Wednesday, June 9, 2010

महाशय चिरकुट जी

महाशय चिरकुट शब्द पाठकों को पढऩे में जरूर कुछ अटपटा लग रहा होगा। वैसे तो चिरकुट शब्द लगभग सभी लोगों ने सुना ही होगा लेकिन महाशय चिरकुट शायद पहली बार सुन रहे होंगे। हमारा यह नायक ऐसा ही है। उसको स्वॢणम शब्दों से नवाजना मेरी मजबूरी है। शायद इसके अलावा मेरे पास कोई और शब्द नहीं है जिससे इस महान आदमी को नवाज सकूं। महाशय के महान कार्यों को कागजों पर उकेर रहा हूं तो ऐसा मत समझ लीजिएगा कि यह कार्य खुशी-खुशी करने जा रहा हूं बल्कि यह भी मेरी मजबूरी थी। आप सोच रहे होंगे कि यह लेखक भी शायद मूर्ख हो जो इस तरह की बकवास कर रहा है। आखिर लिखने की भी कोई मजबूरी हो सकती है? लेकिन ऐसा ही है क्योंकि महाशय चिरकुट जी बहुत दिनों से मेरे दिमाग में ब्रेन ट्यूमर की तरह अंदर-अंदर मवाद बना रहे थे, जिसे बाहर निकालना ही था। बात उन दिनों की है जहां मै एक अखबार के दफ्तर में नौकरी करता था। हमारे महाशय जी वहां के सीईओ थे। वे जब चलते थे या किसी से बात करते थे तो ऐसे मालूम होता था जैसे डांडिया कर रहे हों। वह पचास वर्ष से कम नहीं थे लेकिन इसके बावजूद वह अपने आपको बीस वर्ष का नौजवान ही समझते थे। शायद इसी वजह से उनका हाव-भाव डांडिया के मुद्रा में था। वे ङ्क्षठगने कद के लगभग पांच फुटा व्यक्ति थे। सिर भी उनका उजड़ा चमन हो चुका था। अनकी मूंछें भी थीं जो नत्थूराम जैसी नहीं थीं। मूछें और सिर में बचे-खुचे बाल चांदी हो गये थे। लेकिन नौजवान दिखने के लिए हर वक्त बालों को कलर किए रहते थे। उनके गोरे-चि_े व नाक-नख्श की बनावट बहुत सुंदर तो नहीं लेकिन काम चलाऊ था। गोलाई लिए हुए चेहरे से मिचमिचाती हुई दो आंखेें उनके चिरकुट होने की संकेत दे रही थीं। किसी से बात करते समय वह नजरें नीचे की तरफ गड़ाकर डांडिया के मुद्रा में हो जाते थे। ध्यान से देखने पर चिरकुट तो कम लेकिन चोर ज्यादा मालूम पड़ते थे। उन्हें कफन खसोट कहा जाए तो भी कम है। क्योंकि पैसे को वह दांत से पकड़ कर खींचते थे। महाशय चिरकु ट जी पैसे के प्रेमी इस कदर थे कि उसके लिए सब कुछ करने को तैयार रहते थे। चिरकुट जी अपने मातहत कर्मचारियों के का वेतन काटने में महारत हासिल किए हुए थे जो उनकी सबसे बड़ी महानता थी। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे जिस काम के लिए रखे गए थे उसके बारे में उन्हे रत्ती भर की जानकारी नहीं थी। फिर भी वे उस काम को बड़ी ही निष्ठा पूर्वक निभाते थे। उनके अंदर मालिक की चाटुकारी इस कदर कूट-कूट कर भरी हुई थी कि जैसे कोई कुत्ता अपने स्वामी का चू-चू शब्द सुनने के बाद उसके पैरों को चाटना शुरू कर देता हो। वह कला के शौकीन थे क्योंकि संस्थाान में जिस काम को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें रखा गया था, उस काम को किनारे रख कर उसकी सुंदरता पर विशेष ध्यान रखते थे। वे अपने किसी भी कर्मचारी से काम की उपेक्षा नहीं करते थे बल्कि वेतन काटने में मशगूल रहते थे। वे हमेशा इस ताक मे रहते थे कि कर्मचारी किसी तरह छुट्टी पर जाए और उसका वेतन काट लें। क्योंकि वह काम कराने में नहीं बल्कि पैसा काटने में महिर थे। कुछ मामलों में तो महाशय जी को कौवा भी कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा। क्योंकि जिस तरह से सुबह-सुबह कौवे की निगाह गंदा खोदने पर लगी रहती थी ठीक उसी तरह चिरकुट जी की निगाह सोते-जागते कर्मचारियों का वेतन काटने पर रहती थी।महाशय चिरकुट जी की पूरी एक चौकड़ी थी जो संस्थान को आगे बढऩे से रोकने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इस चौकड़ी में एचआर डिपार्टमेंट का जो हेड था उसकी मूंछें व दाढ़ी बिल्कुल सफाचट थीं। वह गोरा चि_ा, गोलाई लिए हुए चेहरे पर मदमत्त हुई दो आंखें जी मैन होने की पूरी-पूरी संकेत दे रही थीं। हमारे महाशय चिरकुट जी भी कुछ इस कदर भी दिखाई देते थे। यही कारण था कि दोनों लोगों में अकेले में खूब छनती थी। ऐसा मैने इसलिए अनुमान लगा लिया क्योंकि कुछ दिनों पहले नोएड के स्टेडियम में रात के समय ऐसे कई जी मैनों से मेरी मुलाकात हो चुकी थी। जहां से कई बार अपनी इज्जत बचाकर भागना पड़ा था।महाशय चिरकुट जी का एक छोटा सा परिवार था। इस परिवार के होते हुए भी उन्हें अकेले रहना पड़ता था। यही कारण था कि वह हर वक्त आफिस में ही पड़े रहते थे। छुट्टी भी उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। इनकी इस स्थिति को देख कर मेरा मन भी काफी दुखी हो जाता। इनको देखने पर ऐसा मालूम होता था कि बीबी से छत्तीस का आंकड़ा हो। कभी-कभार बीबी से पिटते हों, इसमे कोई शक नहीं। अगर ऐसा हो तो यह बड़े दुख की बात है। इनके कार्य करने की स्टाइल पुराने बाबूजी - बाबूजी का जुर्माना-जैसी थी। फर्क शिर्फ इतना था कि बाबूजी अपने कर्मचारियों की गलतियों को निकालकर जुर्माना लगाते थे और उस पैसे को धार्मिक व सामाजिक जैसे महान कार्यों में दान करते थे। कर्मचारियों के एक-एक बूंद खून को निचोड़ कर धाॢमक कार्य में लगाकर अपने आपको धन्य समझते थे, जो उनकी महानता थी। जो कर्मचारी जितना ज्यादा जुर्माना देता था उसे उतनी ही पीस बर्फी अधिक मिलती थी और बाबूजी कहते थे कि यह तो हमारे दुधारू गाय हैं, जिनका दो लात भी वरदाश्त किया जा सकता है। इतना सबकुछ होने के बावजूद वे दया के मूर्ति थे।उधर, हमारे चिरकुट जी महाराज के काम करने का तरीका कुछ अलग ही किश्म का था। वे खुद अपने नहीं बल्कि अपनी चाौकड़ी के साथ मिलकर कर्मचारियों का वेतन काटकर मालिक को खुश करने में जुटे थे। उनका एक ही लड़का था जिसका उन्होंने एक विदेशी लड़की से शादी करवा दी थी, जो इनके पास न रहकर लड़की के घर पर ही रहता था। महाशय चिकुट जी ने ऐसा क्यों किया, इसमे अधिक दिमाग दौड़ाने की जरूरत नहीं है। क्योंकि अब आप इतना समझ ही गए होंगे कि महाशय जी पैसे के लिए कितना नीचे उतर जाएंगे बताने की जरूरत नहीं है। उस विदेशी लड़की के पास काफी धन-दौलत थी जिसे महाशय जी हथियाने में लगे हुए थे। बाद में वही हुआ, चाहे बीबी-बच्चों का सुख भोगें या धन-दौलत की। आप पूछेंगे कि महाशय चिरकुट जी आखिर कौन थे? तो भाई, मैं इतनी आसानी से बताने वाला नहीं हूं। और हां इतनी जल्दी आप लोगों को छोड़ुंगा भी नहीं। क्योंकि यह नायक कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। इसे चिरकुट शब्द से नवाजा तो जरूर हूं लेकिन इसको चिकुट कहना चिरकुट शब्द की बेइज्जती भी है। शायद इसीलिए महाशय चिरकुट शब्द से नवाजा गया है। खैर सीधे-सीधे तो नहीं बताउंगा कि वह कौन थे? लेकिन कुछ उदाहरणों द्वारा इंगित जरूर करूंगा जिसको समझने में आप को परेशानी न हो। क्यों न आप मुझे पानी पी-पी कर गाली ही दें। तो चलिए बता ही देता हूं।महाशय चिरकुट जी की महानता को देखकर हमे महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी की ए रचना का नायक याद आ गया। वह जब सीढिय़ों पर चढ़ता था तो ऐसे मालूम होता था जैसे कह रहा हो कि सीढ़ी जी महाराज मुझे माफ करना मैं आप के ऊपर चढ़ रहा हूं। उनके दरवाजे के सामने हेमेशा गंदा पानी भरा रहता था जिसमें वह खुद घुटनों तक धोती को माड़ कर गंदे पानी से चलते हुए निकल जाया करता था। लोग कई-कई बार उससे यह कहकर थक गये थे कि इसमें मिट्टी डाल दो, तो उसका जवाब था कि जब सभी लोग इसी मेसे आ-जा रहे हैं तो मुझे जाने में क्या दिक्कत है जी, लेकिन उसने मिट्टी नहीं डाली। इसी बीच एक केंचुआ उनके पैर पर चढऩे लगा और उन्होंन पैर को जोर से झटका और कहा कि वह केंचुआ था....। अब तो शायद आप को बतान जरूरी नहीं होगा कि हमरे महाशय चिरकुट जी कुछ इसी मेसे थे। जिसको बयान करने में मेरा कलम साथ नहीं दे रहा है। क्योंकि वह और अधिक अपमान नहीं झेल सकता।

Monday, June 7, 2010

इश्क गुनाह क्यों?

कल इश्क के कूचे में इक नौजवां मारा गया, हाथ मलती थी कज़ा वो बे-कज़ा मारा गया

सदियों पहले राजे-रजवाड़ों के समय में किसी ने लिखा था कि कल इश्क के कूचे में इक नौजवां मारा गया, हाथ मलती थी क ज़ा वो बे-कजा मारा गया। प्राचीन काल में एक इश्क करने वाले नौजवान को बेमौत मारे जाने पर साहित्य लिखा गया। उस पर गहन चिंतन हुआ। उस समय शहंशाहों के दरबार हुआ करते थे लेकिन अब लोकतंत्र है। उस समय और आज के समय में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। आज पुरानी परंपराओं को तोड़ कर आगे बढऩे वाले प्रेमी युगलों की सुंख्या में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बात करें तो अजीत-अंशु के बाद मनवीर-रजनी प्रकरण भारतीय लोकतंत्र पर ही सवाल उठा रहे हैं कि आखिर यह कैसा लोकतंत्र है? जहां पर लोगों को खुलकर प्यार करने का भी अधिकार नहीं हैं। एक तरफ तो लोकतंत्र में सबको अपनी आजादी हासिल है तो वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार क्यों नहीं है? कानून किसके हिसाब से चल रहा है? जिनके अंतिम संस्कार कर दिये गये, वे जिंदा लौट रहे हैं। यहां पर तो मूंछ का सवाल होता है। मूंछ की खातिर लोग तलवारें खींच लेते हैं। बेरहमी से अपनों का ही कत्ल कर देते हैं। समाज तेजी के साथ बदल रहा है। युवाओं के अंदर पुरानी मूल्य-मान्यताओं के खिलाफ विद्रोह के अंकुरण फूटना शुरू हो गये हैं। वर्षों से दबा हरित प्रदेश मोहब्बत का जंगल बनकर उभर रहा है जिसमें लाशों की गुत्थियां गढ़ी जा रही हैं। प्रेमी-प्रेमिकाओं ेको सरेआम गोलियों से उड़ा दिया जाता है। कहीं-कहीं तो पत्थर से मार-मार कर बेरहमी से हत्या कर दिया जाता है। इसके बावजूद प्रेमी युगल प्यार करने से पिछे नहीं हट रहे हैं। जितनी तेजी के साथ इसे दबाने का प्रयास किया जा रहा है, उतनी ही तेजी से प्यार करने की परंपरा भी बढ रही है। यह अलग सवाल है कि कुछ प्रेमी युगल कठिन संघर्षों की राह के डर से अत्महत्या कर ले रहे हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि उनके अंदर वद्रोह के अंकुर मरे नहीं हैं बल्कि तेजी के साथ अंकुरित हो रहे हैं। इन हत्याओं का हिस्सा पुलिस भी बन रही है और वर्कआउट के चक्कर में लाशों से खिलवाड़ जारी है। दिखती नहीं प्रशासन की पहल-इस तरह के कशों का पुलिस इतिश्री करने में भी काफी उतावली रहती है। इसी तरह का एक घटना मुजफ्फरनगर स्थित नई मंडी कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला शांति नगर में गत 6 मई को पुलिस ने एक युवक का शव बरामद किया था। इसकी शिनाख्त कूकड़ा गांव निवासी अजीत सैनी पुत्र ओमवीर सैनी के रूप में पुलिस भी हुई थी। मृतक के परिजनों ने उसके 30 अप्रैल से गायब की भी पुष्टि की थी। हत्या के आरोप में अजीत की प्रेमिका अंशु के पिता नरेंद्र तोमर और भाई अनुज को पुलिस ने उठा लिया था। आज के वैज्ञानिक युग में पुलिस के पास तर्क था कि अंशु के परिजन नई मंडी में रहते हैं, जहां अजीत की लाश मिली। इससे पहले बुढ़ाना क्षेत्र में एक युवती की लाश मिली थी तो पुलिस ने उसे अंशु की मान लिया। 9 मई को पुलिस जब आनर किलिंग के मामले में अंशु के भाई और पिता को जेल भेज रही थी कि उसी समय प्रेमी युगल अजीत और अंशु थाने पहुंच गये। इस पर सवाल उठना लाजमी था कि पूर्व में अजीत और अंशु की बताई गई लाशें फिर किसकी थीं? मुजफ्फरनगर पुलिस यह सब देख कर हैरान तो हो गई लेकिन उसकी कार्यशैली का परिणाम एक बार फिर वही ढाक के तीन पात साबित हुये। आज तक इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ पाई है। पड़ोसी राज्यों की पुलिस से संपर्क के अलावा पोस्टर, इश्तिहार के जरिये शिनाख्त की कार्रवाई आज तक चल रही है। ऐसी ही कहानी देश के नवीनतम शहर और इंडस्ट्रियल के रूप में सुमार नोएडा में दोहराई गई। प्रेमी युगल के अंतिम संस्कार के बाद रजनी भी अपने प्रेमी मनवीर के साथ शादी करके वापस आ गयी। चौबीस दिन पहले एक युवती की लाश मेरठ के कुरड़ी गांव में मिली थी। पुलिस और परिजनों ने इसे रजनी की बताकर अंतिम संस्कार कर दिया था। यह युगल 13 अप्रैल को फरार हुआ था। यहां भी वही सवाल कि आखिर रजनी की बताई गई लाश किसकी थी? नोएडा पुलिस अब दावा कर रही है कि वह लाश मोदीनगर के सीकरी गांव की मंजू रानी की थी। पुलिस महकमें का कहना है कि मृतक पूर्व में भट्ठे पर काम करती थी और वहीं काम करने वाले गाजीपुर के राजकुमार उर्फ राजीव मुंशी के साथ दो महीने पहले कही फरार हो गयी थी। दोनों को तलाश कर पंचायत ने शादी का फैसला सुना दिया लेकिन राजीव पंचायत के डर से भाग खड़ा हुआ था। कूड़ी गांव में संदिग्ध हालात में मंजू की मौत हो गई तो उसे बोरी में बंद कर कूड़े के ढेर में फेंक दिया गया था। यह दाश्तां यहीं खत्म नहीं होती बल्कि ऐसी ही कहानी पिछले साल मुरादाबाद जिले के कुढ़ फतेहगढ़ थाना क्षेत्र के अंतर्गत बिचौला डूकी गांव में पुलिस द्वारा तैयार की गयी। 9 मई 2009 को घर से लापता गुलाम हुसैन की बेटी अंजुम की तलाश पुलिस ने झील में तैरती हुयी एक लाश को अंजुम की बताकर केस का इतिश्री कर दी। केस खत्म होने कुछ ही दिन बाद 10 मई को धनारी में अंजुम जिंदा मिली और उसके प्रेमी जाहिद को गिरफ्तार कर लिया गया। सभी मामलों में एक ही बात सामने आई कि पुलिस ने जबरन शिनाख्त कराई। पुलिस ने कानून को अपने हिसाब से उपयोग किया। लेकिन अभी तक उच्च स्तर पर इन मामलों की समीक्षा और कार्रवाई की बातें सिर्फ अफसरों के बयानों तक सीमित हैं। अब देखना यह है कि इन केसों के मामलों में उच्च पदों पर आसीन उच्चाधिकारी क्या निर्णय सुनाते हैं?एडीजी कानून व्यवस्था ब्रजलाल का मानना है कि आजकल हत्याओं में विरोधियों को फंसाने का खेल चल रहा है। विशेष रूप से अज्ञात लाशें इसके लिए सहायक बनती जा रही हैं। उन्होंने आदेश दिया है कि अब हर अज्ञात लाश का अनिवार्य रूप से डीएनए कराया जाए। वे कहते हैं कि जब परिवार के लोग ही लाशों की शिनाख्त कर रहे हैं तो पुलिस क्या कर सकती है? किसी लाश की शिनाख्त के लिए परिवार पर दबाव के दावे की कोई वजह नहीं बनती। पुलिस अगर ऐसे हालात में शिनाख्त के वास्ते सबूत मांगेगी तो संवेदनहीन कहलाएगी। ऐसे मामलों में लापरवाही और धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया गया है। सबके लिए है कानूनवरिष्ठ अधिवक्ता एवं मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल बख्शी का कहना है कि वैसे तो कानून सबके लिए है, लेकिन कुछ लोग इसका दुरपयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में पुलिस के खिलाफ मुकद्मा दर्ज कराया जा सकता है। पुलिस एक कत्ल केस को खत्म कर देती है। जिनकी लाश भी शिनख्त कर ली गयी लकिन बाद में वे जिंदा लौट आते हैं। ऐसे समय मरने वाले का केस बंद कर दिया जाता है। शिनाख्त की स्थिति में पुलिस इससे बच जाती है। मगर आईपीसी की धारा 212 में कोई भी व्यक्ति पुलिस के खिलाफ अपराधी और अपराध को छिपाने में मदद करने का मुकद्मा दर्ज करा सकता है जिसमें 7 साल की सजा का प्रावधान है। उन्होंने बताया कि आज तक इस धारा के तहत दर्ज किसी भी मुकद्में में देश भर में कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्योंकि पुलिस के खिलाफ लोग पैरवी नहीं कर पाते हैं। इस लिए धरे-धीरे केस को बंद कर दिया जाता है। इसके परिणाम स्वरूप इस तरह की घटनाओं पर रोक लगने बजाय बढ़ावा देने में मदद मिलती है।