Monday, September 20, 2010

एक होमगार्ड की कहानी उसी की जुबानी

देश में बेरोजगारी और महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि लोगों का जीना दुश्वार हो गया है।  पढ़े-लिखे नौजवान नौकरी के लिये मारे-मारे फिर रहे हैं और हमारी सरकार है कि आतंकवाद का माला जपने में मशगूल है। जब भ्रष्टïाचार और महंगाई के विरोध में जनता के अंदर आक्रोश के बीज अंकुरित होना शुरू होते हैं तो यह सरकारें उनके आक्रोश पर पानी छिड़कने के लिए आतंकवाद और मंदिर, मस्जिद का सवाल पैदा कर देती हैं, जिससे लोगों का ध्यान बंट जाए और हमारे नेता अपनी तिजोरियां भरें। ज्यादातर गरीबों-मजदूरों के पढ़े-लिखे बेटे दस-बीस हजार रुपये घूस दे कर होमगार्ड्स की नौकरी कर लेते हैं क्योंकि अन्य नौकरी के लिए उन्हें दो से तीन लाख रुपये तक घूस देने पड़ते हैं। जिसके बारे में वे सपने में भी नहीं सोच सकते। लेकिन वहां पर भी उन्हें मात्र दिहाड़ी मजदूर की तरह रखा जाता है। जो संबंधित अधिकारी का आवभगत करे, उसे साल भर में लगभग छह माह की ड्यूटी मिल जाती है, लेकिन जो हाड़तोड़ मेहनत करे उसे साल में दो माह ड्यूटी मिल जाए वही बहुत है। उन्हें इस तरह से तबाह कर दिया जाता है कि वे कहीं के नहीं रहते। उन्हें चैन से जीने तक भी नहीं दिया जाता है।  
वैसे भी सरकारी नियमानुसार प्रत्येक होमगाडर््स को ड्यूटी सेक्टर के अनुसार लगभग छह महीने दिया जाता है। बाकी का वे छह महीने फांके मारें। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी बी.ओ. दो सौ से लेकर पांच सौ रुपये तक घूस लेकर उनकी ड्यूटी लगाते हैं। जो पैसा न दे उसे घर पर बैठना पड़ता है। कभी-कभी तो संबंधित अधिकारी उनके साथ इस तरह पेश आते हैं कि उनकी जिंदगी नरक बन जाती है।  इन अधिकारियों द्वारा होमगार्डों का जबरदस्त शोषण किया जाता है। उन्हें अपने खून-पसीने की कमाई का लगभग आधा हिस्सा बी.ओ. को ही दे देना पड़ता है। ड्यूटी तो ली जाती है एक सिपाही से ज्यादा, लेकिन मजदूरी एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर भी नहीं। जो मिलता भी है, उसमें से अधिकारी का हिस्सा भी देना पड़ता है।
उत्तर प्रदेश स्थित सिद्धार्थनगर जिले के लोटन ब्लाक के गांव धंधरा के रहने वाले शिवकुमार और पास के गांव के हरिनारायण सिंह बताते हैं कि ड्यूटी लगाने के बाद प्रत्येक होमगार्ड्स से गोपनीय तरीके से अधिकारी बी.ओ. रिश्वत का पैसा वसूलते हैं। जो नहीं देता उसे ड्यूटी, परेड और विभागीय कमी बताकर परेशान किया जाता है। संबंधित अधिकारियों से शिकायत करने पर बी.ओ. से घूस लेकर उसे बचा लिया जाता है और शिकायत करने वाले होमगार्ड की छह-छह माह तक ड्यूटी ही नहीं लगाई जाती है। दोबारा इंट्री करने के लिए मेहनत की कमाई का एक हिस्सा प्रति माह अधिकारी को देना पड़ता है। 
इसी तरह सिद्धार्थनगर जिले में उस्का ब्लाक कम्पनी कमान होमगार्ड्स के बी.ओ. सरविंद सरोज द्वारा होमगार्डों से खुलेआम लिए जा रहे घूस और उसके अत्याचार से पीडि़त होमगार्ड की व्यथा को उसी की जुबानी में पेश कर रहे हैं।
मैं उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के धंधरा गांव का रहने वाला हूं। उस्का बाजार, विकास क्षेत्र में होमगार्ड कंपनी में अवैतनिक रूप में नौकरी कर रहा हूं। हमारे उस्का बाजार के वर्तमान बी.ओ. सरविंद सरोज ने ड्यूटी लगाने के नाम पर हमसे 400 रुपये रिश्वत लेता है। मैंने जब इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से की तो उसने मुझे धमकी दी और कहीं भी ड्यूटी पर नहीं लगाया। बी.ओ. ने ऊपर से यह आरोप लगाया कि ट्रेनिंग पर नहीं गये जबकि उसके संबंध में कोई लिखित सूचना हमें नहीं दी गई। मुझसे 500 रुपये बैंक समरी एकाउंट गलत होने पर उसे ठीक करवाने के लिए बी.ओ. सरविन्द सरोज ने खुद  लिया। ड्यूटी लगाने के लिए मेरे अन्य साथियों से जब रिश्वत की मांग की तो उन्होंने मना कर दिया। इस पर बी.ओ. ने हम लोगों की ड्यूटी नहीं लगाई। इसकी शिकायत करने पर पिछले दस माहीने से हम लोगों को ड्यूटी पर नहीं लगाया गया, जिससे हमारा परिवार भूखों मरने की कगार पर है। जो लोग बिना शिकायत किये बी.ओ. साहब को पैसा दे रहे हैं, उनको ड्यूटी पर बराबर लगाया जाता है। इसी प्रकार दूसरे होमगार्ड हरिनारायन सिंह से लड़की की शादी में छुट्टïी देने के नाम पर बी.ओ. साहब ने 2100 रुपये ले लिया। इसके साथ ही उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि यदि किसी से शिकायत करोगेे तो नौकरी से निकाल देंगे। हम लोग मामले की शिकायत जिले के डीएम और मंडल स्तर के प्रभारी अधिकारी से किया। मंडल स्तर के अधिकारी द्वारा 13 अगस्त 2010 को उस्का बाजार डाक बंगले पर हम लोगों से साक्ष्य सबूत की मांग की गयी। जिसे हम लोगों ने बी.ओ. द्वारा किये गये वार्तालाप और रिश्वत की मांग का रिकार्ड किया हुआ कैसेट भी दे दिया। होमगार्ड रणजीत, उमेश, राधेश्याम, जमुना आदि का बयान भी लिया गया। जिन लोगों से बी.ओ. सरविन्द सरोज ने ड्यूटी लगवाने के नाम पर रिश्वत ली थी, उस मामले में आज तक मंडल स्तर के अधिकारियों ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। बी.ओ. सरोज अभी भी पैसा लेकर होगाडर््स को ड्यूटी देते हैं। शिकायत करने पर हम लोगों को ड्यूटी देना भी बंद कर दिए हैं। यह भ्रष्टïाचार और अनैतिकता कि हद है। हम लोगों ने उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषी अधिकारी के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई किया जाए। क्योंकि इस समय ड्यूटी न लगने से मैं और मेरे साथी भूखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं। यहां तक कि हम अपने बच्चों के पढ़ाई का फीस भी नहीं दे पा रहे हैं।
इस मामले की शिकायत हम लोगों ने लिखित रूप से मुख्यमंत्री मायावती, मुख्य सचिव लखनऊ, तथा मंडल होमगाडर््स प्राधिकारी गोरखपुर को भेज चुके हैं। इसके बावजूद मेरी शिकायत नहीं सुनी जा रही है। अब हम यह मान चुके हैं कि देश का यह पूरा तंत्र ही भ्रष्टï हो चुका है।

Sunday, September 5, 2010

प्रिय उकाब के पाठक बंधुओं,

किन्हीं कारणों से आज से लगभग दस दिनों तक इस बलाग पर कोई पोस्ट प्रकाशित करने में असमर्थ हूं। दस दिन बाद से पुन: खबरें प्रकाशित होंगी, जो निरंतर जारी रहेंगी।

Monday, August 30, 2010

इंसान बने हैवान

माया
हमारे समाज में जातिगत अपमान और उत्पीडऩ जैसे कई कुकर्म किए जाते हैं। देश आजाद होने के बाद दलितों को आज भी सामंती सोच रखने वालों के अधीन रहना पड़ता है। यदि कोई यह समझता है कि अछूत एक जमाने पहले की बात है तो यह गलत है। आज भी हरियाणा के हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में ऐसा ही होता है। जहां पर वाल्मीकि समुदाय के घर के साथ-साथ उसमें रहने वाले लोगों को भी जला दिया जाता है। जिन लोगों ने अपना गुजारा करने के लिए उन घरों को अपना खून पसीना एक करके बनाते हैं, उसे उन्हीं के सामने जला कर राख कर दिया जाता है। उनकी जिंदगी भर की मेहनत को चंद समय में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है।
यह लोग परम्परावादी पेशे को छोड़कर अपनी मेहनत से गुजारा कर रहे थे और अपने बच्चों को स्कूल भेजने का सपना अपनी आंखों में संजोये हुए थे। मेहनत मजदूरी करने के लिए अपने घरों में पशुओं, पाक्षियों को पालने लगे थे। इनके रहन-सहन को देखकर जाट समुदाय के लोगा सहन कर पाने में असमर्थ थे। उन्हें लग रहा था कि उनके कदम डगमगा रहे हैं। इसलिए उनके लिए इसे सहन करना असंभव था। जब उन्होंने आने-जाने वाले रास्ते में एक वाल्मीकि कर्ण सिंह के बेटे दिलबाग को एक कुत्ते को बड़े प्यार से नहलाते हुए देखा तो रास्ते से जा रहे जाट समुदाय के कुछ लोगों ने कहा कि हर रोज सुबह शाम इसी गली से गुजरना पड़ता है। जोकि नशे में धुत्त थे और ऐसा कहते हुए उन्होंने कुत्ते को लात मारी। इस बात से दिलबाग और उसके पिता ने उनका विरोध किया। इस बहस को सुनकर वहां पर और लोग भी आ गए। जाटों ने कहा कि तुम्हें भी इसी तरह मार देंगे जिस तरह कुत्ते को मैंने मारा है। इस बात से उन्हें गुस्सा आ गया और नौबत हाथापाई तक पहुंच गई। तभी कुछ लोगों ने झगड़े को सुलझाया। उसके बाद वाल्मीकि समुदाय के लोगों ने आपस में बातचीत की। बातचीत के दौरान पता चला कि उन जाटों के समूह में गांव का जमाई भी था, जिससे गलती से झगड़ा हो गया। गांव में आज भी यह परंपरा मानी जाती है कि किसी भी जात-बिरादरी का जमाई पूरे गांव का जमाई होता है। वीरभान ने गांव को शांति बनाए रखने के लिए कहा कि हमें उन लोगों से माफी मांग लेनी चाहिए। विचार-विमर्श करने के तुरंत बाद कर्ण और बीरभान दोनों ही माफी मांगने के लिए उनके घर चल पड़े। लेकिन जाटों के घर पहुंचने से पहले ही उन दोनों के ऊपर लाठियों से वार किया गया, जिससे दोनों को काफी चोटें आई थीं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने उन्हें छ: टांके लगाए। अस्पताल में उनका इलाज चल ही रहा था कि उन्हें फोन पर सूचना मिली कि जाट समुदाय के लोग अभी भी झगड़ा करने को तैयार हैं। सूचना मिलते ही वीरभान और कर्ण दोनों सीधे पुलिस चौकी पहुंच कर चौकी इचार्ज विनोद काजल को घटना की जानकारी दी। उसने कहा कि क्यूं थारे घर जला दिये जो इस तरह बात कर रहे हो। चौकी इचार्ज ने छूटते ही कहा। उसके बाद उन्होंने पुलिस दस्ते को लेकर गांव में आ धमके। जब गांव में कोई नहीं दिखा तो पुलिस वालों ने वीरभान को खूब धमकाते हुए कहा कि तुमने तो कहा था कि जाट समुदाय वाल्मीकियों पर हमला करने वाले हैं। लेकिन यहां तो कुछ भी नहीं हो रहा है।
21 अप्रैल 2010 को विनोद काजल वाल्मीकि बस्ती में वीरभान और कर्ण से मिलकर कहा कि इस मामले को पंचायत ही सुलझाएगी। वाल्मीकि समुदाय ने पंचायत में जाने को तैयार हो गये, क्योंकि वह सब शांति चाहते थे। वाल्मीकि बस्ती के सारे पुरुष पंचायत में पहुंच गये। घर में केवल महिलाएं और बच्चे ही रह गये थे। जाट समुदाय पहले से ही तैयारी में थे कि कब यह लोग बाहर जाएं और वे घटना को अंजाम दें। पंचायत में अभी लोग पहुंचे ही थे कि उधर वाल्मीकि बस्ती में जाट समुदाय ने आग लगा दी। कुछ घरों का सामान भी लूट लिया।

चंद्रभान की पत्नी फूलकली ने बताया कि हमारे घर में अगले महीने लड़की की शादी थी। घर में दहेज का सामान भी रखा हुआ था। सारा सामान लूट लिया। मेरी बहू के सामने अपने कपड़े उतार कर खड़े हो गये। मैंने उसे चौबारे में ऊपर भेज दिया और उन्होंने फिर भी उसका पीछा किया। वह एक कमरे में घुस कर अंदर से दरवाजा बंद कर ली, लेकिन जाटों के लड़कों ने उस कमरे में जलती हुई लकड़ी खिड़की से अंदर फेंक दी। कमरे में रखा सामान धू-धू कर जलने लगा। बहू किसी तरह जान बचाकर बाहर भागी। गांव के कई लोगों ने पुलिस के पास गये और उनसे काफी मिन्नतें कीं, लेकिन पुलिस वालों ने हमारी कोई भी मदद नहीं की। उस जलती हुई आग को देखकर छोटे-छोटे बच्चे कांप रहे थे। फिर भी पुलिस वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। खून-पसीने एक करके बनाए गये घर को हमारी आंखों के सामने जाटों ने जला कर राख कर दिया। उन लोगों ने हैवानियत का सीमा पार करते हुए एक लड़की को जिंदा जला दिया और हम लोग देखते रहे।

सुमन जिसकी उम्र लगभग 18-19 साल की थी, जो बारहवीं पास थी। वह घर के अंदर पहिए वाली कुर्सी में बैठ कर किताब पढ़ रही थी। उसके घर के चारों तरफ लोगों ने आग लगा दी और बाहर से गेट की कुंडी चढ़ा दी, जिससे वह बाहर न निकल सके। सुमन को घर में आग लगाकर सबों ने मार डाला। सुमन के पिता तारा सिंह की उम्र 55 साल थी। उन्होंने अपनी बेटी को बचाने का प्रयास किया जिसमें वह भी जल गया। बेटी को नहीं बचा सका। वह उसकी चीख को सुनता रहा और खुद को आग में जलाता रहा। जिन लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया उनको तो लोगों की चीखें सुनकर मजा आ रहा था, लेकिन जिनकी आंखों के सामने अपनी बेटी, बहू और बच्चे जल रहे थे, उन पर क्या बीत रही होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यह घटना मात्र एक मिर्चपुर की ही नहीं है, बल्कि कमोबेस पूरे देश में ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं। प्रसाशन पर इसका कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है। उसे मात्र चंद पैसों का मुआवजा देकर अपना पल्ला झाड़ लेना है। गरीबों की उन्हें क्या परवाह वह तो उनकी नजरों में कीड़-मकोड़े हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हम ऐसे ही इन घटनाओं को देखते रहेंगे? आखिर हम कबतक अपने लोगों से ही लड़ते रहेंगे? जबकि इन सबका असली दुश्मन कोई और है, जिसके बारे में हम सबकुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठे हैं।

Wednesday, August 25, 2010

सावन के महीने में छोड़ देते हैं गांव

अंध विश्वाश के साए में जीते लोग
सिद्धार्थनगर। गौतम बुद्ध की पावन धरती पर रहने वाले लोग आज भी अंधविश्वाश के साये में में जी रहे हैं। पहले इसे नौगढ़ तहसील के नाम से जाना जाता था, जो वर्षों पहले बस्ती जनपद के अंतर्गत आता था। बाद में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह के कार्यकाल में इसे सिद्धार्थ नगर के नाम से जनपद का दर्जा मिला। सिद्धार्थ नगर नाम भी इसे गौतमबुद्ध की राजधानी कपिल बस्तु तथा उससे कुछ ही दूरी पर नेपाल में स्थित गौतमबुद्ध की जन्मस्थली लुम्बनी के नाम पर पड़ा। यह जनपद पहले से ही काफी पिछड़ा हुआ माना जाता है, लेकिन जिला होने के बाद इसका विकास तो हुआ पर उसकी रफ्तार कछुआ चाल के बराबर थी। इस जिले के पिछड़े क्षेत्र के कुछ ऐसे ही गांवों की एक घटना का जिक्र करने जा रहे हैं।
सिद्धर्थनगर जिले के पांच गांव ऐसे हैं जो वर्ष के एक दिन पूरे के पूरे खाली हो जाते हैं। ऐसा नहीं कि जिले को ही छोड़ कर लोग बाहर चले जाते हैं, बल्कि गांव के बाहर पूजा-पाठ करते हैं। पूरे दिन बाहर ही पूजा पाठ करते हैं। शाम को भोजन करने के बाद पुन: घर लौटते हैं। इन लोगों का मानना है कि गांव के बाहर पूजा-पाठ करने से पूरा गांव बीमारी और प्राकृतिक आपदा से बचा रहेगा। यह और बात है कि गांव छोडऩे की इस कवायद से कोई लाभ नहीं होता है, जबकि देखने में आता है कि बीमारी और आपदा कमोबेस इन गांवों में ज्यादा ही आती हैं।
यह गांव इटवा तहसील क्षेत्र के खुखुड़ी, महादेव घुरहू, भावपुर पांडेय, सेहरी और धनधरा हैं। यहां यह परम्परा दशकों पुरानी है। हर साल इन गांवों के युवक, बूढ़े, बच्चे, महिलाएं सावन माह में शुक्ल पक्ष द्वितीया, मघा नक्षत्र को सूर्योदय होने से पहले ही गांव छोड़कर बाहर चले जाते हैं। पूरे गांव के लोग गांवों से कुछ दूरी पर स्थित भगहर पर इक_ा होकर देवी काली की पूजा-पाठ करते हैं। गांववासियों के दिन का भोजन भगहर पर ही होता है। सूर्यास्त के बाद लोगों का हुजूम एक बड़ी तादाद में घरों की तरफ रवाना होता है। इस वर्ष 11 अगस्त को भी गांव खुखुड़ी के ग्रामीणों ने गांव छोड़कर भगहर में पूजा-पाठ किया।

आखिर ऐसा क्यों करते है ग्रामीण?
खुखुड़ी के प्रधान मतई का कहना है कि गांव को हैजा, जमोगा, चेचक जैसी महामारियों से बचाने के लिये एक महात्मा ने ऐसा करने का उपाय बताया था। उसके बाद लोगों ने बाबा के बताये अनुसार भगहर पर इक_ा हो कर पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया। धीरे-धीर यह एक परम्परा बन गयी। जब उनसे पूछा गया कि क्या पूजा पाठ करने से बीमारियां नहीं होती हैं। उनका कहना था कि अभी भी बीमारियां होती हैं। लेकिन क्या करें पुरानी परंपराओं को तो निभाना ही है।

सइयां भये कोतवाल तो काहे का डर...

राशन डीलर की मनमानी
जयप्रकाश मिश्रा, बहराइच
बहराइच। पुर्वांचल का यह कहावत सइयां भए कोतवाल तो काहे का डर... को लोग चरितार्थ करने पर लगे हुए हैं। पूरे प्रशासनिक ढांचे की यही हालत है। इसकी मिसाल पूर्वी उत्तर प्रदेश स्थित बहराइच जिले के जतौरा गांव में देखने को मिली है। वहां पर भाभी के प्रधान होने के कारण उनके देवर ने मनचाहे ढंग से राशन की कालाबाजरी करने में मशगूल है। उसे किसी भी प्रसाशनिक अधिकारी का खौफ नहीं है।
एक तरफ तो प्रदेश सरकार गरीबों के लिए अनेक योजनाएं जैसे मा. कांशीराम योजना को संचालित कर रही है, वहीं सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़े लोग भी गरीबों का जमकर शोषण कर रहे हैं। यह बात किसी एक जगह की नहीं है, बल्कि कमोबेस पूरे प्रदेश में यही हालात हैं। प्रदेश का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं होगा जहां पर तहसील से लेकर ग्राम प्रधान और राशन डीलर तक गरीबों को मिलने वाले आर्थिक सहयोग का बंदरबांट न होता हो। राशन डीलरों का आलम यह है कि वे ग्राम प्रधान को तो हिस्सा देते ही हैं साथ में तहसील, ब्लाक और जिले पर बैठने वाले संबंधित अधिकारियों से भी मिलीभगत करके गरीबों को मिलने वाले चीनी, केरोसिन और बीपीएल कार्डों पर मिलने वाले राशन को संबंधित लोगों को वितरित न करके खुद हड़प जाते हैं। इस संबंध में 'उकाब दि बर्डÓ की टीम ने बहराइच में जब लोगों की समस्याओं के बारे में जानकारी ली तो राशन के कालाबाजारी का मामला सामने आया।
जनपद के कैसरगंज तहसील क्षेत्र में आने वाला गांव जतौरा पिछले कुछ समय से राशन की कालाबाजारी को लेकर चर्चा में बना रहा। इस गांव का कोटा गांव की महिला प्रधान आशा देवी के देवर परमजीत के पास है। गांव प्रधान के अपने रुतबे और प्रशासनिक अफसरों से गहरी पैठ के चलते राशन डीलर अपनी मनमानी कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि गांव के लोगों ने कुछ दिनों पहले राशन की कालाबाजारी करते राशन डीलर को रंगे हाथों पकड़ चुके हैं और ले जा रहे गेहूं के खेप को पुलिस के हवाले भी कर चुके हैं। गांव वालों का कहना है कि इसके बावजूद अभी तक राशन डीलर के ऊपर कोई भी कार्रवाई नहीं हुई। लोगों का कहना है कि इसके बाद से हम लोगों ने विरोध करना ही छोड़ दिया। जब पूरा प्रशासन इसी भ्रष्टाचार में लिप्त है तो शिकायत करने से कोई फायदा नहीं। उन्होंने कई बार इसकी शिकायत लिखित रूप से एसडीएम से भी करते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर वही ढाक के तीन पात। विगत 9 मार्च 2010 को जतौरा के रहने वाले बंसल लाल, जयप्रकाश मिश्रा, सीतेश चन्द तिवारी, जनार्दन प्रसाद, पारस नाथ, मिथलेश वर्मा, नन्द किशोर सिंह, रक्षाराम, विजय प्रताप, उदयराज सिंह, रामकुमार शुक्ला, ज्ञान प्रताप, सिपाही लाल, ओमप्रकाश, रामतेज मिश्रा, अमीरकालाल पाल, बृजेश कुमार, बंसत लाल, कैलास नाथ, माताप्रसाद तिवारी, भानु प्रताप, सुनील कुमार, सुरेश कुमार, पिन्टू मिश्रा, हाफिज अली, अय्यूब मोहम्मद, शब्बीर, प्रभुदयाल मिश्रा, दिनेश वर्मा, अवधेश, मनोज कुमार वर्मा आदि ने राशन डीलर पर मिट्टी का तेल न बांटने सहित कई आरोप लगाये थे। कुछेक को छोड़कर लगभग पूरा गांव इस डीलर से खफा है।
जतौरा गांव निवासी जय प्रकाश मिश्रा का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत जोभी खाद्य सामग्री आती है उसे गरीबों को वितरण करने के बजाय ब्लैक में बेच दिया जाता है। यह गोरखधंधा पिछले काफी समय से चल रहा है। उन्होंने कहा कि कोटेदार के इस गलत कार्यशैली में छोटे-मोटे अधिकारियों का मिलीभगत भी है। उन्होंने शिकायत प्रत्र की एक प्रतिलिपि कैसर तहसील में कार्यरत एसडीएम को भी रिसीब करवाया है।
यही नहीं बल्कि कोटेदार ने गांव के कुछ लोगों का राशन कार्ड भी अपने पास रखता है और हर माह अपने आप ही कार्ड पर एंट्री भी कर देता है। गांव वालों का कहना है कि जब राशन लेने पहुंचते हैं तो उन्हें भगा दिया जाता है। अब गांव के लोग इस कोटेदार से आजिज आ चुके हैं। प्रशासनिक अधिकारियों में डीलर की पकड़ इतनी मजबूत है कि गांव वाले अब खुलकर शिकायत करने से बच रहे हैं।

क्या कहते हैं एसडीएम?
इस संबंध में जब कैसरगंज तहसील के एसडीएम दिलीप कुमार से फोन पर बात की तो उनका कहना है कि 'मुझे आये अभी कुछ ही दिन हुए हैं, इसलिए इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। यदि यह मामला मेरे संज्ञान में आया तो हम इस पर उचित कार्रवाई करेंगे। पूर्व में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, इस संबंध में हम कुछ नहीं कह सकते हैं।Ó इसके बाद वे अपने काम में बिजी हो गये और लाइन काट दिया।

Wednesday, August 18, 2010

एक हजार लोग हो सकते हैं स्वाइन फ्लू के शिकार


मान सिंह चौहान
स्वाइन फ्लू ने शहर में दस्तक दे दी है। सेक्टर 41 निवासी अस्पताल कर्मी युवती तो ठीक हो गई है लेकिन स्वास्थ्य विभाग की परेशानी साफ झलकने लगी है। विभाग ने स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए प्रदेश सरकार से संसाधनों की मांग की है। एक हजार लोगों का उपचार करने लायक दवाएं, वैक्सीन और उपकरण मांगे गये हैं क्योंकि डाक्टरों का मानना है कि खराब मौसम के कारण पिछले साल के मुकाबले इस साल मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
गत वर्ष एक के बाद एक करके 309 मरीज शहर के तमाम अस्पतालों में स्वाइन फ्लू से पीडि़त पाए गए थे। फोर्टिस अस्पताल में भरती एक मरीज की मौत भी हो गई थी। विशेषज्ञ चिकित्सकों का मानना है कि स्वाइन फ्लू का वायरस भारतीय मौसम में अनुकूलित हो चुका है। दूसरी बीमारियों के वायरस के संपर्क में आकर इसमें बदलाव भी आए होंगे। अपोलो अस्पताल के डा. डी शर्मा का कहना है कि इस संबंध में देश भर में शोध चल रहे हैं। इस बार बारिश समय से पहले हुई है और लगातार भी नहीं हो रही है। बारिश के बाद मौसम साफ हो जाता है, जिससे तापमान और उमस बढ़ती है। ऐसा मौसम वायरल और बैक्टीरियल विकास के लिए मुफीद होता है। स्वाभाविक है कि स्वाइन फ्लू लोगों को परेशान करेगा। स्वास्थ्य विभाग में एंटी स्वाइन फ्लू सेल के प्रभारी डा. अनिल कुमार का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल रोगियों की संख्या बढ़ सकती है। जिसे ध्यान में रखकर एक हजार रोगियों का उपचार करने लायक इंतजाम किए जा रहे हैं। सरकार से 10,000 ओसिल टैमीविर कैप्सूल, 1,000 टैमी सिरप फ्लू, 1,000 वीटीएन, 1,000 थ्रोट स्वैप, 5,000 टू लेयर फेस मास्क, 1,000 एन-95 मास्क, 1,000 हैंड सेमी टाइवर मांगे गए हैं। पत्र शासन को भेजा गया है। दवाएं और उपकरण जल्दी मिलने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि निजी अस्पतालों में स्वाइन फ्लू का उपचार नहीं है। जिला अस्पताल के बाद दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उपचार संभव है। पिछले साल शहर के कालेजों, विश्वविद्यालयों और कंपनियों में बड़ी संख्या में स्वाइन फ्लू के रोगियों की पहचान की गई थी। जिला अस्पताल में ही 309 बीमारों का उपचार किया गया था।
जिला अस्पताल में डेंगू से पीडि़त तीन और मरीज भर्ती हुए हैं। तीनों को डेंगू की पुष्टिï होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने उपचार शुरू कर दिया है। पीडि़त युवकों में एक की उम्र 25 वर्ष और दूसरे की 15 वर्ष है। तीसरा रोगी 42 वर्ष का है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मीना मिश्रा ने बताया कि फिलहाल तीनों खतरे से बाहर हैं।
वहीं नोएडा क्षेत्र में एक 17 वर्षीय युवती में स्वाइन फ्लू की पुष्टि की गई है। पीडि़त को जिला अस्पताल से टेमी फ्लू दवा दी गई है। सेक्टर-41 में रहने वाली युवती का इलाज मैक्स अस्पताल में चल रहा था। स्वाइन फ्लू की पुष्टि के बाद वह जिला अस्पताल जांच कराने आई। रिपोर्ट के आधार पर इसे टेमी फ्लू दे दी गई है। साथ ही सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। जिला अस्पताल की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक राजरानी कंसल ने बताया कि निजी अस्पताल की पुष्टि पर युवती को दवाएं दी गई हैं। जिला अस्पताल में इससे पहले भी बीमारी के संदिग्ध मरीज आ चुके हैं। वर्ष 2009 के नवंबर व दिसंबर माह में जिले में स्वाइन फ्लू के लगभग 300 मामले सामने आए थे। बीमारी से चार लोगों की मौत भी हुई थी। जिला अस्पताल में स्वाइन फ्लू के टीके व जांच की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि अभी चिकित्सीय कर्मचारियों के लिए ये टीके उपलब्ध कराए गए हैं।

ncr@ekkadamaage.com