहां से अपने संपर्कों की लिस्ट बनाकर पार्टी को पोस्ट कर देना। इस तरह तुम्हे एक साल तक संगठन से अलग रहना पड़ेगा। एक साल बाद तुम अपनी लिखित आत्मलोचना पार्टी तक पहुंचा देना।Ó इस बात पर जोर देते हुए टीम लीडर ने कहा। याद रहे सही काम करोगे तो समय से पहले भी तुमसे बात की जा सकती है। तुम अगर अपनी गलती मान लो तो तुम्हे किसी पत्रिका का संपादक बना देंगे। छोटे नेता ने लालीपाप पकड़ाते हुए कहा।
अब मुझे संगठन में नहीं रहना है। मैंने तय कर लिया है। राज ने जवाब दिया। मुझे किराया मिल जाए तो मैं घर चला जाऊं। इस समय मेरे पास एक भी पैसा नहीं है। 'यहां से तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा। बस एक जून की रोटी आकर खा सकते हो।Ó दो दिन पहले मैंने जो डेढ़ सौ रुपये आपको दिया था, उसे ही वापस कर दो। राज ने आवेश में आकर कहा। यही पचास का नोट है, इसे ले जाओ। छोटे नेता ने अपनी जेब से निकालते हुए कहा। राज को जबरदस्त झटका लगी। वह उस पैसे को फेंक देना चाहता था, लेकिन यह सोच कर रख लिया कि यह पैसा तो उसी का है और बिना कुछ सोचे-समझे चल दिया।
खंड- दो
राज अभी झुग्गी बस्ती में पहुंचा ही था कि नल से पानी आने का समय हो गया था। एक नल के पास दर्जनों लोग लाइन में खड़े थे। हर कोई अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। लोग गैलन, भगौना आदि में पानी भर कर ले जा रहे थे। कुछ लोग जबरन पानी भरने की कोशिश करते जिससे आपस में हाथापाई भी हो रही थी। इस झगड़े का फायदा उठा कर कुछ लोग बिना लाइन के ही पानी भरते और चले जाते। राज भी लाइन में खड़ा रहा। लगभग एक घंटे में उसका नम्बर आया। तब उसने पानी लिया और झुग्गी पर पहुंच गया। सबसे पहले उसने किराये के चार सौ रुपये झुग्गी मालिक को पकड़ा दिया और अंदर जा कर लेट गया। खाना बनाने के लिए तो कुछ था नहीं इसलिए वह आराम करने के शिवाय और कर ही क्या सकता था। वह सौ के नोट को जेब से निकालता और फिर वापस रख लेता। कल तक उसके जेब में पचास का नोट था और आज पूरे सौ का। इसी नोट से उसे ङ्क्षजदा रहने के लिए खाने की व्यवस्था भी करनी थी और उन मरीजों के लिए दवा भी खरीदनी थी। वह कुछ देर झुग्गी में आराम करने के बाद फिर दिल्ली स्थित अशोक नगर कालोनी में अपने एक मित्र डाक्टर से मिलने चल दिया।
आओ कामरेड! कैसे हो? धन्य भाग्य जो दर्शन हुए आपके। डाक्टर पुराने कम्युनिस्ट थे, जो पार्टी छोड़कर अपने रोजी-रोटी में जुटे हुए थे। उनकी उम्र 70 वर्ष को पार कर चुकी थी। लेकिन बात करने और चाल-ढाल में फुर्ती इस कदर थी कि उन्हें नौजवान कहना गलत नहीं होगा। उनकी दाढ़ी और मूंछें सफाचट थीं। वह दुबले-पतले और नाटे कद के व्यक्ति थे, जो उनकी चंचलता में एक मायने रखता है। वह बात बहुत करते थे। मरीजों को दवा का बूंद पिलाते-पिलाते भूल जाते थे कि वह मरीज है और उसे देश-दुनिया की राजनीति में क्या चल रहा है, दवा के साथ पिला देना चाहते थे। डाक्टर साहब दवा दीजिए और मैं चलूं। राज ने उनके बातों के तारतम को तोड़ते हुए कहा। बैठो कामरेड! इतनी जल्दी क्या है। दो चाय लाना, डाक्टर ने दुकानदार की ओर इशारा करते हुए कहा। अभी आपको जाने नहीं दुंगा, बहुत दिनों बाद मिले हो। संगठन में आजकल क्या चल रहा है? कोई साहित्य भी नहीं मिला है। मैंने तो संगठन छोड़ दिया है और अब बाहर भी आ गया हूं। राज ने जवाब दिया। मैंने तो पहले ही बता दिया था कि यह लोग गलत हैं। अच्छे लोगों की तलाश करें। यह धरती बंजर नहीं है। अभी समाज में कई ऐसे अच्छे लोग मौजूद हैं, जो सही रास्ते पर काम रहे हैं। यह भी एक विडम्बना है कि युवा पीढ़ी बड़ी-बड़ी बातों में बहुत ही जल्दी फंस जाती है। जिसका फायदा ऐसे फराड करने वाले उठाते हैं। डाक्टर का चेहरा तमतमाया हुआ था। और उनके हाथ हिलने लगे जैसे कुछ खोज रहे हों। उन्होंने दराज में हाथ डाला और एक अखबार को राज की तरफ बढ़ाते हुए कहा कि इसको मजदूर अखबार बताते हैं लेकिन इसकी भाषा को कितने मजदूर हैं जो समझते होंगे।
यह बात तो सही है, लेकिन आज मुझे दवाऐं चाहिए। मैं अभी पैसा नहीं दे पाउंगा। जैसे-जैसे दवाएं बिकेंगी पैसा वापस कर दुंगा। इतना तो आप जानते ही हैं कि झुग्गियों में मजदूर रहते हैं जो पूरा पैसा तो देंगे नहीं। उसने सामान्य ढंग से बात करते हुए डाक्टर से कहा। डाक्टर ने दवाओं की कुछ शीशियां राज को पकड़ा दिया। वह इस बात से खुश था कि चलो एक-दो जून की रोटी का सहारा तो मिल गया। राज ने अख्तर के पास पहुंच कर दवाएं दी और झुग्गी में वापस चल दिया। कई रात जागने और धूप में घूमने से उसका शरीर अकड़ रहा था। उसने गंदे पानी को बिना हिलाए बोतल का ढक्कन खोला गटागट पी गया।
भीषण गर्मी के बावजूद उसकी नींद सुबह के लगभग छह बजे ही खुल गई। वह उठा तो पसीने से लथपथ था। कमरे में पंखा भी नहीं था जिससे शरीर को थोड़ा आराम मिल सके। वह दवाओं को एकटक देख रहा था और किसी सोच में डूब गया। वह सोचने लगा कि होमियोपैथ की जानकारी हासिल करने में उन साथियों का कितना बड़ा योगदान रहा है, जिन्होंने एक अनजान गांव में दो वर्षों तक साथ दिया था। कितने भले लोग थे, जिनका पार्टी ने इस्तेमाल किया था।
झोला टांगे वह मऊ जिले के एक छोटे-से कस्बे मर्यादपुर में पहुंच गया। वह पता पूछते हुए एक होमियोपैथिक दवा खाना पर पहुंचा। वहां एक छोटा-सा मकान था। उसमें लकड़ी के दो रैक बने हुए थे। एक में ढ़ेर सारी किताबें थीं और दूसरे में दवाओं की शीशियां। उन दोनों के बीच में टूटा हुआ पुरना एक मेज था। बीच की कुर्सी पर खादी का फटा हुआ पुराना कुर्ता पाजामा पहने लगभग साठ वर्ष का एक व्यक्ति बैठा हुआ था। उसकी दाढ़ी और बाल सफेद हो चुके थे। वह आंखों पर चश्मा चढ़ाए किसी किताब के पन्नों के बीच खोया हुआ था। उसने एक बार नजर ऊपर को उठाई और कुर्सी से उठते हुए राज को तपाक से गले लगा लिया। आप सही जगह पहुंच गये हो कामरेड। उन्होंने कुर्सी पर बैठाते हुए कहा। उन्होंने दराज से गुड़ का एक टुकड़ा और एक गिलास पानी पकड़ा कर चाय लाने चले गये। चाय लाने की देर थी कि डाक्टर ने चाय का पूरा इतिहास ही बता डाला। यहां चाय पचास पैसे का मिलता है। बहुत अच्छी चाय है। इसमे बस एक ही कमी है कि कुल्हड़ बहुत छोटा है। उन्होंने एक ही घूंट में चाय पीते हुए कहा। वह एक घूंट के लायक ही थी क्योंकि उसकी मात्रा पच्चीस एमएल से अधिक नहीं रही होगी। राज का वहां दूसरा नामरण किया गया और उसे काम करने की स्थिति समझा दिया गया।
शाम को कई और साथियों से मुलाकात हुई। करीब-करीब सभी साथी उम्रदराज थे। एक थे पंथीजी, जो अब नहीं रहे। वह बिरहा गाने में माहिर थे। पंथी जी की पत्नी महिला संगठन से जुड़ी थीं जो बच्चों के एक स्कूल को संचालित करती थीं और खेतीबाड़ी का काम करती थीं। दूसरे साथी इंदर का तो लगभग शरीर ही साथ छोड दिया था। वह लकवा का शिकार हो चुके थे, इसके बावजूद मजदूर अखबार और पर्चे लेकर दूर-दूर तक चले जाते थे। उनके पास समय बहुत कम बचता था क्योंकि बीबी और बच्चों का पेट पालने के लिए गले में टोकरी टांग कर पूरे बाजार में भूजा बेचते थे। जो कुछ बचता उससे शाम को चावल, आंटा खरीदकर घर ले जाते थे जो प्रतिदिन का काम था। उनके पास भी खेती नहीं थी। वे चंग बजाने के मास्टर थे। साथी यादव जी तो कमाल के आदमी थे। वह क्रांतिकारी राजनीति पर चर्चा करते-करते भैंसों की चर्चा शुरू कर देते थे। दूसरे साथी द्वारा रोकने के बाद तत्काल अपने रास्ते पर वापस आ जाते थे। वह दिल के बहुत ही साफ व्यक्ति थे। यादव जी अपनी सारी कमजोरियों को लिए दिये क्रांति के प्रति समॢपत थे। उन सभी के लिए एक सही राजनीतिक संगठन की जरूरत थी, जो वहां पर थी ही नहीं। उनकी दो लड़कियां और एक लड़़का पढ़ाई करते थे, जिसका खर्चा भैंसों की खरीद-परोख्त करके पूरा करते थे। छोटी लड़की संगठन से जुड़ी थी। वह लोकगीत ओर बिरहा बहुत अच्छी तरह गाती थी। सांस्कृतिक टोली की इस कला को संगठन ने विकसित नहीं किया बल्कि आलोचना करके उसे खत्म ही कर दिया। दो और साथी काशी और हरिंदर थे, जो नौजवानी को पर कर रहे थे। वह भी लगन और निष्ठा से संगठन का कार्य करते थे। लेकिन संगठन ने उनके अंतरविरोधों को हल करने के बजाय किसानी कूपमंडूकता का संज्ञा देते हुए हाथ पीछे कर लिया और उन्हें गर्त में जाने के लिए छोड़ दिया। लालू और किशोरी भी कई सालों से संगठन के सांस्कृतिक टोली से जुड़े रहे। वे गांवों में मेहनत मजदूरी करके अपनी जीविका चलाते थे। जो भी हो राज के जाने के बाद लोगों में एक बार फिर राजनीतिक हलचल पैदा हो गई।
राज को डिस्पेंसरी पर रात अकेले ही बितानी पड़ी। उस समय ठंडी का मौसम था इसलिए नीचे ही पुआल बिछाकर उसके ऊपर से जूट का बोरा डाल दिया गया था। शरीर ढकने के लिए एक कम्बल रखा था। उस बस्ती में इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। दो-तीन रात तो उसे नींद ही नहीं आयी। क्योंकि डिस्पेंसरी के पीछे एक बरामदा था जिसपर टिन का छज्जा लगा हुआ था और बाहर खाली मैदान था। हवा इतनी तेज चल रही थी कि एक कम्बल से ठंडक जाने का नाम ही नहीं ले रही थी। ऊपर से एक कोबरा सांप उसी जगह पर अपना आशियाना बना रखा था। रात में और कभी-कभी दिन में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता था। कभी-कभार तो फन फैलाकर सलामी भी दे दिया करता था। समय बीतता गया और राज इन सबका आदी होता गया। वह खाली समय में होमियोपैथिक दवाओं का अध्यन करता था। रात में वह उसी पुआल में दुबका हुआ था कि किसी ने जोर से दरवाजा पीटा। उसने दरवाजा खोला तो सामने दो महिलाएं एक बुजुर्ग व्यक्ति को पकड़े खड़ी थीं। उनको दवा देने से राज ने मना कर दिया। क्योंकि अभी तो उसे दवाओं के बारे में जानकारी भी नहीं थी। काफी रोने-धोने पर उसने किताब पलटी और एक-दो सीसियों में से दो बूंद दवा पिलाई और एक सीसी में गोलियां भरकर पकड़ा दिया।
राज सुबह झाड़ू लगा रहा था कि तभी उसकी निगाह रात वाले मरीज पर पड़ी। वह बीड़ी का कस खींचते हुए सड़क पर चहल-कदमी कर रहा था। उसने बताया कि दवा पीने के दस मिनट बाद ही वह ठीक हो गया था। अब वह बिल्कुल ठीक है। उसके बाद से वह डाक्टर साहब से नहीं बल्कि राज से ही दवा लेता था। राज ने दो माह तक जमकर होमियोपैथ की किताबें पढ़ी और संगठन को खड़ा करने में उसका प्रयोग भी किया।
राज को दो-तीन महीने तक खाने के लाले पड़ते रहे। कभी वह पत्ता गोभी में नमक मिलाकर कच्चे खा जाता तो कभी कच्चा टमाटर। कभी-कभी किसी साथी के घर खाना मिल जाता था। मेहनत मजदूरी करके दो जून की रोटी जुटाने वालों के घरों पर रोज-रोज खाना अच्छा नहीं लगता था। इसलिए वह ज्यादातर झूठ बोल देता था कि अमूक साथी के वहां खाना खा कर आया हूं। एक जून का भोजन तो डाक्टर साहब कभी-कभी सुबह में डिस्पेंसरी पर ही पहुंचा दिया करते थे। सुबह खने के बाद शाम को खाने की जरूरत नहीं थी।
धीर-धीरे संगठन का काम बढ़ता गया। युवाओं का संगठन नौजवान भारत साभा का काम भी बढऩे लगा। अब जिम्मेदारी बांट दी गई। मजदूरों किसानों का ज्यादातर जिम्मेदारी डाक्टर साहब को दे दिया गया और बाकी को बखूबी राज निभाता था। लोग भारी संख्या में संगठन से जुडऩे लगे। अब उन्हें एक प्लेटफार्म पर लाने की जरूरत थी। वे अपने अधिकार की लड़ाइयां भी लडऩे को तैयार हो रहे थे। इसकी सूचना जब पार्टी नेतृत्व को मिली तो उसने राज को एक बार फिर कटघरे में ला खड़ा किया। गोरखपुर से एक सीनियर साथी सीधे मर्यादपुर पहुंच कर राज को भाई साहब का आदेश सुना दिया 'तुम्हारे अंदर व्यक्तिवाद पैदा हो रहा है। तुम खुद किसान बनते जा रहे हो। हमें जनता के कहने पर नहीं जाना है। अभी क्रांति नहीं होने जा रही है, इसलिए युवाओं को भर्ती करो और आंदोलन से पीछे हट जाओ।Ó निर्णय सुनाकर राज के सीनियर साथी वापस चले गये। राज उदास होकर अपने कार्यालय पर लौट आया। उसे देखते ही कुछ साथी भी पहुंच गये। उसने भाई साहब द्वारा कही गयी बातों को हुबहू रख दिया। लोग उदास हो गये और एक-एक कर वापस चले गये। साथियों के बीच अंतरविरोध पैदा होने लगे। राज ने सरी घटना की रिपोर्ट नेतृत्व को भेज दी लेकिन नेतृत्व ने उस पर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। इसी बीच दो साथियों को जो होलटाइमर बनने के बारे में सोच रहे थे, उन्हें गोराखपुर भेज दिया गया। कुछ दिन बाद उन्हें यह कहते हुए लौटा दिया गया कि अभी इनकी सोच गांवों जैसी है। इसलिए शहर में नहीं रख सकते। क्षेत्र में काम करते हुए कई तरह की समस्याएं उठनी शुरू हो गयीं। राज के अंदर सवाल भी पैदा होने लगे जिसपर नेतृत्व ने ध्यान नहीं दिया। इन सवालों का एक रिपोर्ट भी नेतृत्व को सौंप दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि कमेटीे के एक साथी एक दिन मर्यादपुर आ टपके और राज को संगठन का निर्णय सुनाते हुए कहा कि 'तुम्हे दिल्ली जाना होगा। वहां पर मजदूरों के बीच काम करना है क्योंकि किसान नहीं बल्कि मजदूर क्रांति करेंगे। तुम यहां पर काम करते हुए फेल हो गये हो चुके हो।Ó इतना सुनते ही राज के पांवों तले जमीन खिसक गई।
उसने सोचा कि यह कहां का न्याय है। मैंने अपने सवालों का जवाब मांगा, समस्याएं गिनाई और उसे हल करने के बजाय संगठन यहां से बोरिया-बिस्तर समेटने की बात कर रहा है। दो साल का मेहनत किसी काम का नहीं। इन साथियों पर क्या बीतेगी? राज ने गुस्से में जवाब दिया। संगठन के साथी तिलमिलाए लेकिन कुछ कहे नहीं। उनको तो बस भाई साहब का आदेश सुनाना था। उसके सोचने की तारतम को भंग करते हुए उन्होंने कहा कि 'संगठन का यह निर्णय है कि तुम अपने हिस्से की जमीन बेचकर संगठन को दे दो। होलटाइमर कार्यकर्ता के पास व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होती है। अभी तो यहां के कामों पर बात करनी है कि आखिर यहां से कामों को क्यों समेटा जा रहा है? लेकिन उनका बस एक ही जवाब था कि दिल्ली चले जाओ वहीं पर सारे सवालों का जवाब मिलेगा। बाकी बात भाई साहब करेंगे। दिल्ली जाने का खर्च और किराया भी लोगों के बीच से ही तुम्हे निकालना होगा। उन्होंने अपना झोला उठाते हुए आदेश सुनाया और चलता बने। राज को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। अचानक उसे जोर की खांसी आई और वह उठ बैठा। अभी तो रोटी की तलाश में निकलना है। राज ने घड़ी पर नजर डाली जो टिक-टिक करती हुई सुबह का सात बजने का संकेत दे रही थी। वह चाय पीने के लिए चाय दिया।
वह सिगरेट जलाया और चाय की दुकान पर बैठकर धुएं का गुबार छोडऩे लगा। उसे एक पुराने साथी की याद सताने लगी, जो करीब दो साल पहले संगठन से जा चुका था। उससे मिलने की उत्सुकता हुई और वहां जाने के लिए तैयार हो गया। पहले की एक घटना उसे याद आते ही वह सहम गया। उसे यह सोच कर शर्म आ रही थी कि वह कितना डरपोक था, जो सही निर्णय भी नहीं ले सकता था। उसे याद आया कि यदि वह उस साथी का साथ दिया होता तो बहुत पहले ही भाई साहब के शब्दों के जादू से आजाद हो जाता। वह साथी कितना खुदस्मित था कि समय रहते ही सबकुछ समझ गया था। उस समय उसके सवालों को सही मानते हुए भी उसने उसका साथ भी नहीं दिया था। वह साथी बिल्कुल अलग-थलग पड़ गया था। राज ने सिर को एक झटका दिया और ग्लानि से भर उठा। उसने मन बनाया कि चाहे जो हो उस साथी से मिलना तो है ही। उसने दूसरी सिगरेट जलायी और धुएं का बादल बनाते चल दिया।
अजय गोरे रंग की आभा लिए हुए मोटा-तगड़ा करीब साढ़े पांच फुटा नौजवान था। वह लोगों को अपनी ओर आकॢषत करने में काफी माहिर था। उसने भी नेतृत्व के साथियों से पार्टी लाइन और पार्टी साहित्य पर सवाल उठाया था। वह नोएडा में कई छोटे-छोटे मजदूर आंदोलन खड़ा कर चुका था, जिसे पार्टी ने हर वक्त दबाने का प्रयत्न किया था। उसे इसी सवाल की वजह से कई बार निकाला भी जा चुका था। बाद में पार्टी ने अपनी जरूरत के लिए एक बार फिर से बात करके उसे संगठन में शामिल कर लिया था। वह भी होलटाइमर कार्यकर्ता था। उस बार उसने पार्टी नेतृत्व से बहस करने का पूरा मन बना चुका था। इसके लिए टीम को भी अपने सवालों पर सहमत कर लिया था। इस बात की भनक लगते ही पार्टी ने फूट 'डालो और राज करोÓ वाली नीति अपनाते हुए सभी साथियों से अलग-अलग मीङ्क्षटग की और कार्यशाला में शवालों का जवाब मिल जायेगा, कहकर टाल दिया।
हरियाणा सोनीपत इलाके में एक कार्यशाला लगा था। उसमें अलग-अलग जगहों की टीम आई हुई थी। कार्यशाला के दूसरी मीङ्क्षटग में कार्यकर्ताओं के सवालों का जवाब देना था। लेकिन वहां पर कागजों पर बंकर खोदे जा रहे थे। सैनिक युद्ध की तैयारी में इधर-उधर छुपे हुए थे। कितनी मजेदार बातें थीं वह। राज ने सोचा कि कहीं भाई साहब पागल तो नहीं हो गये। तभी एक साथी ने आखिर बोल ही दिया कि यदि हवाई हमला हो जाए तो हम लोग कैसे भागेंगे। सारे लोगों ने जोर से हंसना शुरू कर दिया, जो काफी देर से हंसी दबाए बैठे थे। कार्यशला खत्म हो गई। लोग अपने-अपने गंतब्य को वापस लौट गये।
दोपहर के लगभग बारह बज रहे होंगे कि नेतृत्व के एक साथी नोएडा कार्यालय आ धमके। उन्होंने एक आपात बैठक बुलाई और समूह के सामने अजय को पार्टी का निर्णय सुनाते हुए कहा कि 'तुम ऊलजलूल हरकतें कर रहे हो। तुम्हारे सवाल पलायनवाद और व्यक्तिवाद की उपज हैं, जिसे मध्यवर्गीय भटकाव भी कहा जा सकता है। पार्टी का आदेश है कि तुम्हें बाहर कर दिया जाए।Ó बाकी समूह कायर की तरह मूर्तिवत बैठा रहा। ऐसा नहीं कि पार्टी के प्रति राज का सवाल नहीं था लेकिन इसके बावजूद वह खुल कर बात करने से डरता था। फिलहाल अजय संगठन से निकल गया। करीब एक साल बाद पता चला कि वह नोएडा के किसी अखबार में नौकरी कर रहा है और साथ में ऐसे ही समाज को बदलने के बारे में सोच रखने वाले संगठनों में सहयोग भी करने लगा था।
राज एक अखबार के दफ्तर में जा पहुंचा और अजय से मिलने के लिए रिशेप्शन पर ही बैठ गया। राज कब आए? बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई है। कहते हुए अजय ने तपाक से हाथ मिलाया। बताओ संगठन का काम कैसे चल रहा है? मैं संगठन से निकाल दिया गया हूं। राज ने हकलाते हुए जवाब दिया। इसमें घबड़ाने की क्या बात है। कभी न कभी तो निकलना ही था। इन्हे आज्ञांकारी मजदूर चाहिए। अजय ने कहा, हथ पकड़ा और चाय की दुकान पर चले गये। दोनों ने सिगरेट जलाई और चाय पीते-पीते ढेर सारी बातें किए। मेरे पास कोई बर्तन नहीं है। तुम्हारे पास खाली हो तो दे सकते हो। राज ने उसकी आंखों में आंखें डालते हुए कहा। दोनों एक-दूसरे से विदा लिए और अपनी-अपनी दुनिया में वापस चले गये। रात में उसने अजय के पास से खाना बनाने का बर्तन लाया और झुुग्गी में गृहस्ती जमा ली। खना बनाने के लिए बर्तन का तो जुगाड़ हो ही गया। अब जरूरत थी बर्तन में पकने वाले दानों की।
वह सुबह सो कर उठा और नौकरी की तलास में फक्ट्रियों की तरफ चल दिया। प्रतिदिन वह इसी आश में फक्ट्री का चक्कर लगाता कि आज तो काम मिल ही जाएगा। नौकरी पाने की उम्मीद लगाए उसे हफ्तों बीत गये। लेकिन नौकरी नहीं मिली। फिर उसने पत्रकारिता के बारे में सोचा और अखबार के कार्यालयों का चक्कर काटने लगा। आखिर उसे शाहटाइम्स अखबार में पंद्रह सौ रुपये महीने पर नौकरी मिल गई। उसे अब खुशी का ठिकाना नहीं रहा। काम करते हुए पंद्रह दिन बीत गये। इधर राज को कई-कई दिन फांके मारने पड़े। आखिर वेतन मिलने का दिन भी आ गया। वह रात में जरूरत के सामानो ंकी लिस्ट बनाया जो वेतन मिलने के बाद खरीदना था। इसी उम्मीद से वह अफिस पहुंचा और पैसे की मांग की। आज मेरा वेतन दे दीजिए। राज ने अपने बॉस के सामने खाली पड़ी कुर्सी को खींच कर बठते हुए कहा । 'वेतन नहीं दुंगा, तुम मेंरे यहां काम ही नहीं किए हो। मैं तुम्हें जानता तक नहीं। तुम कौन हो?Ó वह कुर्सी से उठा और राज को बाहर की तरफ धक्का देते हुए कहा। राज को काटो तो खून नहीं। क्या ऐसे लोग भी समाज में मौजूद हैं। वह बाहर जाते हुए सोचा और जोर से थुक दिया। राज हार मानने वाला नहीं था। तभी किसी ने पीछे से आवाज लगाई। राज मुड़ कर देखा। हां अवस्थी जी बताओ, क्या बात है? उसने मेरा भी पैसा नहीं दिया। चलो थाने चलते हैं। उसकी एक कमजोरी मैं जानता हूं। अवस्थी ने उसके हाथ को दबाते हुए कहा। दोनों पुलिस चौकी चले गये। पुलिस वालों ने कार्रवाई करने की झंझट से बचने के लिए सुलह-सपाटा करवाकर वेतन दिलवाया। कमरे पर वापस लौटते हुए राज ने राशन खरीदा और भरपेट भोजन किया। वह जमीन पर लेट कर सोने की चेष्टा कर ही रहा था कि फिर नौकरी छूटने की संकट ने उसे आ घेरा।
धीरे-धीरे एक माह बीतने को आ गया। उसे नौकरी नहीं मिली। काफी दौड़-भाग के बाद एक सांध्य अखबार में दो हजार रुपये महीने पर काम मिल गया। अभी तीसरा महीना पूरा भी नहीं हो पाया था कि उसने भी बहाना बनाते हुए नौकरी से निकाल दिया और एक माह का वेतन भी नहीं दिया। इस बार किराया न दे पाने के कारण उसे झुग्गी भी छोड़ देना पड़ा। अभी तक तो राज से रोटी छीनी गयी थी लेकिन अब सिर के ऊपर से छत भी छीन लिया गया। इसी बीच उसकी मुलाकात झुग्गी में बुलेट बनाने वाले अब्दुल मिस्त्री से हुई।
अब्दुल पैंतीस वर्ष का युवक था जो गांजा का कश खींचते-खींचते दुबला हो गया था। उसकी एक झुग्गी थी जिसमें बरसात के समय घुुटना भर पानी भर जाता था। लेकिन उसके ऊपर लकड़ी और टाट डाला गया था, जिसपर रात में सोने का ठिकाना हो जाया करता था। राज अपने संकट के दिनों में कई रातें वाहां पर गुजारी थी। पत्रकारिता की नौकरी तो बस ऐसे ही थी। कभी मिलती तो कभी छूट जाती।
राज को एक दन घर की याद सताने लगी। वह गाड़ी पकड़़ा और लखनऊ पहुंच गया। लखनऊ में एक मित्र ने बताया कि उसके रूम पर आ जाओ। तुम्हें किसी से मिलवाते हैं। उसने फोन पर जानने की बहुत कोशिश की कि आखिर वह सख्श कौन है, जिससे मिलना जरूरी है? वह आंदोलन के आदमी हैं। उन्होंने मजदूर आंदोल के बारे में देश-दुनिया का काफी अध्यन किया है। वह भी एक नए रास्ते की खोज में निकल पड़े हैं। मित्र ने मानों उसके अंतरमन को भांप लिया हो। वह उसी अंदाज में राज की उत्सुकता को बढ़ाते हुए जवाब दिया।
राज लखनऊ के चारबाग स्टेशन से सीधे बादशाह नगर रोलवे स्टेशन पहुंचा। स्टेशन से मात्र चार सौ गज की दूरी पर एक चाय की दुकान पर अपने मित्र को बैठे देख वह तपाक से हाथ मिलाया। बगल में एक और आदमी खड़ा था। उसने भी उतनी ही गर्मजोसी से गले मिला। राज को समझ में नहीं आ रहा था कि यह आदमी कौन है, जबकि उसने भी साथी शब्द का प्रयोग किया था। राज क्या देख रहे हो? यही वह साथी हैं, जो तुमसे मिलना चाहते हैं। मित्र ने मुसकुराते हुए जवाब दिया।
वह सांवले रंग की अभा लिए हुए लगभग चालीस-पैंतालिस वर्ष के व्यक्ति थे। वह हाव-भाव से युवा तो थे, लेकिन युवक नहीं थे। उनका कद साढ़े पांच फुट से अधिक का नहीं रहा होगा। उन्होंने दोनों हाथ से तम्बाकू मेठते हुए एक-दो ताल देकर चुटकी से उठाया, होंठों के नीचे रखा और बगल में ही जोर की पीच मारी। राज को उस आदमी के अंदर अपनत्व झलक रहा था। उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। उसे वह साथी एक सामान्य जीव लग रहा था। वह महान आदमी नहीं था। राज के दिमाग में एक बार फिर भाई साहब का चेहरा घूम गया। उस संगठन में कमेटी का हर मेंबर महान आदमी होता था। लेकिन यह साथी तो बिल्कुल ही अलग था। लो चाय पियो फिर बात करते हैं। साथी ने उसके सोच को भंग करते हुए कहा। चलो थोड़़ा परिचय हो जाए। सिगरेट पियो और पुरानी बातों को धुएं के साथा उड़ाते हुए आगे बढ़ो। मित्र ने हंसते हुये कहा। राज को साथी का हाव-भाव काफी अच्छा लगा और बातचीत में शामिल हो गया।
साथी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मजदूर क्रांति तो होनी ही है। इतिहास गवाह है कि पिछले संगठन जैसे विजातीय तत्व हर समय समाज में मौजूद रहते हैं। वह सभी देशों में हो रहे जन आंदोलनों मेें बाधा पहुंचाते हैं। लेकिन यह भी कड़वा सच है कि इसी समाज में सही लाइन पर चलने वाले लोग भी हैं। जो इन तत्वों को झाड़-बुहार कर क्रांति को आगे ले जाने का काम कर रहे हैं। इससे हमें घबड़ाने की जरूरत नहीं है। एक ऐसा संगठन है जिसमें कोई महान आदमी नहीं है। उसके साथ मिलकर हम काम करेंगे। साथी ने काफी गंभीरता से जवाब दिया। बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि एक हप्ते बाद दिल्ली में एक मीङ्क्षटग है। तुम्हें उसमें आना जरूरी है। राज ने घड़ी पर नजर दौड़ाते हुए कहा कि चलो स्टेशन चलते हैं। मेरे गाड़ी का समय हो गया है।
राज घर से वापस दिल्ली आ गया। दूसरे दिन ही उसकी साथयों के साथ मीटिंग थी। वह दिल्ली के एक मजदूर बस्ती में पहुंचा। एक छोटे-से कमरे में पांच लोग पहले से मौजूद थे। उसमें दो साथी तो पहले से ही परिचित थे। सभी लोगों ने राज से गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया और बातचीत में शामिल हो गये। ''आज देश में क्रांति की जरूरत है। इस लाइन पर कई ऐसे संगठन काम भी कर रहे हैं। उसमें से कई तो ऐसे हैं जिनके हाथों से क्रांति का रास्ता फिसल कर बहुत दूर चला गया है, जिसे पकड़ पाना उन लोगों के बस का नहीं है। हमें भी इससे शीख लेनी चाहिए कि आखिर क्या कमी थी जिसकी वजह से लोग न चाहते हुए भी प्रतिकृयावाद की तरफ जाने लगे हैं। अब हम लोग इसी रास्ते पर काम करेंगे। हमारी पार्टी में पूर्ण रूप से जनवादी केंद्रियता होगी। सबको सवाल उठाने का हक होगा। तभी हम एक सही क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर सकेंगे।ÓÓ काफी जोश में आते हुए अपरचित साथी ने कहा। इसके अलावा ढेर सारी बातें हुईं। लोग एक-दूसरे से ऐसे घुल-मिल गये जैसे की बचपन के दोस्त हों। राज के अंदर एक बार फिर काम करने की जज्बा पैदा हो गयी। अब उसे समझ में आ गया था कि किसी एक पार्टी के गलत होने से माक्र्सवाद गलत नहीं हो जाता। बल्कि गलत लोगों को किनारे करने के लिए जरूरी है कि एक सही रास्ते पर चलते हुए उनका विरोध करें और जनता के बीच अपने आप को खपा दें। राज यह सब सोचता चला जा रहा था। अब उसके आंखों के सामने अंधेरा नहीं बल्कि सुबह की नई किरणें दिखाई दे रही थीं।

Tuesday, July 6, 2010

बिना चलाए पानी देता है ये हैंडपंप

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खेती को बचाओ...

कैसे बचेगा पश्चिम यूपी का किसान?

-जयप्रताप सिंह, गाजियाबाद
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिक उपजाऊ मंडल की मिट्टी लगभग बीमार हो चुकी है। रासायनिक खादों और खतरनाक कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी उर्वरता लगभग खत्म हो गई है। कृषि विभाग ने मंडल के पांच जिलों के मिट्टी के 81 हजार से अधिक नमूनों की जांच करायी जिसका परिणाम लगभग चौंकाने वाला था। जरूरत के हिसाब से सल्फर, जिंक और आयरन जैसे माइक्रो न्यूट्रिएंट्स बहुत कम मिले। गंगा-यमुना के बीच का दोआब क्षेत्र अच्छी खेती के लिए मशहूर है, लेकिन अधिक उपज का लालच किसानों के लिए मुसीबत बनने लगा है। वह रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं, जिससे पैदावार तो बढ़ रही है, लेकिन मृदा स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। जरूरी पोषक तत्व धीर-धीरे मिट्टी से गायब होते जा रहे हैं। इस स्थिति पर शासन ने मंडल में 10, 20 और 31 मई को विशेष अभियान चलाकर मिट्टी के कुल 81465 नमूने लेकर जांच करायी थी। मेरठ की क्षेत्रीय भूमि परीक्षण प्रयोगशाला में नमूनों की जांच अभी भी जारी है। अब तक हुई जांच के जो परिणाम सामने आये हैं उनमे जरूरी पोषक तत्व लगभग गायब हो चुके हैं। संयुक्त कृषि निदेशक एमपी सिंह ने बताया कि अच्छी फसलों के लिए मिट्टी में कुल सोलह पोषक तत्व जरूरी होते हैं, इनमें सबसे ज्यादा जरूरी जीवाश्म कार्बन है। इसकी मात्रा कम से कम 0.8 फीसदी होनी चाहिए, लेकिन यह 0.4-0.6 फीसदी तक मिल रही है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष यह 0.2-0.3 फीसदी तक थी। सूक्ष्म तत्वों सल्फर, जिंक और लोहे की मात्रा भी बहुत कम पायी गयी है। उन्होंने बताया कि इसके बचाव के लिए किसानों को जागरूक करना जरूरी है तभी इस पर रोक लगाया जा सकता है। बिना जागरूक किये खेती को बचा पाना मुश्किल है। पोषक तत्व और उनकी स्थितिजीवाश्म कार्बन 0.8 0.4-0.6, सल्फर 15.0 10.0-15.0, जिंक (पीसीएम) 1.20 0.6-1.2, लोहा (पीसीएम) 8.0 4.0-8.0, कॉपर (पीसीएम) 0.4 पर्याप्त, मैगनीज (पीसीएम) 4.0 पर्याप्त, पश्चिम की खुशहाली बुंदेलखंड पहुंचीकई राज्यों में वेस्ट यूपी के किसानों की मेहनत और खेती के प्रति उनके लगाव की लोग दाद देते थे, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल ही दयनीय है। इनकी इसी दिलेरी को देखते हुए किसानों को समृद्ध करने के लिए करीब दो दशक पहले एक परियोजना मिली थी। भूमि संरक्षण और जल संचय के लिए संचालित इस परियोजना को रामगंगा कमांड के नाम से जाना जाता था। अब इसी सौगात को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से छीन कर राहत पैकेज के साथ-साथ बुंदेलखंड को दे दिया गया। परियोजना के बुंदेलखंड जाने के बाद परियोजना के दफ्तरों पर ताले लटक गए, जिससे किसानों का भविष्य अंधकार में लटकता दिखाई देने लगा। केंद्र सरकार ने सूखा प्रभावित बुंदेलखंड इलाके के लिए 4506 करोड़ रुपये राहत पैकेज देने का निर्णय किया है। प्रदेश सरकार को यहां मृदा और जल संरक्षण वाले कार्यक्रम चलाने के निर्देश दिए गये हैं। इसके अनुपालन में उत्तर प्रदेश भूमि विकास एवं जल संसाधन विभाग ने मध्य, पूर्वी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 12 जनपदों में मृदा एवं जल संरक्षण की 17 परियोजना यूनिटों को यहां से स्थानांतरित करने का प्रस्ताव तैयार किया है। बिजनौर की रामगंगा कमांड परियोजना को नजीबाबाद से बुंदेलखंड के हमीरपुर में शिफ्ट कर दिया गया है। शासन ने यहां करीब 18 साल पहले रामगंगा कमांड परियोजना नजीबाबाद में स्थापित कराई थी। अलीगढ़ के अतरौली तहसील की रामगंगा परियोजना को महोबा व खैर की परियोजना को ललितपुर स्थानांतरित किया गया हैं। बुलंदशहर में चल रही रामगंगा कमांड खुर्जा, सिकंदराबाद एवं डिबाई यूनिटें हटाई जा रही हैं। जुलाई माह से खुर्जा एवं सिकंदराबाद यूनिट महोबा और डिबाई यूनिट हमीरपुर में कार्य करना शुरू कर देगी। बहराइच यूनिट को झांसी, नैनी यूनिट को चित्रकूट, आजमगढ़, सिकंदराबाद , खैर (अलीगढ़) खुर्जा (बुलंदशहर) को महोबा भेजा जाएगा। इसके अलावा डिबाई (बुलंदशहर) नजीबाबाद (बिजनौर) हापुड़ (गाजियाबाद) हमीरपुर शिफ्ट किया है। इसके अलावा बुंदेलखंड के बांदा, जालौन, ललितपुर आदि इलाके में कई यूनिट स्थानांतरित किए गए हैं।

-एक कदम आगे से साभार-