Thursday, September 29, 2011

पीड़ा


- जय प्रताप 

पीड़ा से वह तड़प रही थी। तीन फुट चौड़ी गली में झुग्गी की औरतें भीड़ लगाए खड़ी थी। गली में तिल भर भी जगह नहीं था, जिसके कि अंदर क्या हो रहा है, उसका जायजा लिया जा सके। बिजली भी आंखमिचौली का खेल खेल रही थी। यही वजह थी कि पूरी झुग्गी बस्ती को अंधेरे ने अपने कब्जे में ले लिया था।

औरतें एक-दूसरे से कहती- ''अब इसका भगवान ही मालिक है। इसे कोई नहीं बचा सकता, यह मर जाएगी।'' दूसरी कहती, ''इसका मरद भी नहीं है। पता नहीं वह आज आऐगा कि नहीं। आता तो शायद अस्पताल ले जाने पर बच जाती। इसका है ही कौन जो इसका दवा दारू करवाए।'' कहते हुए उसने अपने पल्लू से आंख पोछी और चली गई। बाकी की औरतें भी अपनी गर्दन को उठाती, उस सीलन भरी अंधेरी कोठरी में झांकती और दूसरी को देखने का मौका देते हुए एक ओर को सरक जाती। एक औरत ने चिल्लाते हुए कहा, यह लड़का नहीं राक्षस है राक्षस जो पैदा होने से पहले ही मां को खा लेगा। डॉ क्या करेगा, जो लिखा है, वही होगा। इसे अब ऊपर वाले का ही भरोसा है।

चार फुट चौड़ी और सात फुट लंबी कोठरी थी। जिसे चारों ओर से एक के ऊपर एक र्इंट डाल कर खड़ा किया गया था। प्लास्टिक के ऊपर थर्मोकोल के टुकड़ों को डालकर छज्जा बनाया गया था। बरसात का पानी तो मानो कसम खा लिया था कि मुझे कमरे से बाहर जाना ही नहीं है। लेकिन सूरज की गरम-गरम किरणें काफी दिनों से अंदर जाने के लिए संघर्ष करती रहीं। बगल में पानी से लबालब भरी एक नाली बह रही थी, जिसका थोड़ा बहुत पानी कोठरी में घुस गया था। पूरी कोठरी चीथड़ों से भरी पड़ी थी। एक कोने पर सोने का बिस्तर तो दूसरे पर अंगीठी रखी गई थी। इसमें से धुंआ उठ रहा था, जिससे आंखों में जलन हो रही थी। यही कारण था कि कोई भी औरत अंदर जाने से कतराती थी।

वह जोर-जोर से पैरों को पटक रही थी। उसका आधा शरीर कोठरी में फैले पानी में भीग चुका था, जिससे गरम-भरी मौसम में शरीर को राहत मिलती थी। ''मुझे बचा लो, मैं मर जाऊंगी। कोई मेरे मरद को बुला दे। डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हारा म्ं इलाज नहीं करूंगा, तुम अस्पताल जाओ। आह....। उसकी दर्दनाक चीख निकल पड़ी और बेहोश हो गई। जब भी उसे हाथ आता, वह लोगों की ओर एक तक देखती और दर्द से छुटकारा पाने की याचना करती।

वह कई सालों से नोएडा के सेक्टर-9 की झुग्गी में रह रही थी। उसका पति एक दिहाड़ी मजदूर था। उसे कभी-कभी तो महीनों काम मिलते रहते, लेकिन कभी ऐसा भी दिन आता, जो फांके मस्ती मे गुजरता। तीस साल की उमर में ही उसके तीन बच्चे पैदा हो गए थे, जो धूल मिट्टी में सने नंग-धड़ंग झुग्गियों में घूमा करते। उन्हें पढ़ाने लिखाने का तो दूर शरीर को ढकने के लिए कपड़ों का भी इंतजाम नहीं कर पाते।

उसे काफी दौड़-भाग के बाद कब्जा बनाने वाली एक कंपनी में काम मिल गया था। बारह से चौदह घंटे काम करने के बाद वह इतना थक जाती की बड़ी मुश्किल से खाना बना पाती। बच्चों की देखभाल करना तो दूर की बात थी। पेट में बच्चा होने से उसके लिए बारह घंटा काम करना मुश्किल हो रहा था। कभी-कभी तो उसकी इच्छा होती कि वह काम छोड़ दे। लेकिन रोटी की संकट उसे काम करने पर मजबूर कर रही थी।

मालिक को जब यह पता चला कि वह पेट से है, तो उसने बिना देर किए उसे काम से निकाल दिया। वह कई दिनों से बीमार चल रही थी। वह डॉक्टर के पास नहीं जा रही थी, क्योंकि उसे डर था कि डॉक्टर 500 रुपये का बिल बनाएगा। उसे वह कहां से देगी। उसके लिए तो पचास रुपये भी ज्यादा थे। इसका पति फरीदाबाद में एक कंपनी में काम करता था। वह मुंह अंधेरे घर से निकल जाता और देर रात को वापस आता। इतवार को भी उसे छुट्टी नहीं मिलती थी। यह किसी दिन बीमार हो जाता तो उस दिन की दिहाड़ी भी खत्म हो जाती। पत्नी के साथ बैठ कर आराम से बात करना तो उसे नसीब नहीं था। कई दिनों दिनों से उसके जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी। उसे, मालूम थी कि बिना पैसे का पत्नी का इलाज नहीं हो सकता, लेकिन सब जानकर भी वह अनजान बना हुआ था। आखिर एक दिन मैनेजर के पास चला ही गया। 

''बाबू जी मुझे कुछ एडवांस दिलवा दीजिए। मेरी बीवी को बच्चा होने वाला है। उसे अस्पताल भी ले जाना पड़ सकता है। चार दिन की छुट्टी भी चाहिए।'' एक ही सांस मे वह बोलता गया।

"जाओ काम करो। दोबारा यहां आने की हिम्मत मत करना। अभी छह महीना भी काम करते नहीं हुआ और तुम्हे एडवांस की जरूरत पड़ने लगी। उसे बच्चा जनना होगा तो जन ही देगी। अभी माल बाहर भेजना है, इसलिए छुट्टी का तो नाम ही मत लेना। रहा एडवांस का तो बाद में देखा जाएगा।" मैनेजर ने गुस्से में कहा। वह चला आया और सब कुछ अपने भाग्य पर छोड़ दिया।

एक-एक कर सभी औरतें चली गई। वहां अगर कुछ बचा था तो दर्द भरी कराह और भूख से तड़पते बच्चों की चिल्ला-पों। उसमें इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह बच्चों के सिर पर हाथ रखकर अपनी ममता को उनपर न्योछावर कर सके।

अचानक जोर की पीड़ा हुई और उसने नीचे के होंठ को दांतों से भींच लिया, जिससे खून की एक धार फूट पड़ी। दर्दनाक चीख के साथ वह बेहोश हो गई। इस दृष्य को देख रहे एक व्यक्ति ने दोनों हाथों से अपने आंखों को ढांकते हुए एक छोटी सी छुग्गी में घुस गया। उसने जब अपना हाथ हटाया तो वह आंसुओं से भीग चुका था। वह काफी देर से इस वाक्य को देख रहा था, लेकिन वह क्या करे, कोई भी निर्णय नही ले पा रहा था। वह कई बार उसकी सहायता करने के लिए आगे बढ़ता फिर पीछे मुड़ जाता।

वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि एक छोटा-मोटा होमियोपैथिक डॉक्टर था। वह दिन भर झोले में दवाइयां भरकर झुग्गियों में लोगों का इलाज करता और जो कुछ कोई देता उसी से अपना गजारा कर लेता। वा भी पड़ोस की झुग्गी में रहता था। घंटों से वह इस वाक्य को देख रहा था और औरत के पास जाने की हिम्मत जुटा रहा था।

आखिरकार उसने पीड़ा से कराह रही औरत के पास जाने का निर्णय कर लिया। उसने अधखुले फाटक पर दस्तक दिया और कुछ पल इंतजार करने के बाद उसे पूरा खोल दिया। अंदर का दृष्य देख कर वह दंग रह गया। फर्श पर बिखरे पानी में वह औरत अधनंगी पड़ी थी। वह अपने दोनों हाथों से चेहरे को दबाए हुए थी। अंगुलियों के बीच ताजे खून के थक्के जमे हुए थे। वह उलटे पांव कमरे से बाहर निकला और पड़ोस की एक औरत को आवाज देकर फौरन कमरे में गया और बाल्टी से एक अंजुल पानी लेकर उसके चेहरे पर छींटा मारा। बड़ी मुश्किल से उस औरत ने आंख खोली और उसने दोनों हाथों को एक साथ जोड़ने का काफी देर तक प्रयास करती रही। उसके आंखों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि कह रही हो। डॉक्टर बाबू मुझे इस दर्द से छुटकारा दिलवा दो।

'' डॉक्टर बाबू! हमका बुलाए हो, का बात है, ऊ जिंदा है कि नाहीं।" पड़ोस की एक औरत ने कमरे में घुसते हुए कहा। 

"हां जिंदा है।" डॉक्टर ने कहा, "इसका शरीर बुखार से तप रहा है। इसे उठा कर खाट पर लिटाना पड़ेगा।" यह कहते हुए उसने बगल में पड़ी खाट पर गुदड़ी को पसार दिया ओर उस महिला की सहायता से बीमार को खाट पर लिटा दिया। वह काफी देर तक उसके माथे पर भीगी पट्टी को बदलता रहा और पांच-दस मिनट पर उसके मुंह में दवा का बूंद डालता रहा।

दवा लेते अभी एक घंटा भी नहीं हुआ था कि वह हृदय विदारक चीख के साथ छटपटाना शुरूकर दी। डॉक्टर ने अपनी आंखें बंद कर ली और अपने दोनों हाथों से उसके पेट को सहलाता रहा।

अचानक एक नवजात शिशु के रोने की आवाज आई और उसने अपनी आंखें खोल दी। बच्चे की आवाज सुनते ही पड़ोस की महिलाएं एक बार फिर उस छोटी सी झुग्गी के आसपास जमा हो गई। डॉक्टर का चेहरा खुशी से चमक उठा। वह भीड़ से रास्ता बनाता हुआ निकल गया।

Wednesday, May 4, 2011

नये गांधी का जन्म


जय प्रताप सिंह

‘सत्तर साल का यह बुड्ढा आखिर कहां से आ टपका। यह चाहत क्या है? क्या हमारी लुटिया डुबोएका? क्या पड़ा था इन नेताओं को, अरबों रूपये एक ही साथ गटक जाने का। मिल-बांट कर थोड़ा -थोड़ा खाते तो शायद कुछ वर्षों तक ऐसे ही चलता रहता। ‘‘हम भी खाएं, तुम भी खाओ,’’ वाली कहावत ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन शवाल यह है कि हमारा काम कैसे चले।’’ सेठ करोड़ीमल कमरे में चहलकदमी करते हुए बड़बड़ाए जा रहे थे। उन्होंने बड़ी मुश्किल से दोनों हाथों को अपनी तोंद पर रखा और उसे सहलाते हुए विखरे अखबार के पन्नों को हाथ में कस के पकड़ लिया। और एक हाथ से मसलन को कमर के पास लगाकर बैठ गए।

जिस भी अखबार को देखते उसी पर मोटे-मोटे अक्षरों में ‘भ्रष्टाचार मिटाना है, जनता का लोकपाल विधेयक बिल पास कराना है,’ लिखा हुआ पाते। उन्होंने अपने सिर को जोर से दबायाऔर सोच की मुद्रा में डूब गये। ‘‘पिछले साल तो कारखाने में लाखों का बिजली गिल भुगतान करने के बजाय अधिकारियों को मात्र दस हजार रुपये देकर खत्म करवा दिया था। इस साल क्या होगा? अनाज भी गोदामों में भरा पड़ा है।’’ ऐसे ही कई सवाल उनके दिमाग में उमड़-घमड़ रहे थे।

‘‘सेठ जी राम राम।’’ सेठ जी ने पीछे मुड़ कर देखा तो शहर के ससम्मानित नेता राम भरोसे मुस्कुराते हुए खड़े थे। ‘‘आइए, बैठिए नेताजी।’’ सेठ करोड़ीमल ने उन्हें सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए कहा। ‘‘कौन-सी विपत्ति आ पड़ी सेठजी। चेहरे पर क्यों बे-मौसम चिंता को बुलावा दे रखे हो।’’

रामभरोसे ने सोफे पर बैठते हुए कहा। ‘‘अब क्या होगा? कैसे हम लोगों की दाल गलेगी! इस बुड्ढे ने तो पूरे देश में हलचल पैदा कर रखी है। रहा सवाल आपका तो आप भी नहीं बचोगे।’’ ‘‘सठिया तो नहीं गये करोड़ीमल। क्या तुम्हे नहीं मालूम कि यदि हम खाना जानते हैं, तो पचााना भी जानते हैं। रहा सवाल आप लोगों की सेवा का तो ठााई, वह तो मैं करुगा ही। आखिर मैने आपका नमक जो खाया है। आप ही के पैसे से चुनाव जीता हूं और आप की ही दुआ से पांच साल में करोड़पति भी बन चुका हूं।रहा सवाल जनता का तो वह भेड़ की सिवा कुछ नहीं है। आज वह इस बुड्ढे पर इतरा रही है तो कल कोई ऐसा पाशा फेकेंगे कि सबकुछ भूल जायेगी। वह हमे ही अपना रहनुमा मान लेगी।’’ नेताजी मूछों पर हाथ फेरते हुए कुटिल मुस्कान के साथ चुप हो गए।

‘‘आप हंस रहे हैं, और यहां है कि मेरी जान निकल रही है। मेरे पोते को नौकरी भी दिलवानी है। उसके लिए दस लाख रुपये में बात भी हो गयी है। लेकिन-----।’’

‘‘आप तो नाहक ही परेशान हो रहे हो! सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा। भगवान पर भरोसा रखो वह हमारा कुछ भी नहीं बिकगड़ेगा। हम इतना जो चढ़ावा देते हैं। आखिर उसका तो फल हमें मिलेगा ही। चलो, जल्दी से नहा धो कर पूजा-पाठ कर लो और शाम को अनशन पर बैठना है।’’ नेता जी ने सोफे से उठते हुए कहा।

‘‘अनशन, अरे...बाप..रे..........। यह कैसे हो सकता है? हम लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर सकते हैं क्या?। आप पाकल तो नहीं हो गए हो।

‘‘पागल हों हमारे दुश्मन। आपको नहीं मालूम कि हमारे ही लोग आज उनका समर्थन कर रहे हैं। यही नहीं बल्कि जनता भी हमारा ही साथ दे रही है। क्या तुम्हे यह नहीं मालूम कि हमारे नये गांधीवादी नेता ने कहा है- भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाने में जनता के प्रतिनिधि शामिल होंगे। प्रतिनिधि का मतलब शोसल वर्कर। वही शोशल वर्कर जिनमें हमारे बिरादरी के लोगों का भरमार है। ’’ उन्होंने एक बार फिर राम-राम किया और चले गये।

शहर के शहर के मेन चौक पर एक लम्बी चौड़ी दरी पर चमचमाती हुई सफेद चादरें बिछी हुई थीं। किनारे-किनारे ऊंचे ऊंचे मसलन लगे हुए थे। सामने महात्मा गांधी की तस्वीर टंगी थी। उसी के बगल में नये गांधी की भी तस्वीर थी, जो हाथ में तिरंगा लिए अनशन पर बैठे दिखाए गये थे। मंच पर आसीन शहर के सम्मानित और ईमानदार नेता राम भरोसे, सेठ झींगुर लाल, सेठ कुंदन लाल, सेठ करोड़ीमल, सामाजिक कार्यकर्त्ता सेठ भकोले दास, जो सेठ करोड़ीमल के करीबी रिस्तेदार थे, के अलावा कई ईमानदार और जुझारू नेता आसीन थे।

मंच पर खड़ हो कर जनता के इन सेवकों ने हाथ में फूलमाला लिए- भ्रष्टाचार कुर्दाबाद, जन लोकपाल बिल पास हो, जनता को जगाएंगे-भ्रष्टाचार को मिटाएंगे आदि नारों को लगाते हुए बापू की तस्वीर को फूलमालाओं से ढक दिया। जैसे मानो कह रहे हों कि बापू तुम इसी तस्वीर में पड़े रहो, कुछ मत देखो। हम तुम्हारा काम कर ही देंगे। मंच पर उपस्थित लोगों ने एक-दूसरे को माला पहनाया और सिर पर गांधी टोपी लगाए ‘‘रघुपति राघव राजाराम, पतितपावन सीता राम,’’ भजन गाने में मशगूल हो गए।

‘मंच पर आसीन जनता के सेवक सेठ करोड़ीमल, सेठ झींगुलाल, सेठ कुंदनलाल और प्रखर सामाजिक कार्यकर्त्ता सेठ भकोले दास एवं उपस्थित देवतुल्य मेरी प्यारी जनता।’ लोगों का अभिवादन करते हुए नेता रामभरोसे ने अपना भाषण जारी रखा।

‘‘मेरी प्यारी जनता एवं देशवासियों, बड़े दुख की बात है कि आज पूरा देश भ्रष्टाचार में डूब चुका है। भ्रष्टाचार ऐसी छुआछूत की बीमारी है कि जिसको एक बार छू लेती है, उसका जन्म जन्मांतर साथ नहीं छोड़ती। ऐसा नहीं कि पूरा देश भ्रष्ट है, बल्कि इसी देश और समाज में हमारे जैसे ईमानदार लोग भी मौजूद हैं। जो इस बीमारी को खत्म करने का वीड़ा उठा रखे हैं। धन्य हैं आप लोग जिसे सेठ करोड़ीमल ओर सामाजिक कार्यकर्त्ता सेठ भकोले दास जैसा मार्गदर्शक मिला है।’’ मंच पर बैठे लोगों ने तालियां बजाई।इसके साथ ही पूरा सभा तालियों से गूंज उठा।

‘‘मैं वायदा करता हूं कि हम महात्मा गांधी की राह पर चलकर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने वाले कानून को लागू करवा कर ही दम लेंगे। हम तब तक अन्न ग्रहण नहीं करेंगे, जबतक की हमारे गांधीवादी नेता अपना अनशन नहीं तोड़ते। हम शहर की जनता को साथ लेकर दिल्ली पहुंचेंगे। चाहे इसके लिए मेरी जान ही क्यों न चली जाए।’’ तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सेठ करोड़ीमल और नेता रामभरोसे की जयजयकार चारो ओर गूंज उठी।

मंच के चारों ओर मीडिया वालों की जमघट लग गई। नेता रामभरोशे, करोड़ीमल सहित मचासीन लोगों ने अपनी अपनी फोटो खिंचवाने में मस्त रहे। हर कोई उनके इर्द-गिर्द आश लगाए घूमता रहा कि शयद मेरा भी फोटो नेताजी के साथ खिंच जाए।

सेठ कारोड़ीमल ने अपनी धोती के लटक रहे खंूट को पकड़ कर खड़े हुए और एक हाथ से टोपी को ठीक करते हुए माइक के सामने खड़े हो गए।

‘‘मंच पर उपस्थित आदरणीय ईमानदार व कर्मठ नेता राम भरोसे जी एवं मंच पर उपस्थित महानुभावों। मेंर प्यारी जनता!यह कहने की जरूरत नहीं है कि हम लोग यहां पर आखिर किस लिए इकट्ठे हुए हैं। देश की इस दैनीय स्थिति को देख कर हमें बहुत बड़ा आघात पहुंचा है। गांधी के इस देश में इतने भ्रष्टाचारी हों, यह हम सपने में भी नहीं सोच सकते थे। लेकिन यह भी सच्चाई है- एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है। और दोष सभी मछलियों पर लगता है। हम उस नये गांधी के आभारी हैं जिसने हमारी आँखें खोल दी हैं। हम तब तक इस भ्रष्टाचार से लड़ेंगे, जब तक कि हमारे शरीर में एक भी खून का कतरा शेष रहेगा।’’ उन्होंने सिर को नीचे झुकाया और धोती के पिछल्ले छोर को मजबूती के साथ पकड़ कर नैनों से बह रहे अश्रुधारा को पोंछा और अपनी बात जारी रखी। जनता तालियों की गड़गड़ाहट से इस महान नेता का सम्मान करने में पीछे नहीं थी। वह धन्य थी ऐसी महन हस्तियों का साथ पाकर।

‘‘भाइयों!अब कल से हम मोमबत्ती जलाकर मार्च निकालेंगे जिसमे आप सबका सहयोग चाहिए।’’ हम साथ हैं, हम साथ हैं....। एक साथ सैकड़ों हाथ उठ गए।

कहीं भी अनशन हो या मार्च, वह छात्रों का ही क्यों न हो, उसकी अगुवाई सेठ करोड़ीमल और उनके हमससथी नेतृत्व दे रहे थे।

‘‘राम राम करोड़मल भाई। क्या अकेले ही सारी शराब गटक जाओगे या.......।’’रामभरोसे ने बैठका में पहुंचते ही सवाल किया।

‘‘आवो! रामभरोसे, भई आपने तो कमाल कर दिया। पूरा पाशा ही पलट दिया।’’ यह कहते हुए करोड़ीमल हहाक से गले मिले और एक कुर्सी उनकी ओर खिसका दिया। और लोगों ने भी हंसी के ठहाके लगाए।

‘‘देखते जाओ करोड़ीमल, सभी कुछ हमारे ही हक में होगा। मैने कहा था न, जनता भेंड़ है। उसे जिधर चाहो मोड़ दो। बस पीछे मत मुड़ना, अपनी जुबान पर जरा काबू रखना। सभी जगहों पर अपने ही लोग मौजूद हैं। ’’ रामभरोसे शराब की चुश्की लेते हुए जवाब दिया। देर रात तक शराब और कबाब का दौर चलता रहा और शहर के यह प्रतिष्ठ व सम्माननीय लोग नशे में ण्ूमते रहे।

उधर, हर किसी की जुबान पर था कि देश के सामाजिक कार्यकर्त्ता इस आंदोलन में कूद पड़े हैं। अब भ्रष्टाचार खत्म हो जएगा, खत्म हो जएगा।

Sunday, February 13, 2011

फुटपाथ (एक प्रेम कहानी)

Jai Pratap Singh
मै फुटपाथ हूं। शायद आप चलते वक्त मेरे बारे में जानना नहीं चाहते कि मै कब और कैसे पैदा हुआ? लेकिन मै जानता हूूूूं, आपके बारे में वह सबकुछ जिसके बारे में आप सोचते हैं कि किसी को नहीं पता। यहां तक की आपके जूते के नम्बर भी। जूतों की ठोकरों से पैदा हुए दर्द को भी मै बखूबी महसूस करता हूं। उन तमाम भूखे प्यासे बेघर लोगों के दुख दर्द पर दो-चार आँसू भी बहाता हूं, भले वह मूक ही सही। इसके बावजूद मै एक फुटपाथ हूं। और तो और, मै मोहल्लों से लेकर सभी शहरों में मौजूद हूं, चाहे वह छोटा शहर हो या बड़ा। सभी जगहों पर मै निराश्रितों को आश्रय देता हूं और उनका दुख-दर्द बांटता हूं। अब बेसब्री से मै उनका इंतजार कर रहा हूं।
लालिमा लिए सूरज की किरणें जैसे ही पश्चिम में विलीन होतीं, रात्रि की बेला पूरे शहर को अपने आगोश में समेट लेती। अंधेरा होते ही शहर की बत्तियां जल उठतीं और सबकुछ प्राशमय हो जाता। मै यह सोचकर आनन्दविभोर हो उठता कि अब कुछ पल ही सही, मेरा अपनों का साथ होगा।
रात काफी बीत चुकी थी। छोटी-मोटी दुकाने कभी का हटा ली गई थीं। बीरान पड़ा मै पलकपावड़े बिछाए अपने मेहमानों का इंतजार कर रहा था। मेरे मेहमान भी निराले थे। वे भारी-भरकम गाडिय़ों से नहीं आते और न ही बहुत शेरशराबा ही करते थे। कोई टाट लटकाए तो कोई अखबार लेकर आता, धूल-मिट्टी को झाड़ता और उसे मेरे ऊपर बिछाकर लम्बलेट हो जाता। जब वह हाथ से मिट्टी को झाड़ रहा होता तो ऐसे महसूस होता जैसे कि मेरी प्रेमिका मेरे पीठ हाथ फेर रही हो और बालों में उंगलियों को घुमाते हुए कह रही हो कि तुम चिंता मत करो। मै आ गई हूं, अब सभी दु:ख दर्द को बांट लुंगी। उस समय मेरे आँखों से खुशी के दो बूंद आँसू टपक पड़ते। इन थके-हारे मेहनतकशों को आश्रय देने में मुझे काफी शुकून मिलता।
लोग भले ही अलग-अलग जाति धर्म के हों, लेकिन वे मेरे लिए बस फुटपाथी थे। उनके लिए मै स्वर्ग के समान था। इतने बड़े शहर में इन अभागों को जब कहीं आश्रय नहीं मिलाता तो उस समय चेहरे पर मुश्कान लिए दोनों हाथों को फलाकर मै कहता- आओ! निराश्रितों, मेहनतकशों और मेरे प्यारे लाडलों! तुम्हारा स्वागत है। रात होते ही मोटरों के भोंपू बजना बंद हो जाते। इक्के-दुक्के माल ढोने वाले ट्रक रुक-रुक कर भोपू बजाने से बाज नहीं आते। फिर भी दिन भर के चिल्ल-पों से तो कम ही होता। धेरे-धीरे मेहमानों की जमघट लगनी शुरू हो जाती। इसके बाद शुरू होता नोंकझोंक। ''यह मेरा जगह है, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आसन जमाने की। फुटपाथ किसी की बपौती नहीं है। मैं यहां एक महीने से सोता चला आ रहा हूं और तुम मेरी जगह पर कब्जा जमाने की फिराक में हो।ÓÓ पहले ने नाक-भौंह सिकोड़ते हुए कहा और दोनों भिड़ गये। नया आदमी वहीं पर खड़े खड़े बड़बड़ाए जा रहा था। 'आज मुझसे देर रात तक काम करवाया है। खाने के लिए पैसा मांगा तो वह खूसट मालिक ने दिहाड़ी का पैसा ही नहीं दिया। उल्टे दो-चार गालियां शौगात में दे दीं। भूख के मारे  पेट में दर्द हो रहा है।ÓÓ ''आ बैठ, रूखा-सूखा तू भी खा ले।ÓÓ पहले ने थैले में से दो रोटियां निकाली और उसकी ओर बढ़ा दिया। दोनों एक साथ बैठ कर भूखे भेडि़ए की तरह रोटी पर टूट पड़े। यह सब देखकर मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ। उल्टे मुझे हंसी आ गई।
यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी बल्कि रोज-ब-रोज लोग आपस में लड़ते-झगड़ते और कुछ ही समय बाद एक-दूसरे से अपने दु:ख-दर्द को बांटते हुए घंटों चर्चा करते और बीड़ी सुलगाकर धूएं का गुबार छोड़ते। दिन भर की थकान के बाद जब ठंडी-ठंडी पछुआ हवा बहनी शुरू होती तो उन्हें स्वर्ग जैसी अनुभूति होती। कुछ ही देर बाद आपस में हो रही वार्तालाप और लड़ाई-झगड़ा और खर्राटों में बदल जाती। उनकी चिल्लपों और खर्राटों से मुझे काफी शुकून मिलता। मुझे इनसे कोई शिकवा शिकायत नहीं थी। अगर थी तो मेरे ऊपर दिन भर खड़े वाहनों से, जो बेजान-सी पड़ी रहतीं ओर जिनके बोझ तले पूरा दिन मै दबा रहता।
बीरान हो जाने के बाद मुझे तबतक चैन नहीं मिलता जब तक कि मेरे मेहमान नहीं आ जाते। उसमें से अगर किसी दिन कोई नहीं दिखता तो काफी देर तक मै किसी खतरे की आशंका से सोच में पड़ जाता। ऐसा तबतक होता जब तक कि देर रात या दूसरे दिन वह दिखाई नहीं दे जाता। उनके आते ही मै पार्किंग में खड़े वाहनों के बोझ तले दबे रहने के बावजूद काफी खुश रहता और मन ही मन लोरी गा-गाकर उन्हें सुलाता और खुद जागता रहता।
उस समय मै गुस्से से तमतमा उठता जब डंडा फटकारते हुए कोई सिपाही आता और एक-एक के ऊपर डंडा बजाता, दो-चार गालियां देता और जो कुछ भी जेब में होता, उसे लेकर चल देता। उस समय सिपाही ऐसे अकड़ कर चलता जैसे कि मानों यह उसका अधिकार है। सिपाही को देखते ही सारे लोग आतंकित हो जाते और टकटकी लगाए मुझे देखते रहते। जैसे कि मानों कह रहे हों- मेरे आश्रयदाता! काश, तुम इस महाकाल से भी मुझे बचा सकते। मुझसे यह सब देखा नहीं जाता। खून का घूंट पीकर बेजान मिट्टी की तरह पड़ा रहता और उनपर ढाए जा रहे अत्याचार को मूक बन कर देखता रहता।
सिपाही के वापस जाने के देर रात तक उनकी दर्दनाक कराहने और सुबक-सुबक कर रोने की आवाज सुनता और अपने आप पर गुस्सा करता। मै इनको आश्रय दे सकता हूं तो इनकी हिफाजत भी करनी चाहिए। लेकिन मै ऐसा नहीं कर पाता। आखिर क्यों? मै इसी उधेड़बुन में पूरी रात लगा रहता।
सूरज की किरणों के बिखरने के साथ ही लोग अपने फटे-पुराने चीथड़ों को उठाते, धूल झाड़ते और चल देते। मै उन्हे जाते हुए देखता रहता और उन्हें रोकने का प्रयास करता। लेकिन अपने में खोए चले जाते। एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखते। मै एकटक अपने मेहमानों को जाते हुए देखता रहता। फिर शुरू होता भारी भरकम वाहनों के पहियों का बोझ और जूतों की ठोकरों से पैदा हुआ दर्द। इसके बावजूद मै खुशी-खुशी यह सब वर्दाश्त कर लेता, क्योंकि दिन ढलते ही दुनियाभर का दर्द झेल रहे अपने जैसों का साथ होगा। उनको आश्रय दुंगा और मूक ही सही अपना दु:ख-दर्द बयां करुंगा। 
                - जय प्रताप सिंह
            मोबाइल- 9005919184

Tuesday, February 8, 2011

जुलूस

          वह एक मजदूर था। कारखाने में छपाई का काम करता था। काम करने के बीच उसे जब थोड़ा समय मिलता तो वह मजदूरों के जीवन के बारे में ढेर सारी बातें करता  और फिर शांत हो जाता। अगर कुछ शेष बचता तो धुआं छोड़ती मशीनों की गडग़ड़ाहट और छोटे-छोटे अक्षरों में निकले कागजों के बंडल। मशीन के बंद होते ही उसकी तंद्रा टूट जाती और दो-चार देशी गाली देते हुए जेब से तम्बाकू निकाल कर हाथ में मेठता और दो-चार ताल दे कर होंठों के बीच दबा लेता। इसके बाद थुकों का गुबार बनाता और आसपास नजर दौड़ाकर थूक देता। मशीन के एकाएक बंद हो जाने पर उसके एक-एक पुर्जे को खोलता और फंसे हुए कागज को निकाल कर नट बोल्ट कस देता। हाथ और चेहरे पर पुते कालिख को तेल में सने कपड़े से साफ करने का अशफल प्रयास करता और छपाई करने में तल्लीन हो जाता।
उसका पूरा नाम चिंतामणि था, लेकिन उसके मजदूर साथी उसे चिंता कहकर ही पुकारते थे। वह लम्बे कद और दुबला पतला तीस साल का नौजवान था। लेकिन हाड़तोड़ मेहनत और रूखा-सूखा खाने की वजह से कोई भी उसकी उम्र को चालीस साल से कम नहीं आंकता। उसके चेहरे पर असमय ही झुॢरयां पड़ गई थीं। गड्ढों में से झांकती हुई उसकी छोटी-छोटी आंखों में काफी तेज था। वह इतना नम्र स्वभाव का था कि हर किसी पर विश्वास कर लेता। उसने कई सालों से नोएडा शहर की झुग्गी बस्ती में जोड़ जुगाड़ से एक छोटी सी कोठरी बना रखी थी। वह इसी सीलनभरे बदबूदार झुग्गी में रहता था, जहां पर चौबिसों घंटे अंधेरा था। उस कमरे में तंबाकू और मशीन के तेल की भीनी-भीनी गंध मौजूद थी। उस झुग्गी बस्ती में हजारों छोटी-छोटी झुग्गियां थीं जिसकी हालात कमोबेश एक जैसी ही थी। कोठरी छह फुट लंबा और चार फुट चौड़ी थी। कोठरी में लकड़ी का एक तखत पड़ा था और उसके ऊपर धूल में लिपटे चिथड़े पड़े थे। इन्ही चीथड़ों को शरीर में लपेटता और सो जाता। उसी में खाने का सामान भी रखता था, जिसे दो-चार लकडिय़ां सुलगा कर रूखा-सूखा बनाता और अपनी छुधा को शांत कर लेता। कोठरी के पास से ही एक नाली बहती थी। इसी नाली में लोग बाग  ''मूदहुं आंख कतहुं कछु नाहींÓÓ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पेशाब कर लिया करते थे। उनके लिए इससे बेहतर और कोई जगह थी नहीं। वहीं पर दो ईंट ऊंचा करके एक संडास घर बना था। उसमें फाटक की जगह एक फटा-चिटा प्टास्टिक का बोरा लटका दिया गया था जिसमे बाहर से सबकुछ साफ दिखता था। यही कारण था कि मिली-जुली एक विशेष प्रकार की गंध पूरी झुग्गी में मौजूद थी।
रुक-रुक कर बिजली कड़क रही थी। न मालूम कब से काले काले डरावने बादल जमे हुए थे। उसी अंधेरी काली रात में बिहारी लाल आत्माराम के साथ आ धमके थे। आत्माराम को देख कर चिंता अपने दिमाग पर जोर डाल कर कुछ याद कर रहा था। आत्माराम ने आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया और बिना किसी संकोच के तखत पर पड़े चिथड़ों को फैला कर बैठ गया। चिंता कुछ बोल पाता कि तभी बिहारी लाल ने कहा- मै तुमसे मिलने ही आ रहा था कि रास्ते में यह भी मिल गए। मैने सोचा! चलो तुमसे ही मिलवा दूं।
आत्माराम दुबले पतले चौबीस साल के नौजवान थे। उनके  चेहरे से तेज टपक रहा था। तखत पर बैठते ही उन्होंने एक गिलास पानी मांगी और एक ही सांस में गटक लिया। उन्होंने गड्ढों में से झांकती हुई अपनी पैनी नजरों से कोठरी का मुआयना करते हुए गम्भीर स्वर में कहा- क्या हमारी जिंदगी गुलामों से बदतर नहीं है? हम दूसरों के लिए आलीशान मकान बनाते हैं, उनके खाने पीने के सामानों का उत्पादन करते हैं और खुद नरक जैसी जिंदगी व्यतीत करते हैं। आखिर कब तक हम इस तरह की जिंदगी जीते रहेंगे? कब सोचेंगे हम अपने बारे में? हमारी यह टाट बोरे से बनाई गई टूटी-फूटी झुग्गियां भी सरकार को फूटी आंखों नहीं सुहा रही हैं। सरकार ने इसे एक ही झटके में बुलडोजरों के हवाले कर देने का मन बना  चुकी है। रौंद डालना चाहती है, हमे और हमारे अरमानों को। यह अंतिम वाक्य चिंता को ऐसे लगा जैसे उसके सिर पर  मनभर  का हथौड़ा चला हो। वह चौंक कर उन्हें देखने लगा। वह डर गया। क्योंकि बहुत दिनों बाद किसी ने उसकी दुाखती रग पर हाथ रखा था। आत्माराम ने आगे कहा- हमारे सामने अब एक ही रास्ता है। हम सबको संगठित हो कर आंदोलन करना चाहिए। संघर्ष से ही हमे मुक्ति मिल सकती है। हमे एक पर्चा छाप कर झुग्गी बस्ती में बांटना चाहिए। हमे यह ध्यान रखना होगा कि कहीं यह आंदोलन गलत होथों में न पड़ जाए। आत्माराम ने एक घूंट पानी पी और बात को जारी रखा। चिंता ने आत्माराम के चेहरे पर ऐसी चमक देखी मानों अंधेरे को चीर कर चंद्रमा का प्रकाश चारो ओर फैल गया हो।
चिंता को दूर कहीं एक चिनगारी दिखई दे रही थी। उसे अब अपमान भरी जिंदगी से नफरत होने लगी। उसके अंदर मुक्ति के लिए छटपटाहट पैदा हो गई। वह बहुत ही जल्द सबकुछ बदल देना चाहता था। लेकिन उससे पहले इस झुग्गी को बचाना उसके लिए जीवन मरण का सवाल था। वह मुंह अंधेरे उठकर दातून-कुल्ला करके आत्ममराम के दिए हुए पर्चे को लेकर अपने जैसों से बातें करता। वह एक ऐसा आंदोलन खड़ा करना चाहता था जिससे पूरा प्रशासन हिल उठे और खून पसीने से बनी उसकी झुग्गियां बच जाएं। वह आत्माराम का क्रितज्ञ था।
सभा होने के दूसरे दिन वह अपनी खबर छपने की उम्मीद से अखबार के पन्ने पलटता रहता, लेकिन कहीं भी कोई खबर दिखाई नहीं देती। उसे यह देखकर बड़ा ताज्जुब होता कि बिहारी लाल जब कोई सभा करता है तो उसकी खबर ही नहीं बल्कि फोटो भी छपता था। लेकिन आत्माराम का तो कहीं नामोनिशान नहीं। उसे यह सब देखकर बड़ा दुख होता, क्योंकि आत्माराम उसके आदर्श बन चुके थे। उसके सामने आत्माराम का वह चेहरा घूम जाता जब वह झुग्गियों के बाहर लकड़ी के टूटे-फूटे कुर्सी पर खड़ा हो कर दिल को भेद देने वाले भाषण देते। उनके एक-एक शब्दों से अपनापन की गंध आती।
वह किसी भी काम के लिए कारखाना से छट्टी ले लेता और उन नौजवानों के साथ पर्चा बांटने में मदद करता। वह यह सोचता था कि क्रांति के लिए उसकी बेकार जिंदगी का सही जगह इस्तेमाल हो रहा है। वह बिहारी लाल के भी सभाओं में जाना बंद नहीं किया था, क्योंकि वे तो उसके पास के ही थे। उसे बिहारी लाल से भी काफी उम्मीद थी। 
सूरज की किरणें अभी पूरी तरह से विखर भी नहीं पाई थीं कि झुग्गी के चारो ओर बच्चे, बूढ़े और नौजवान नारा लगाते हुए घूम रहे थे। कुछ तो माथे पर लाल रंग की पट्टियां बांधे ऐसे चल रहे जैसे की युद्ध के मैदान में हों। वह किसी दल के नहीं थे बल्कि उन्होंने स्वयं ही अपनी यह हुलिया बना रखी थी। वह मरने और मारने पर उतारू थे। रास्ते में जो भी साइकिल या रिक्शा चलाते मिल जाता उनके पहियों का छुच्छी खोलते और फेंक देते। सड़कों पर लकड़ी का कुंदा रख कर जाम कर दिया गया था। यदि कुछ था तो सायरन बजाती हुई पुलिस की गाड़ी। लगभग पूरा शहर पुलिस छावनी में तब्दील था। महिलाएं भी कम नहीं थीं। वे हाथों में झाड़ू-डंडा लिए घर से अन्य औरतों को हाथ पकड़कर खींचतीं और जुलूस में निकल पड़तीं। आत्माराम अपने गिने-चुने साथियों के साथ झुग्गियों में लोगों के हाथों में पर्चा थमाता, तेज तर्रार भाषण देता और जुलूस में चलने के लिए उत्साहित करता। वह कागज पर लाल-लाल रंग से लिखे नारों ''झ़ग्गी-झोपड़ी जिंदाबाद, हम अपना हक लेकर रहेंगेÓÓ का ऐप्रिन अपने शरीर पर पहन रखा था।
सूरज की गर्म-गर्म किरणें शहर को अपने आगोश में ले चुकी थीं। बिहिारी लाल चमचमाता हुआ कुर्ता और जैकेट पहने खुले जीप में बैठा हुआ था। जीप के आगे पीछे दो माइक बंधे हुए थे। वह उत्तेजित भाषण दे रहा था। उसकी आवाज में तलवार की धार की तेजी थी। जैसे ही वह रुकता तालियों की गडग़ड़ाहट और हजारों कंठों से नारे गूंज उठते थे। वह खुशी के मारे फूले नहीं समा रहा था। वह अपने आपको दुनिया का सबसे महान नेता मान बैठा था। शायद इसीलिए उसके चाल में अकड़ भी पैदा हो गयी थी। उसके आंखों के सामने प्रधानमंत्री की कुर्सी के सिवा शायद कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। इन भूखे-नंगों हजारों कंठों से निकले कर्णभेदी नारों से अपार्टमेंटों और कालोनियों की खिड़कियां खुल गई थीं। इन खिड़कियों से एक नहीं कई कई आंाखें हजारों के जनसमूह को देखकर आतंकित हो रही थीं। हर किसी के मुंह से एक ही बात निकलती- आगे क्या होगा? क्या होगा?
चिंता इतना उत्साहित था कि वह बाकी का सबकुछ भूल ही गया। वह भी बिहारी लाल के साथ खड़ा होकर दो-चार बातें कहना चाह रहा था। लेकिन बिहारी लाल के ठाट को देखकर उसका हिम्मत छूट गया। वह आगे बढ़ ही रहा था कि उनके आदमियों ने उसे परे धकेल दिया। अब उसे आत्माराम का वह चेहरा जिसमें वह अपने आपको देख रहा था, उसके आंखों के सामने नाचने लगा। वह उन्हें मंच पर देखना चाहता था। उसकी आंखें हजारों लोगों के बीच आत्माराम को खोज रही थीं। उसे दूर कहीं नारों की आवाज सुनाई दी जहां पर आत्माराम हाथ में तख्ती लिए खड़ा बिहारी लाल को देख रहा था। वह उसके पास पहुंचने ही वाला था कि तभी जुलूस आगे बढ़ गया।
गरमी से पूरा शरीर जल रहा था। लोग बाग माथे से पसीना पोछ रहे थे। कोई अंगोछे को निकाल कर हवा करता तो कोई चेहरे को ढकने का अशफल प्रयास करता। नोएडा प्राधिकरण को चारो ओर से झुग्गीवासी चिल्लाचिल्ला कर नारे लगा रहे थे। खुली जीप एक पेड़ के छाये में रुक गई। जुलूस धीरे-धीरे सभास्थल में तब्दील हो गया। मंच पर बिहारी लाल ने अपने बड़े नेता रघुबीर सिंह को हाथ पडकर खड़ा किया और उनके जयजयकार के नारे लगवाए।
प्राधिकरण कार्यालय जयकारे के नारे से गूंज उठा। रघुबीर सिंह मोटे और थुलथुल व्यक्ति थे। उनका तोंद इतना भरी था कि वह शरीर से निकल भागने को बेताब था। इसलिए उनको मंच पर खड़ा करने में बिहारी को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। उसने अपनी मोटी आवाज में कहा- हमारी झुग्गियों पर जो कोई भी आंख उठाकर देखा तो मै उसकी आंखें निकाल लुंगा। झुग्गियों को भले ही हटा दिया जाए लेकिन हमे अलग से प्लाट मिलना चाहिए। हमारे झुग्गीवासी उसी में अपना गुजारा कर लेंगे।
इस बात से चिंता को बड़ा धक्का लगा। क्योंकि उसे पहले से मालूम था कि प्लाट लेने के लिए राशन कार्ड और तमाम कागजातों की जरूरत पड़ती है, जिसे शायद ही कोई झुग्गीवासी उपलब्ध करा पाए। उसने याद करने की कोशिश की जिससे उसके माथे पर बल पड़ गया। ''आच्छा तो यह बात है। उस कुछ दिन पहले ही बिहारी लाल ने पहले झुग्गियों को बचाने के लिए लाखों रुपये का चंदा वसूला था। फिर राशन कार्ड और अन्य कागजात बनवाने के लिए एक-एक हजार रुपये की और मांग की थी। जिसका कोई नतीजा नहीं निकला। अब फिर वही सबकुछ करने के फिराक में हैं।ÓÓ उसने बिहारी लाल का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा और फिर रघुबीर सिंह को। उसको मतली आने लगी और बगल में थूक दिया।  वह जोर-जोर से चिल्लाना चाह रहा था कि भीड़ में गुमसुम खड़े आत्माराम दिख गये।
वह उनके पास पहुंचा और खींचते हुए मंच के पास ले गया। वह आत्माराम को मंच पर देखना चाहता था। मंच की ओर आते देख बिहारी लाल के इसारे पर चार-पांच मुस्टंडों ने दोनों को ऐसा धक्का दिया कि वे गिरते-गिरते बचे। चिंता हक्का-बक्का बिहारी को देखता रहा। उसे सबकुछ समझने में देन नहीं लगी।
धीरे-धीरे नारों की आवाज खत्म होती गई। वहां पर अगर कुछ बची थी तो गर्मी से बेहाल बच्चों के राने की आवाज। उसे जोर की प्यास लगी थी। वह पानी पीकर अपने आपको ढंडा करना चाह रहा था। पानी के नल तो थे नहीं जिससे उसकी प्यास बुझती। इसके बाद वहां क्या हुआ? किसी को कुछ पता नहीं। सभास्थल पर जीप खाली पड़ी थी। नेतागंण कार्यालय के अंदर अधिकारियों से गुप्तगू कर रहे थे।
सभास्थल खाली हो चुका था। सूरज अपनी लालिमा के साथ पश्चिम में विलीन हो रहा था। सड़कों पर भोपू बजाते वाहन भगे जा रहे थे। अंधेरे ने प्राकाश पर विजय पा लिया और पूरे शहर को अपने आगोश में समेट लिया। चिंता झुग्गी में पहुंचते ही तखत पर चिथड़े को उठाए बिना ही औंधे मुंह लेट गया। उसके दिमाग में अजीब अजीब विचार आने लगे। वह सोचता रहा कि आखिर सत्य क्या है? सत्य क्या है? क्या यह समाज बिहारीलाल और रघुबीर सिंह जैसे लोगों से भरा पड़ा है या कोई और? वह काफी देर तक इसी उधेड़बुन में लगा रहा।
वह अब किसी से बात नहीं करता। सुबह कारखाने जाता और देर रात को अपनी कोठरी में बैठ कर गांजा का कश खींचता। ''नहीं! इस दुनिया में अच्छें लोग भी होंगे।ÓÓ वह पागलों की तरह बड़बडा रहा था उसके सामने आत्माराम का चेहरा आइने की तरह साफ दिख रहा था। वह बहुत ही जल्द आत्माराम से मिलना चाह रहा था। करवट बदलते-बदलते उसे नींद आ गई। वह जब जागा तो अंधेरा कबका छंट चुका था। और सूरज की किरणें चारो ओर फैल चुकी थीं।

Monday, September 20, 2010

एक होमगार्ड की कहानी उसी की जुबानी

देश में बेरोजगारी और महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि लोगों का जीना दुश्वार हो गया है।  पढ़े-लिखे नौजवान नौकरी के लिये मारे-मारे फिर रहे हैं और हमारी सरकार है कि आतंकवाद का माला जपने में मशगूल है। जब भ्रष्टïाचार और महंगाई के विरोध में जनता के अंदर आक्रोश के बीज अंकुरित होना शुरू होते हैं तो यह सरकारें उनके आक्रोश पर पानी छिड़कने के लिए आतंकवाद और मंदिर, मस्जिद का सवाल पैदा कर देती हैं, जिससे लोगों का ध्यान बंट जाए और हमारे नेता अपनी तिजोरियां भरें। ज्यादातर गरीबों-मजदूरों के पढ़े-लिखे बेटे दस-बीस हजार रुपये घूस दे कर होमगार्ड्स की नौकरी कर लेते हैं क्योंकि अन्य नौकरी के लिए उन्हें दो से तीन लाख रुपये तक घूस देने पड़ते हैं। जिसके बारे में वे सपने में भी नहीं सोच सकते। लेकिन वहां पर भी उन्हें मात्र दिहाड़ी मजदूर की तरह रखा जाता है। जो संबंधित अधिकारी का आवभगत करे, उसे साल भर में लगभग छह माह की ड्यूटी मिल जाती है, लेकिन जो हाड़तोड़ मेहनत करे उसे साल में दो माह ड्यूटी मिल जाए वही बहुत है। उन्हें इस तरह से तबाह कर दिया जाता है कि वे कहीं के नहीं रहते। उन्हें चैन से जीने तक भी नहीं दिया जाता है।  
वैसे भी सरकारी नियमानुसार प्रत्येक होमगाडर््स को ड्यूटी सेक्टर के अनुसार लगभग छह महीने दिया जाता है। बाकी का वे छह महीने फांके मारें। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी बी.ओ. दो सौ से लेकर पांच सौ रुपये तक घूस लेकर उनकी ड्यूटी लगाते हैं। जो पैसा न दे उसे घर पर बैठना पड़ता है। कभी-कभी तो संबंधित अधिकारी उनके साथ इस तरह पेश आते हैं कि उनकी जिंदगी नरक बन जाती है।  इन अधिकारियों द्वारा होमगार्डों का जबरदस्त शोषण किया जाता है। उन्हें अपने खून-पसीने की कमाई का लगभग आधा हिस्सा बी.ओ. को ही दे देना पड़ता है। ड्यूटी तो ली जाती है एक सिपाही से ज्यादा, लेकिन मजदूरी एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर भी नहीं। जो मिलता भी है, उसमें से अधिकारी का हिस्सा भी देना पड़ता है।
उत्तर प्रदेश स्थित सिद्धार्थनगर जिले के लोटन ब्लाक के गांव धंधरा के रहने वाले शिवकुमार और पास के गांव के हरिनारायण सिंह बताते हैं कि ड्यूटी लगाने के बाद प्रत्येक होमगार्ड्स से गोपनीय तरीके से अधिकारी बी.ओ. रिश्वत का पैसा वसूलते हैं। जो नहीं देता उसे ड्यूटी, परेड और विभागीय कमी बताकर परेशान किया जाता है। संबंधित अधिकारियों से शिकायत करने पर बी.ओ. से घूस लेकर उसे बचा लिया जाता है और शिकायत करने वाले होमगार्ड की छह-छह माह तक ड्यूटी ही नहीं लगाई जाती है। दोबारा इंट्री करने के लिए मेहनत की कमाई का एक हिस्सा प्रति माह अधिकारी को देना पड़ता है। 
इसी तरह सिद्धार्थनगर जिले में उस्का ब्लाक कम्पनी कमान होमगार्ड्स के बी.ओ. सरविंद सरोज द्वारा होमगार्डों से खुलेआम लिए जा रहे घूस और उसके अत्याचार से पीडि़त होमगार्ड की व्यथा को उसी की जुबानी में पेश कर रहे हैं।
मैं उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के धंधरा गांव का रहने वाला हूं। उस्का बाजार, विकास क्षेत्र में होमगार्ड कंपनी में अवैतनिक रूप में नौकरी कर रहा हूं। हमारे उस्का बाजार के वर्तमान बी.ओ. सरविंद सरोज ने ड्यूटी लगाने के नाम पर हमसे 400 रुपये रिश्वत लेता है। मैंने जब इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से की तो उसने मुझे धमकी दी और कहीं भी ड्यूटी पर नहीं लगाया। बी.ओ. ने ऊपर से यह आरोप लगाया कि ट्रेनिंग पर नहीं गये जबकि उसके संबंध में कोई लिखित सूचना हमें नहीं दी गई। मुझसे 500 रुपये बैंक समरी एकाउंट गलत होने पर उसे ठीक करवाने के लिए बी.ओ. सरविन्द सरोज ने खुद  लिया। ड्यूटी लगाने के लिए मेरे अन्य साथियों से जब रिश्वत की मांग की तो उन्होंने मना कर दिया। इस पर बी.ओ. ने हम लोगों की ड्यूटी नहीं लगाई। इसकी शिकायत करने पर पिछले दस माहीने से हम लोगों को ड्यूटी पर नहीं लगाया गया, जिससे हमारा परिवार भूखों मरने की कगार पर है। जो लोग बिना शिकायत किये बी.ओ. साहब को पैसा दे रहे हैं, उनको ड्यूटी पर बराबर लगाया जाता है। इसी प्रकार दूसरे होमगार्ड हरिनारायन सिंह से लड़की की शादी में छुट्टïी देने के नाम पर बी.ओ. साहब ने 2100 रुपये ले लिया। इसके साथ ही उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि यदि किसी से शिकायत करोगेे तो नौकरी से निकाल देंगे। हम लोग मामले की शिकायत जिले के डीएम और मंडल स्तर के प्रभारी अधिकारी से किया। मंडल स्तर के अधिकारी द्वारा 13 अगस्त 2010 को उस्का बाजार डाक बंगले पर हम लोगों से साक्ष्य सबूत की मांग की गयी। जिसे हम लोगों ने बी.ओ. द्वारा किये गये वार्तालाप और रिश्वत की मांग का रिकार्ड किया हुआ कैसेट भी दे दिया। होमगार्ड रणजीत, उमेश, राधेश्याम, जमुना आदि का बयान भी लिया गया। जिन लोगों से बी.ओ. सरविन्द सरोज ने ड्यूटी लगवाने के नाम पर रिश्वत ली थी, उस मामले में आज तक मंडल स्तर के अधिकारियों ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। बी.ओ. सरोज अभी भी पैसा लेकर होगाडर््स को ड्यूटी देते हैं। शिकायत करने पर हम लोगों को ड्यूटी देना भी बंद कर दिए हैं। यह भ्रष्टïाचार और अनैतिकता कि हद है। हम लोगों ने उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषी अधिकारी के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई किया जाए। क्योंकि इस समय ड्यूटी न लगने से मैं और मेरे साथी भूखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं। यहां तक कि हम अपने बच्चों के पढ़ाई का फीस भी नहीं दे पा रहे हैं।
इस मामले की शिकायत हम लोगों ने लिखित रूप से मुख्यमंत्री मायावती, मुख्य सचिव लखनऊ, तथा मंडल होमगाडर््स प्राधिकारी गोरखपुर को भेज चुके हैं। इसके बावजूद मेरी शिकायत नहीं सुनी जा रही है। अब हम यह मान चुके हैं कि देश का यह पूरा तंत्र ही भ्रष्टï हो चुका है।

Sunday, September 5, 2010

प्रिय उकाब के पाठक बंधुओं,

किन्हीं कारणों से आज से लगभग दस दिनों तक इस बलाग पर कोई पोस्ट प्रकाशित करने में असमर्थ हूं। दस दिन बाद से पुन: खबरें प्रकाशित होंगी, जो निरंतर जारी रहेंगी।

Monday, August 30, 2010

इंसान बने हैवान

माया
हमारे समाज में जातिगत अपमान और उत्पीडऩ जैसे कई कुकर्म किए जाते हैं। देश आजाद होने के बाद दलितों को आज भी सामंती सोच रखने वालों के अधीन रहना पड़ता है। यदि कोई यह समझता है कि अछूत एक जमाने पहले की बात है तो यह गलत है। आज भी हरियाणा के हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में ऐसा ही होता है। जहां पर वाल्मीकि समुदाय के घर के साथ-साथ उसमें रहने वाले लोगों को भी जला दिया जाता है। जिन लोगों ने अपना गुजारा करने के लिए उन घरों को अपना खून पसीना एक करके बनाते हैं, उसे उन्हीं के सामने जला कर राख कर दिया जाता है। उनकी जिंदगी भर की मेहनत को चंद समय में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है।
यह लोग परम्परावादी पेशे को छोड़कर अपनी मेहनत से गुजारा कर रहे थे और अपने बच्चों को स्कूल भेजने का सपना अपनी आंखों में संजोये हुए थे। मेहनत मजदूरी करने के लिए अपने घरों में पशुओं, पाक्षियों को पालने लगे थे। इनके रहन-सहन को देखकर जाट समुदाय के लोगा सहन कर पाने में असमर्थ थे। उन्हें लग रहा था कि उनके कदम डगमगा रहे हैं। इसलिए उनके लिए इसे सहन करना असंभव था। जब उन्होंने आने-जाने वाले रास्ते में एक वाल्मीकि कर्ण सिंह के बेटे दिलबाग को एक कुत्ते को बड़े प्यार से नहलाते हुए देखा तो रास्ते से जा रहे जाट समुदाय के कुछ लोगों ने कहा कि हर रोज सुबह शाम इसी गली से गुजरना पड़ता है। जोकि नशे में धुत्त थे और ऐसा कहते हुए उन्होंने कुत्ते को लात मारी। इस बात से दिलबाग और उसके पिता ने उनका विरोध किया। इस बहस को सुनकर वहां पर और लोग भी आ गए। जाटों ने कहा कि तुम्हें भी इसी तरह मार देंगे जिस तरह कुत्ते को मैंने मारा है। इस बात से उन्हें गुस्सा आ गया और नौबत हाथापाई तक पहुंच गई। तभी कुछ लोगों ने झगड़े को सुलझाया। उसके बाद वाल्मीकि समुदाय के लोगों ने आपस में बातचीत की। बातचीत के दौरान पता चला कि उन जाटों के समूह में गांव का जमाई भी था, जिससे गलती से झगड़ा हो गया। गांव में आज भी यह परंपरा मानी जाती है कि किसी भी जात-बिरादरी का जमाई पूरे गांव का जमाई होता है। वीरभान ने गांव को शांति बनाए रखने के लिए कहा कि हमें उन लोगों से माफी मांग लेनी चाहिए। विचार-विमर्श करने के तुरंत बाद कर्ण और बीरभान दोनों ही माफी मांगने के लिए उनके घर चल पड़े। लेकिन जाटों के घर पहुंचने से पहले ही उन दोनों के ऊपर लाठियों से वार किया गया, जिससे दोनों को काफी चोटें आई थीं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने उन्हें छ: टांके लगाए। अस्पताल में उनका इलाज चल ही रहा था कि उन्हें फोन पर सूचना मिली कि जाट समुदाय के लोग अभी भी झगड़ा करने को तैयार हैं। सूचना मिलते ही वीरभान और कर्ण दोनों सीधे पुलिस चौकी पहुंच कर चौकी इचार्ज विनोद काजल को घटना की जानकारी दी। उसने कहा कि क्यूं थारे घर जला दिये जो इस तरह बात कर रहे हो। चौकी इचार्ज ने छूटते ही कहा। उसके बाद उन्होंने पुलिस दस्ते को लेकर गांव में आ धमके। जब गांव में कोई नहीं दिखा तो पुलिस वालों ने वीरभान को खूब धमकाते हुए कहा कि तुमने तो कहा था कि जाट समुदाय वाल्मीकियों पर हमला करने वाले हैं। लेकिन यहां तो कुछ भी नहीं हो रहा है।
21 अप्रैल 2010 को विनोद काजल वाल्मीकि बस्ती में वीरभान और कर्ण से मिलकर कहा कि इस मामले को पंचायत ही सुलझाएगी। वाल्मीकि समुदाय ने पंचायत में जाने को तैयार हो गये, क्योंकि वह सब शांति चाहते थे। वाल्मीकि बस्ती के सारे पुरुष पंचायत में पहुंच गये। घर में केवल महिलाएं और बच्चे ही रह गये थे। जाट समुदाय पहले से ही तैयारी में थे कि कब यह लोग बाहर जाएं और वे घटना को अंजाम दें। पंचायत में अभी लोग पहुंचे ही थे कि उधर वाल्मीकि बस्ती में जाट समुदाय ने आग लगा दी। कुछ घरों का सामान भी लूट लिया।

चंद्रभान की पत्नी फूलकली ने बताया कि हमारे घर में अगले महीने लड़की की शादी थी। घर में दहेज का सामान भी रखा हुआ था। सारा सामान लूट लिया। मेरी बहू के सामने अपने कपड़े उतार कर खड़े हो गये। मैंने उसे चौबारे में ऊपर भेज दिया और उन्होंने फिर भी उसका पीछा किया। वह एक कमरे में घुस कर अंदर से दरवाजा बंद कर ली, लेकिन जाटों के लड़कों ने उस कमरे में जलती हुई लकड़ी खिड़की से अंदर फेंक दी। कमरे में रखा सामान धू-धू कर जलने लगा। बहू किसी तरह जान बचाकर बाहर भागी। गांव के कई लोगों ने पुलिस के पास गये और उनसे काफी मिन्नतें कीं, लेकिन पुलिस वालों ने हमारी कोई भी मदद नहीं की। उस जलती हुई आग को देखकर छोटे-छोटे बच्चे कांप रहे थे। फिर भी पुलिस वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। खून-पसीने एक करके बनाए गये घर को हमारी आंखों के सामने जाटों ने जला कर राख कर दिया। उन लोगों ने हैवानियत का सीमा पार करते हुए एक लड़की को जिंदा जला दिया और हम लोग देखते रहे।

सुमन जिसकी उम्र लगभग 18-19 साल की थी, जो बारहवीं पास थी। वह घर के अंदर पहिए वाली कुर्सी में बैठ कर किताब पढ़ रही थी। उसके घर के चारों तरफ लोगों ने आग लगा दी और बाहर से गेट की कुंडी चढ़ा दी, जिससे वह बाहर न निकल सके। सुमन को घर में आग लगाकर सबों ने मार डाला। सुमन के पिता तारा सिंह की उम्र 55 साल थी। उन्होंने अपनी बेटी को बचाने का प्रयास किया जिसमें वह भी जल गया। बेटी को नहीं बचा सका। वह उसकी चीख को सुनता रहा और खुद को आग में जलाता रहा। जिन लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया उनको तो लोगों की चीखें सुनकर मजा आ रहा था, लेकिन जिनकी आंखों के सामने अपनी बेटी, बहू और बच्चे जल रहे थे, उन पर क्या बीत रही होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यह घटना मात्र एक मिर्चपुर की ही नहीं है, बल्कि कमोबेस पूरे देश में ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं। प्रसाशन पर इसका कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है। उसे मात्र चंद पैसों का मुआवजा देकर अपना पल्ला झाड़ लेना है। गरीबों की उन्हें क्या परवाह वह तो उनकी नजरों में कीड़-मकोड़े हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हम ऐसे ही इन घटनाओं को देखते रहेंगे? आखिर हम कबतक अपने लोगों से ही लड़ते रहेंगे? जबकि इन सबका असली दुश्मन कोई और है, जिसके बारे में हम सबकुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठे हैं।

Wednesday, August 25, 2010

सावन के महीने में छोड़ देते हैं गांव

अंध विश्वाश के साए में जीते लोग
सिद्धार्थनगर। गौतम बुद्ध की पावन धरती पर रहने वाले लोग आज भी अंधविश्वाश के साये में में जी रहे हैं। पहले इसे नौगढ़ तहसील के नाम से जाना जाता था, जो वर्षों पहले बस्ती जनपद के अंतर्गत आता था। बाद में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह के कार्यकाल में इसे सिद्धार्थ नगर के नाम से जनपद का दर्जा मिला। सिद्धार्थ नगर नाम भी इसे गौतमबुद्ध की राजधानी कपिल बस्तु तथा उससे कुछ ही दूरी पर नेपाल में स्थित गौतमबुद्ध की जन्मस्थली लुम्बनी के नाम पर पड़ा। यह जनपद पहले से ही काफी पिछड़ा हुआ माना जाता है, लेकिन जिला होने के बाद इसका विकास तो हुआ पर उसकी रफ्तार कछुआ चाल के बराबर थी। इस जिले के पिछड़े क्षेत्र के कुछ ऐसे ही गांवों की एक घटना का जिक्र करने जा रहे हैं।
सिद्धर्थनगर जिले के पांच गांव ऐसे हैं जो वर्ष के एक दिन पूरे के पूरे खाली हो जाते हैं। ऐसा नहीं कि जिले को ही छोड़ कर लोग बाहर चले जाते हैं, बल्कि गांव के बाहर पूजा-पाठ करते हैं। पूरे दिन बाहर ही पूजा पाठ करते हैं। शाम को भोजन करने के बाद पुन: घर लौटते हैं। इन लोगों का मानना है कि गांव के बाहर पूजा-पाठ करने से पूरा गांव बीमारी और प्राकृतिक आपदा से बचा रहेगा। यह और बात है कि गांव छोडऩे की इस कवायद से कोई लाभ नहीं होता है, जबकि देखने में आता है कि बीमारी और आपदा कमोबेस इन गांवों में ज्यादा ही आती हैं।
यह गांव इटवा तहसील क्षेत्र के खुखुड़ी, महादेव घुरहू, भावपुर पांडेय, सेहरी और धनधरा हैं। यहां यह परम्परा दशकों पुरानी है। हर साल इन गांवों के युवक, बूढ़े, बच्चे, महिलाएं सावन माह में शुक्ल पक्ष द्वितीया, मघा नक्षत्र को सूर्योदय होने से पहले ही गांव छोड़कर बाहर चले जाते हैं। पूरे गांव के लोग गांवों से कुछ दूरी पर स्थित भगहर पर इक_ा होकर देवी काली की पूजा-पाठ करते हैं। गांववासियों के दिन का भोजन भगहर पर ही होता है। सूर्यास्त के बाद लोगों का हुजूम एक बड़ी तादाद में घरों की तरफ रवाना होता है। इस वर्ष 11 अगस्त को भी गांव खुखुड़ी के ग्रामीणों ने गांव छोड़कर भगहर में पूजा-पाठ किया।

आखिर ऐसा क्यों करते है ग्रामीण?
खुखुड़ी के प्रधान मतई का कहना है कि गांव को हैजा, जमोगा, चेचक जैसी महामारियों से बचाने के लिये एक महात्मा ने ऐसा करने का उपाय बताया था। उसके बाद लोगों ने बाबा के बताये अनुसार भगहर पर इक_ा हो कर पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया। धीरे-धीर यह एक परम्परा बन गयी। जब उनसे पूछा गया कि क्या पूजा पाठ करने से बीमारियां नहीं होती हैं। उनका कहना था कि अभी भी बीमारियां होती हैं। लेकिन क्या करें पुरानी परंपराओं को तो निभाना ही है।

सइयां भये कोतवाल तो काहे का डर...

राशन डीलर की मनमानी
जयप्रकाश मिश्रा, बहराइच
बहराइच। पुर्वांचल का यह कहावत सइयां भए कोतवाल तो काहे का डर... को लोग चरितार्थ करने पर लगे हुए हैं। पूरे प्रशासनिक ढांचे की यही हालत है। इसकी मिसाल पूर्वी उत्तर प्रदेश स्थित बहराइच जिले के जतौरा गांव में देखने को मिली है। वहां पर भाभी के प्रधान होने के कारण उनके देवर ने मनचाहे ढंग से राशन की कालाबाजरी करने में मशगूल है। उसे किसी भी प्रसाशनिक अधिकारी का खौफ नहीं है।
एक तरफ तो प्रदेश सरकार गरीबों के लिए अनेक योजनाएं जैसे मा. कांशीराम योजना को संचालित कर रही है, वहीं सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़े लोग भी गरीबों का जमकर शोषण कर रहे हैं। यह बात किसी एक जगह की नहीं है, बल्कि कमोबेस पूरे प्रदेश में यही हालात हैं। प्रदेश का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं होगा जहां पर तहसील से लेकर ग्राम प्रधान और राशन डीलर तक गरीबों को मिलने वाले आर्थिक सहयोग का बंदरबांट न होता हो। राशन डीलरों का आलम यह है कि वे ग्राम प्रधान को तो हिस्सा देते ही हैं साथ में तहसील, ब्लाक और जिले पर बैठने वाले संबंधित अधिकारियों से भी मिलीभगत करके गरीबों को मिलने वाले चीनी, केरोसिन और बीपीएल कार्डों पर मिलने वाले राशन को संबंधित लोगों को वितरित न करके खुद हड़प जाते हैं। इस संबंध में 'उकाब दि बर्डÓ की टीम ने बहराइच में जब लोगों की समस्याओं के बारे में जानकारी ली तो राशन के कालाबाजारी का मामला सामने आया।
जनपद के कैसरगंज तहसील क्षेत्र में आने वाला गांव जतौरा पिछले कुछ समय से राशन की कालाबाजारी को लेकर चर्चा में बना रहा। इस गांव का कोटा गांव की महिला प्रधान आशा देवी के देवर परमजीत के पास है। गांव प्रधान के अपने रुतबे और प्रशासनिक अफसरों से गहरी पैठ के चलते राशन डीलर अपनी मनमानी कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि गांव के लोगों ने कुछ दिनों पहले राशन की कालाबाजारी करते राशन डीलर को रंगे हाथों पकड़ चुके हैं और ले जा रहे गेहूं के खेप को पुलिस के हवाले भी कर चुके हैं। गांव वालों का कहना है कि इसके बावजूद अभी तक राशन डीलर के ऊपर कोई भी कार्रवाई नहीं हुई। लोगों का कहना है कि इसके बाद से हम लोगों ने विरोध करना ही छोड़ दिया। जब पूरा प्रशासन इसी भ्रष्टाचार में लिप्त है तो शिकायत करने से कोई फायदा नहीं। उन्होंने कई बार इसकी शिकायत लिखित रूप से एसडीएम से भी करते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर वही ढाक के तीन पात। विगत 9 मार्च 2010 को जतौरा के रहने वाले बंसल लाल, जयप्रकाश मिश्रा, सीतेश चन्द तिवारी, जनार्दन प्रसाद, पारस नाथ, मिथलेश वर्मा, नन्द किशोर सिंह, रक्षाराम, विजय प्रताप, उदयराज सिंह, रामकुमार शुक्ला, ज्ञान प्रताप, सिपाही लाल, ओमप्रकाश, रामतेज मिश्रा, अमीरकालाल पाल, बृजेश कुमार, बंसत लाल, कैलास नाथ, माताप्रसाद तिवारी, भानु प्रताप, सुनील कुमार, सुरेश कुमार, पिन्टू मिश्रा, हाफिज अली, अय्यूब मोहम्मद, शब्बीर, प्रभुदयाल मिश्रा, दिनेश वर्मा, अवधेश, मनोज कुमार वर्मा आदि ने राशन डीलर पर मिट्टी का तेल न बांटने सहित कई आरोप लगाये थे। कुछेक को छोड़कर लगभग पूरा गांव इस डीलर से खफा है।
जतौरा गांव निवासी जय प्रकाश मिश्रा का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत जोभी खाद्य सामग्री आती है उसे गरीबों को वितरण करने के बजाय ब्लैक में बेच दिया जाता है। यह गोरखधंधा पिछले काफी समय से चल रहा है। उन्होंने कहा कि कोटेदार के इस गलत कार्यशैली में छोटे-मोटे अधिकारियों का मिलीभगत भी है। उन्होंने शिकायत प्रत्र की एक प्रतिलिपि कैसर तहसील में कार्यरत एसडीएम को भी रिसीब करवाया है।
यही नहीं बल्कि कोटेदार ने गांव के कुछ लोगों का राशन कार्ड भी अपने पास रखता है और हर माह अपने आप ही कार्ड पर एंट्री भी कर देता है। गांव वालों का कहना है कि जब राशन लेने पहुंचते हैं तो उन्हें भगा दिया जाता है। अब गांव के लोग इस कोटेदार से आजिज आ चुके हैं। प्रशासनिक अधिकारियों में डीलर की पकड़ इतनी मजबूत है कि गांव वाले अब खुलकर शिकायत करने से बच रहे हैं।

क्या कहते हैं एसडीएम?
इस संबंध में जब कैसरगंज तहसील के एसडीएम दिलीप कुमार से फोन पर बात की तो उनका कहना है कि 'मुझे आये अभी कुछ ही दिन हुए हैं, इसलिए इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। यदि यह मामला मेरे संज्ञान में आया तो हम इस पर उचित कार्रवाई करेंगे। पूर्व में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, इस संबंध में हम कुछ नहीं कह सकते हैं।Ó इसके बाद वे अपने काम में बिजी हो गये और लाइन काट दिया।

Wednesday, August 18, 2010

एक हजार लोग हो सकते हैं स्वाइन फ्लू के शिकार


मान सिंह चौहान
स्वाइन फ्लू ने शहर में दस्तक दे दी है। सेक्टर 41 निवासी अस्पताल कर्मी युवती तो ठीक हो गई है लेकिन स्वास्थ्य विभाग की परेशानी साफ झलकने लगी है। विभाग ने स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए प्रदेश सरकार से संसाधनों की मांग की है। एक हजार लोगों का उपचार करने लायक दवाएं, वैक्सीन और उपकरण मांगे गये हैं क्योंकि डाक्टरों का मानना है कि खराब मौसम के कारण पिछले साल के मुकाबले इस साल मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
गत वर्ष एक के बाद एक करके 309 मरीज शहर के तमाम अस्पतालों में स्वाइन फ्लू से पीडि़त पाए गए थे। फोर्टिस अस्पताल में भरती एक मरीज की मौत भी हो गई थी। विशेषज्ञ चिकित्सकों का मानना है कि स्वाइन फ्लू का वायरस भारतीय मौसम में अनुकूलित हो चुका है। दूसरी बीमारियों के वायरस के संपर्क में आकर इसमें बदलाव भी आए होंगे। अपोलो अस्पताल के डा. डी शर्मा का कहना है कि इस संबंध में देश भर में शोध चल रहे हैं। इस बार बारिश समय से पहले हुई है और लगातार भी नहीं हो रही है। बारिश के बाद मौसम साफ हो जाता है, जिससे तापमान और उमस बढ़ती है। ऐसा मौसम वायरल और बैक्टीरियल विकास के लिए मुफीद होता है। स्वाभाविक है कि स्वाइन फ्लू लोगों को परेशान करेगा। स्वास्थ्य विभाग में एंटी स्वाइन फ्लू सेल के प्रभारी डा. अनिल कुमार का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल रोगियों की संख्या बढ़ सकती है। जिसे ध्यान में रखकर एक हजार रोगियों का उपचार करने लायक इंतजाम किए जा रहे हैं। सरकार से 10,000 ओसिल टैमीविर कैप्सूल, 1,000 टैमी सिरप फ्लू, 1,000 वीटीएन, 1,000 थ्रोट स्वैप, 5,000 टू लेयर फेस मास्क, 1,000 एन-95 मास्क, 1,000 हैंड सेमी टाइवर मांगे गए हैं। पत्र शासन को भेजा गया है। दवाएं और उपकरण जल्दी मिलने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि निजी अस्पतालों में स्वाइन फ्लू का उपचार नहीं है। जिला अस्पताल के बाद दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उपचार संभव है। पिछले साल शहर के कालेजों, विश्वविद्यालयों और कंपनियों में बड़ी संख्या में स्वाइन फ्लू के रोगियों की पहचान की गई थी। जिला अस्पताल में ही 309 बीमारों का उपचार किया गया था।
जिला अस्पताल में डेंगू से पीडि़त तीन और मरीज भर्ती हुए हैं। तीनों को डेंगू की पुष्टिï होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने उपचार शुरू कर दिया है। पीडि़त युवकों में एक की उम्र 25 वर्ष और दूसरे की 15 वर्ष है। तीसरा रोगी 42 वर्ष का है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मीना मिश्रा ने बताया कि फिलहाल तीनों खतरे से बाहर हैं।
वहीं नोएडा क्षेत्र में एक 17 वर्षीय युवती में स्वाइन फ्लू की पुष्टि की गई है। पीडि़त को जिला अस्पताल से टेमी फ्लू दवा दी गई है। सेक्टर-41 में रहने वाली युवती का इलाज मैक्स अस्पताल में चल रहा था। स्वाइन फ्लू की पुष्टि के बाद वह जिला अस्पताल जांच कराने आई। रिपोर्ट के आधार पर इसे टेमी फ्लू दे दी गई है। साथ ही सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। जिला अस्पताल की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक राजरानी कंसल ने बताया कि निजी अस्पताल की पुष्टि पर युवती को दवाएं दी गई हैं। जिला अस्पताल में इससे पहले भी बीमारी के संदिग्ध मरीज आ चुके हैं। वर्ष 2009 के नवंबर व दिसंबर माह में जिले में स्वाइन फ्लू के लगभग 300 मामले सामने आए थे। बीमारी से चार लोगों की मौत भी हुई थी। जिला अस्पताल में स्वाइन फ्लू के टीके व जांच की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि अभी चिकित्सीय कर्मचारियों के लिए ये टीके उपलब्ध कराए गए हैं।

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प्रदेश में शिक्षा का गिरता स्तर

जय प्रताप सिंह
ज्य में प्राथमिक शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। इस समय प्रदेश में 13113 स्कूल ऐसे हैं, जहां पर मात्र एक शिक्षक के दम पर स्कूल चल रहे हैं। जिस दिन वह शिक्षक अवकाश पर हो या किसी अन्य सरकारी काम से बाहर गया हो तो उस समय बच्चों की छुट्टी रहती है। जहां पर एक-दो अध्यापक हैं, उन्हें भी जनगणना या अन्य सरकारी कामों का बोझ इस कदर लाद दिया जाता है कि वे मोटी-मोटी फाइलों को पूरा करने में ही महीनों गुजार देते हैं। इन कामों से वे इतना थक जाते हैं कि बच्चों को पढ़ाना उनके लिए मात्र खानापूॢत होती है। हकीकत यह है कि यातायात के साधन और अन्य सुविधाएं न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातर अध्यापक जाना नहीं चाहते।
इसी तरह आर्थिक दृष्टि से संपन्न पश्चिमी जिलों के सरकारी स्कूलों में छात्र और शिक्षक ज्यादा हैं, जबकि पूरब के गरीब जिलों में छात्र ज्यादा और शिक्षक कम हैं। आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश में 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या लगभग पौने छह करोड़ है। प्रदेश में इस समय 3 करोड़, 62 लाख 63 हजार बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, लेकिन लाखों बच्चों का स्कूलों से दूर-दूर का रिश्ता नहीं है। सरकार की नीतियों को मानें तो प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी सीटें आस-पड़ोस के गरीब बच्चों के लिए आरक्षित चाहिए।
इस स्थिति में राज्य में इस समय कम से कम 10 लाख शिक्षकों की जरूरत है। वर्तमान में शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 4 लाख 6 हजार 607 हैं। इनमें से लगभग एक तिहाई यानी एक लाख 53 हजार 623 पद खाली हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए एक लाख 86 हजार शिक्षामित्र भर्ती किए गये हैं। नए कानून में केवल प्रशिक्षित शिक्षक को ही मान्यता दी गई है जबकि उत्तर प्रदेश में कई बरसों से बीटीसी की ट्रेनिंग ही बंद थी। इस समय ट्रेनिंग तो शुरू हुई है लेकिन एक साल में लगभग सात हजार बीटीसी शिक्षक ट्रेंड करने की क्षमता है। वहीं दूसरी ओर गौर करें तो हर साल लगभग 10 हजार टीचर रिटायर हो रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो बड़े पैमाने पर शिक्षकों की ट्रेनिंग और तैनाती की आवश्यकता है। ट्रेनिंग में एक बात पर ध्यान देना जरूरी है कि अध्यापक बच्चों को मारपीट और धमकाए बगैर पढऩे के लिए प्रेरित करें। इसके अलावा स्कूलों का वातावरण सही बनाने के लिए पर्याप्त रोशनी और हवादार कमरे की व्यवस्था, पेयजल, शौचालय, पुस्तकालय, पढ़ाई में उपयोग सामग्री और खेल का मैदान की उचित व्यवस्था हो। इस मामले में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूरे राज्य में प्राइमरी स्कूलों में बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है।
अधिकारियों की माने तो अब राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राइमरी स्कूलों की कमी नहीं रह गई है। एक किलोमीटर की परिधि में प्राइमरी और दो किलोमीटर की परिधि में अपर प्राइमरी स्कूल खुल गए हैं। इन स्कूलों की संख्या बढ़कर एक 1 लाख 95 हजार 940 हो गई है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की बहुत कमी है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 30 फीसदी आबादी मलिन बस्तियों में रहती है, जहां पर स्कूल ही नहीं हैं। जो हैं भी वे जीर्ण-शीर्ण भवनों में चल रहे हैं।
इस समय अकेले राजधानी में 225 प्राइमरी और 54 मिडिल स्कूल हैं। नगर क्षेत्र में 30 वार्ड ऐसे हैं जहां पर मकान न होने के कारण स्कूल नहीं हैं। 21 स्कूल शहर के सामुदायिक केंद्रों में चल रहे है। यह समस्या मुरादाबाद, आगरा, फिरोजाबाद बरेली और पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों में मौजूद है। वर्ष 1998 के बाद से शहरी क्षेत्रों में अध्यापकों की नियुक्ति ही नहीं हुई है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल पूरे राज्य में तीन लाख छोटे बच्चे स्कूल से बाहर थे। एक स्कूल की प्रिंसिपल ने बताया कि जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उनका कहना है कि छात्रवृत्ति के लालच में लड़कियों के दाखिले बढ़े हैं। राज्यों को तीन साल का समय स्कूलों के लिए सक्षम प्रबंधकीय ढांचा खड़ा करने के लिए दिया गया है।
सच्चाई यह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का गुणवत्ता ने होने से संपन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाते हैं। गरीब ही अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं। इसका मतलब है कि इन स्कूलों में ज्यादातर बच्चे दलित और मुस्लिम समुदायों के हैं। हमे यह देखना होगा कि कहीं यह कानून समाज में एक समान शिक्षा के बजाय दोहरी व्यवस्था को मान्यता न प्रदान कर दे।

jaipratapsingh80@gmail.com

Monday, August 16, 2010

बेचारे गरीब सांसद

चौंकिये नहीं! यह एक सच्चाई है। आज हमारे देश के सांसद कितने गरीब हैं इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि दिन रात जनता के दुख दर्द में शामिल होने के बावजूद इनकी सेलरी मात्र 16,000 रुपये ही है। यह अलग बात है कि वह जनता के बीच जाते हैं या नहीं? वे आम जनता के प्रतिनिधि हैं या किसी और के भला एक सांसद का खर्चा सोलह हजार रुपये में कैसे चलेगा। इनके करोड़ों के फ्लैट और दो चार महंगी गाडिय़ां, ड्राइवर का वेतन, नौकर-चाकर आदि का खर्चा, क्या 16 हजार रुपये में पूरा हो सकता है। यह तो रहा सामान्य खर्चा, बाकी फाइवस्टार होटलों का खर्चा आखिर कहां से आयेगा? कमीशन और अन्य बैक फुट से हुई कमाई करोड़ों अरबों में होती है। लेकिन फिर भी वेतन तो वेतन होता है।  हमारे सांसदों का जो दर्द है वह यह है कि एक सेक्रेटरी का वेतन 80 हजार रुपये है और सांसद का मात्र सोलह। आखिर सेक्रेटरी का काम ही क्या होता है। वह दिन रात किताबें ही तो पढ़ कर आया है। और बैठे-बैठे लेखा-जोखा करता है। कुल मिला कर थोड़ा बहुत देश के हित में काम कर जाता है। जबकि हमारे सांसद तो करोड़ों रुपये दारू मुर्गा पर खर्च करके चुनाव जीतते हैं और बिना पूंजी लगाये लाभ वाले बिजनेस में शामिल हो जाते हैं। फिर भी जनता के ही प्रतिनिधि ही माने जाते हैं। आखिर उनका भी तो कोई सपना होता है। इतना ही नहीं बल्कि कितनों की हत्याएं भी करनी पड़ती हैं। आखिर इस पाप के प्रायश्चित के लिए भी तो पैसों की जरूरत होती है। वैसे तो पचास हजार रुपये महीना होने का प्रस्ताव है, लेकिन उतने में भी इन बेचारों का पेट भरने वाला नहीं है। अब इन्हें पांच गुना और चाहिए। 
सेलरी के अलावा सांसदों को संसद सत्र के दौरान या हाऊस की कमेटियों की मीटिंग के दौरान हर रोज के हिसाब से 1000 रुपये का भत्ता भी पाते हैं। सांसद इसे दोगुना करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा संसदीय क्षेत्र का मंथली अलाउंस भी 20 हजार से बढ़ाकर 40 हजार करने की मांग कर रहे हैं। ऑफिस अलाउंस के तौर पर भी सांसदों को 20 हजार रुपये मिल रहे हैं। इसे भी बढ़ाने का प्रस्ताव है। अन्य सुविधाओं के तहत सांसद अपनी पत्नी या किसी दूसरे रिश्तेदार के साथ साल में 34 हवाई यात्रा कर सकते हैं। उन्हें किसी भी ट्रेन में किसी भी समय एसी फस्र्ट क्लास में पत्नी समेत यात्रा करने का पास भी मिलता है। इसके अलावा उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान मुफ्त में आवास सुविधा भी मिलती है। लेकिन इसके अलावे भी तो लोग हैं। जैसे आम लोगों का खून बहाकर चुनाव जिताने में मदद करने वालों, दादा परदादा के रिश्तेदारों और जो स्वर्ग सिधार गये हैं, उनके लिए भी तो सरकार को खर्चा देना चाहिए। क्योंकि ये जा ठहरे जनता के आदमी। वैसे जहां तक मेरा मानना है कि इनका वेतन तो नियमत: बढऩा ही चाहिए, क्योकि महंगाई जो इस कदर बढ़ रही है। रहा सवाल कारखानों में खटने वाले मेहनतकशों को तो उनका तो फर्ज है ही कि वे अपने और अपने बीबी बच्चों के पेट पर पट्टी बांध कर देश को आगे बढ़ाने में मदद करें। उन्हें वेतन मजदूरी बढ़ाने की चिंता करने की जरूरत ही क्या है। उसकी ङ्क्षचता तो सरकार में शामिल लोगों पर छोड़ दें। आखिर भगवान श्री कृष्ण जी ऐसे थोड़ी कह गये थे कि ''काम करो और फल की ङ्क्षचता मत करोÓÓ जो हमें गीता के माध्यम से उपदेश दिया जाता है। इस पर हमें अमल भी करना चाहिए, लेेकिन हम हैं कि बेवजह वेतन बढ़ाओ, वेतन बढ़ाओ की मांग करते रहते हैं और पुलिस की लाठियां भी खाते हैं। छोटी सी बात हमारी समझ में नहीं आती। लेकिन यह सब बातें हमारे सांसदों पर लागू नहीं होतीं। क्योंकि वे बेचारे तो हमारे प्रतिनिधि हैं और हमारा यह फर्ज बनता है कि हम अपना खून पसीना बहाकर उनका ख्याल रखें। इसके लिए अगर हमें भूखे भी रहना पड़े तो गलत नहीं। एक बार हमारे एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश को आगे बढ़ाने के लिए यदि जनता को अपनी पेट पर पट्टी भी बांधनी पड़े तो उसमें जनता को पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन यह बात सिर्फ गरीब जनता पर लागू होती है, जनप्रतिनिधि पर नहीं। वैसे यह सरकार कौन है? आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।  
देश को उन्नत शिखर पर पहुंचाया
वाह मेरे प्यारे गरीब सांसद, मै आपके दुख दर्द को समझता हूं। आपने देश के लिए कितना बड़ा काम किया। आज हमारे देश के लोग घंटों में अमेरिका, रूस, चीन, जापान आदि पूरे विश्व में भ्रमण कर रहे हैं। फाइवस्टार होटलों में मुर्गा, कबाब, दारू और तमाम ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं। यह दीगर बात है कि लोग गांव से 20 किलोमीटर की दूरी पर बसे शहर में जाने के लिए हजार बार सोचते हैं। क्योंकि वहां जाने के लिए 20 रुपये बस का किराया तक देने के लिए उनके पास नहीं होते। अब आप कहेंगे कि किराया नहीं है, साइकिल तो है। लेकिन साइकिल चलाने के लिए भी तो शरीर में ताकत होनी चाहिए। ताकत आयेगी कहां से? तो आप कहेंगे कि हरी सब्जी खाओ, दूध पियो और ताकतवर फल फू्रड खाओ। जनाब जरा सोचिए! इस महंगाई में फल खाना तो दूर देश की 70 प्रतिशत जनता नमक और मिर्च के साथ भी रोटी नहीं खा सकती। मिर्च भी अब 50 से 60 रुपये किलो है। रहा सवाल आटे का तो वह भी पांच किलो का पैकेट का दाम अब 105 रुपये हो गया है। उसके शरीर में ताकत कहां से आयेगी। वह साइकिल कैसे चला सकता है। यह तो स्वाभाविक ही है कि उनकी सेलरी  बढऩी ही चाहिए।  अब एक नजर डालते हैं देश की स्थिति पर। बेचारे सांसद अपनी सेलरी तो बढ़वाना चाहते हैं, लेकिन फैक्ट्री कारखानों में 14 से 18 सौ रुपये में दिन रात खटने वाले मेहनतकशों के बारे में सोचने का इनके पास फुर्सत ही नहीं है। और सोचें भी क्यों? इन्हें जनता से क्या लेना देना है। वे तो इनकी नजर में बस नाली के कीड़े हैं। जिसे जब चाहो कीटनाशक दवाओं की तरह कानूनी डंडे का छिड़काव करके बाहर कर दें। जनता तो हर पांच साल पर याद आती है। और उसके लिये तो यह पहले से ही सोच रखे हैं कि उनको मनाना बाएं हाथ का खेल है। यदि इस पर भी नहीं मानें तो करोड़ों रुपये का मुर्गा दारू खर्च करके अपराधियों से मनवा ही लिया जायेगा। और इसमें एक हद तक कामयाब भी हो रहे हैं। क्योंकि जनता के पास तो दूसरा कोई चारा भी नहीं है, इनमें से किसी एक को तो चुनना ही है। अब आप ही बतायें कि इनकी सेलरी बढऩी चाहिए या नहीं। यदि नहीं तो क्यों?

Wednesday, August 11, 2010

मोबाइल के बदलते रंग

प्रतिमान उनियाल
कभी आपने सोचा है कि एक छोटी सी चीज जो हमेशा साथ लेकर चलते हैं, जो आपके अभिन्न मित्र से भी ज्यादा करीब है। जिसके लिए आप अपने व्यस्ततम समय मे से भी कुछ समय निकाल कर इतना बात करते हो कि आपका बॉस और पत्नी दोनों ही गुस्सा होते हैं। जिसकी मधुर आवाज से आपका सबेरा होता हो, दिन रात आपके पास हो और जिसका जन्म करीब पचीस साल पहले हुआ हो। उस समय इसका वजन करीब एक किलो और कीमत तकरीबन एक लाख रुपये रही हो। चौंकिए मत, हम आपके मोबाइल फोन की बात कर रहे हैं।
वर्ष 1983 में मोटोरोला ने अपने 15 वर्षों की अथक शोध और 100 मिलियन डॉलर के निवेश के पश्चात दुनिया के सामने पहला मोबाइल फोन 'डायना टी ए सी 8000 एक्सÓ पेश किया। इस 13 इंच लंबे ईंट नुमा मोबाइल की कीमत तीन हजार डॉलर थी।
वैसे मोबाइल फोन के विकास की गाथा 1908 से शुरू होती है जब केंटकी के एक सज्जन नाथन बी स्टबलफील्ड के वायरलैस टेलीफोन को केव रेडियो के नाम पेटेंट कराया (यूएस पेटेंट संख्या 887357)। यूरोप में बॢलन तथा हेमबर्ग के बीच चलने वाली यात्री रेल में 1926 में रेडियो टेलीफोनी शुरू हुई। 1946 में तत्कालीन सोवियत संघ के इंजीनियर जी शापीरो और आई जहारचेंको ने अपनी कार में रेडियो मोबाइल का सफल परीक्षण किया। इस मोबाइल की पहुंच करीब 20 किलोमीटर तक थी। 1957 में सेवियत संघ के इंजीनियर लियोनिडकुप्रियानोविच ने मास्को में पोर्टेवल रेडियो फोन बनाया जिसका नाम रखा गया एलकेवन (यूएसएसआर पेटेंट संख्या 115494, 1-11-1957)। इस फोन का वजन 3 किलो था और रेंज करीब 30 किलोमीटर था। इसकी बैटरी 20 से 30 घंटे चलती थी। पहला सफल सार्वजनिक मोबाइल फोन नेटवर्क फिनलैंड का एआरपी नेटवर्क था जोकि 1971 में शुरू हुआ था।
अब यह ईंटनुमा वस्तु 100 ग्राम वजनी एक ऐसा सुरीला यंत्र बन गया है जो संचार का साधन के अलावा आपके मनोरंजन का साधन भी बन गया है। अब आप मोबाइल से फोटो व वीडियो बना कर यादों में संजो सकते हैं। इंटरनेट के माध्यम से देश विदेश ज्ञान बटोर सकते हैं, गाने व फिल्में देख सकते हैं, दफ्तर का काम ईमेल या चुङ्क्षनदा एपलीकेशन के माध्यम से कर सकते हैं। बहुत जल्द आप पैसों का लेनदेन भी मोबाइल से कर सकेंगे। मतलब यह कि मोबाइल एक ऐसी जरूरत की चीज बन गया है कि आपका काम इसके बनिा एक मिनट के लिए भी नहीं चल सकता। यकीन नहीं आ रहा तो ऐसे वयक्ति से पूछ कर देखिये जिसका फोन हाल ही में चोरी हो गया हो। उसका हाल ऐसा होगा जैसे वह दुनिया से कट गया हो।
भारत में मोबाइल फोन सेवा की शुरुआत अगस्त 1995 से हुई थी। उस समय मोबाइल सेट करीब पचास हजार रुपये का मिलता था। कालरेट करीब 32 रुपये प्रति मिनट और इनकङ्क्षमग 16 रुपये प्रति मिनट होती थी। पंद्रह साल बाद 2010 में नया मोबाइल सेट 500 रुपये से भी कम का आता है। इसका काल रेट 10 पैसे प्रति मिनट से भी कम है। टेलीकॉम रेगुलेट्री अथॉरिटी ऑफ इडिया के डेटा के अनुसार मई 2010 में मोबाइल कनेक्शन की संख्या 601.22 मिलियन हो गई है।
भारत में आज सरकारी और निजी क्षेत्र की पंद्रह कंपनियां मोबाइल सेवायें दे रही हैं। तकरीबन सभी के कॉल रेट एक समान हैं। बाजार के 84.63 प्रतिशत में सरकारी कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल का कब्जा है। 3जी फोन सेवा में भी सरकारी कंपनियों ने बाजी मारी है। 3जी फोन के माध्यम से आप तेज स्पीड का इंटरनेट कर सकते हैं और एक दूसरे से वीडियो कॉल के जरिये संपर्क कर सकते हैं। अमेरिका में तो 4जी सेवा प्रारंभ हो चुकी है। लेकिन भारत में अभी भी 3जी की ही जंग चल रही है। इतना तो साफ है कि आने वाले समय में मोबाइल फोन का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते। 4जी सेवा के द्वारा आप टीवी, एयरकंडीशन, माईक्रोवेव इत्यादि ऑफिस में बैठे-बैठे ही नियंत्रित कर सकेंगे ताकि जब आप घर पहुंचें तो आपको तुरंत ठंडा मिले, टीवी में आपका मनपसंद कार्यक्रम चल रहा हो और और आपके लिए लजीज व्यंजन तैयार हो सके।
तो एक बार फिर अपने प्रिय मोबाइल फोन की तरफ देखें और विज्ञापन की प्रसिद्ध पंक्ति को याद करके मुस्कुरायें- ''कर लो दुनिया मुटठी में।ÓÓ

Tuesday, August 10, 2010

संघर्ष

-दिनेश कुमार-
समय किसी का इंतजार नहीं करता। वह अपने समय के अनुसार बदलता रहता है। मैंने बचपन से लेकर अबतक कई ऐसे परिवारों को देखा है जिन्होंने जिंदगी के हर पहलू को जाना और समझा है। आज दुनिया में ऐसे बहुत से परिवार हैं जो गरीबी के कारण होने वाली समस्याओं के बारे में कभी सोचा भी नहीं होगा। अगर इनशान हिम्मत व मेहनत से काम ले तो प्रकृति भी उसकी साथ देती है। मैं ऐसे ही एक परिवार की घटना बताने जा रहा हूं। जो अपने परिवार को संवारने के लिए अपनी पूरी मेहनत लगा दी।
मेरे गांव के पास एक संपन्न परिवार रहता था जिसे किसी चीज की कमी नहीं थी। यह परिवार अपने खेती-बाड़ी का काम किया करता था। घर में नौकर-चाकर भी थे। लेकिन समय की मार ऐसे पड़ी कि देखते ही देखते पूरा परिवार एक मझधार में ऐसा फंसा कि पूछो मत। कहते हैं कि गलत लोगों से दोस्ती सही नहीं होती। कुछ ऐसा ही इस परिवार के साथ हुआ जो घर के मुखिया तो थे ही गांव के भी मुखिया थे। उनके एक मित्र थे। दोनों में बहुत गहरी दोस्ती थी। वह दोस्त एक गरीब परिवार से ताल्लूकात रखता था। वह कम समय में अमीर बनना चाहता था। वह अकसर अपने मुखिया मित्र से इस बारे में बातें किया करता था। मुखिया जी अक्सर उसे समझाते थे कि मेहनत से ही आदमी को अपनी जिंदगी में आगे बढऩा चाहिए न कि कोई गलत कार्य करके। क्योंकि किया गया काम अगर गलत है तो उसका नतीजा भी एक दिन गलत ही होगा। लेकिन उसको मुखिया की एक भी बात समझ में नहीं आती थी। उसे तो बस एक ही धुन थी कि जल्द से जल्द मुखिया से भी ज्यादा पैसा कमा लूं। मुखिया के परिवार वाले भी मुखिया को उस व्यक्ति से दूर रहने के लिए कहा करते थे, लेकिन मुखिया जी तो अपनी दोस्ती के कारण मजबूर थे। उनका मानना था कि अगर मैंने उसे नहीं समझाया तो वह कोई गलत काम न कर बैठे। लेकिन वही हुआ जिसका मुखिया के पिरवार वालों को डर था। एक दिन मुखिया का दोस्त रात के करीब बारह बजे उनके घर आया और बोला कि उसका उसके घर पर झगड़ा हो गया है और वह कुछ दिन उनके घर पर ही रहना चाहता है। मुखिया जी का घर काफी बड़ा। उन्होंने अपने मित्र को बाहर का एक कमरा दे दिया।
तीन चार दिन बीत जाने के बाद एक दिन उनके घर पर पुलिस आई और उस व्यक्ति को पकड़ ली। जब मुखिया को इस बात का पता चला तो वह भी अपने मित्र के पास आ गये। मुखिया ने देखा कि दस-बारह पुलिस कर्मी उसके मित्र को पकड़े खड़े थे। उसने पुलिस वालों से पूछा कि क्या बात है? इसको क्यों पकड़े हो? तुम्हारा दोस्त खूनी है। एक पुलिस वाले ने जवाब दिया। इसने एक नहीं बल्कि चार-चार खून किया है। यह सब सुनकर मुखिया सन्न रह गया। वह सिर पर हाथ रखे जमीन पर ही धम्म से बैठ गया। फिर पुलिस वालों ने मुखिया के दोस्त से पूछा कि बता तेरे साथ और कौन-कौन हैं? उसने मुखिया का नाम भी बता दिया। बस फिर क्या था, पुलिस ने मुखिया को भी गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने जब उस कमरे की तलाशी ली तो वहां पर चोरी का सामान और हत्या में शामिल हथियार भी मिला। पुलिस मुखिया और उसके दोस्त को पकड़ कर थाने ले आई। इसके बाद से मुखिया के परिवार की तबाही शुरू हो गयी।
एक साल तक मुखिया के बीबी बच्चों ने अपने पास जितना भी पैसा था सब अदालतों और वकीलों के चक्कर काटते हुए खर्च कर दिया। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। सालों तक मुकद्दमा चलने के बाद मुखिया और उसके दोस्त को दस-दस साल की सजा हो गई। सजा होने के बाद मुखिया के चचेरे भाई उसके सारे खेतों पर अपना कब्जा जमा लिया। जब यह बात मुखिया को पता चली तो उसे इतना दुख हुआ कि उसने जेल में ही दम तोड़ दी। मुखिया की मौत के बाद उसकी पत्नी छह बच्चों के साथ गांव में ही एक छोटे से मकान में रहने लगी। पहले जो उनका बड़ा मकान था वह मुखिया का केस लड़ते हुए बिक चुका था। अब मुखिया की पत्नी के सामने समस्या यह थी कि बच्चों को कैसे पाले-पोशे। काम वाम तो वह कुछ जानती नहीं थी और रहा जमीन का सवाल तो उसे मुखिया का चचेरा भाई पहले ही हड़प चुका था।
एक दिन मुखिया की पत्नी से बच्चे ने पूछा कि मां हमे अब कभी पेट भर खाना नहीं मिलेगा। तो मुखिया की पत्नी रो पड़ी और वह अगले ही दिन मजदूरी करने लगी। अब उसे जो पैसा मिलता था वह उससे अपने बच्चों के लिए रोटी का इंतजाम करती और खुद भूखा रहकर बच्चों का पेट पालती। बच्चे जब किसी जरूरत के लिए रोते तो वह जवाब देती कि बेटा समय सदा एक सा नहीं होता। जैसे हमारा बुरा दिन आया है वैसे ही अच्छा दिन भी आएगा।
उसने अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए रात दिन मेहनत की और अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला करवाया। समय जैसे-जैसे बीतता गया बच्चे बड़े होते गए। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों ने भी छोटा मोटा काम शुरू कर दिया जिससे मां को सहारा मिल गया। गांव के कुछ अच्छे लोगों ने मुखिया की दो बेटियों की शादी करवा दी। अब मुखिया के दोनों लड़के और दोनों लडि़कियां पढ़ाई पूरी करने के बाद घर का सारा बोझ अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने अपने मां की भी जमकर सेवा की।
आज समय बदल चुका है। तीन बच्चों के पास सरकारी नौकरी है और अपना एक बड़ा सा घर है। अब उनकी मां उनसे कहती है कि बेटा मै कहती थी न कि समय सदा एक सा नहीं रहता। कभी गम कभी खुशी जिंदगी के दो पहलू हैं। जो ङ्क्षदगी से लड़ा वही अपनी जिंदगी में आगे बढ़ा। जो दुखों से डर कर रह गया वह कभी भी अगे नहीं बढ़ सकता है।

Monday, August 9, 2010

बाबूजी का जुर्माना

जय प्रताप सिंह
जय कंप्यूटर पर बैठकर खबरों की दुनिया में खोया हुआ था। उसकी उंगलियां तेजी के साथ कीबोर्ड पर दौड़ रही थीं। उसके अगल बगल तीन आदमी उसे जोर-जोर से उसे हिला रहे थे। उसमें से एक गोरा-चि_ा नाटे कद का आदमी हाथ में पीली पर्ची का बंडल और कांख में दबाए एक अखबार को लिए खड़ा था। वह लगातार बोलता जा रहा था। अचानक जय गुस्से में आकर कीबोर्ड पर जोर से हाथ पटका और खड़ा हो गया। तुमहारा दिमाग खराब हो गया है? चपरासी हो तो अपनी औकात में रहो। तुम्हें जर्माना ही तो चाहिए...। अभी ले लेना। मैं कोई अपराधी थेड़े हूं कि मुझे पकडऩे के लिए चार लोग खड़े हो। क्ंप्यूटर बंद करो और बाबूजी के पास चलो। मैनेजर ने भी अपनी आवाज को गति देते हुए बोला। तुम पहले 100 रुपये की पर्ची काटो फिर बात करना। बगल में खड़े तीसरे आदमी ने उसके हाथ में पेन पकड़ाते हुए कहा। यह कोई गलती नहीं है। शिर्फ एक शब्द ही तो गलत हुआ है और उसका 200 रुपया जुर्माना। मैं नहीं दुंगा। जय ने जवाब दिया। चलो बाबूजी के पास। चपरासी बाबूजी के आफिस की ओर जाते हुए कहा। चपरासी आगे-आगे और उसके पीछे-पीछे दोनों आदमी जय को पकड़े एक बड़े से हाल की ओर लिए जा रहे थे।
बीस फुट लंबा और पंद्रह फुट लंबा एक बड़ा सा हाल था। उसके एक किनारे एक लंबा चौड़ा मेज रखा हुआ था। किनारे किनारे सोफा और कुर्सियां करीने से रखी हुई थीं। उन कुर्सियों पर जालंधर शहर के मानी जानीं हस्तियां सफेद कुर्ता पाजामा पहने माथे पर लंबा सा तिलक लगाये गुपचुप बैठे हुए थे। बीच बीच में मुस्करा भी दिया करते थे। वहां पर रखा मेज फाइलों के बोझ तले दबा जा रहा था। उन्हीं फाइलों के बीच से माथे पर तिलक, गले में रामनामी दुपट्टा डाले बाबूजी ने अपना थोबड़ा बाहर निकाला। बाबूजी के सिर के बाल लगभग उजड़ा चमन हो चुका था, लेकिन उसकी भरपाई मुंछें पूरी कर दे रही थीं। वह हर समय सफेद वस्त्रों को ही धारण करते थे। बाबूजी बहुत बड़े धाॢमक किस्म के व्यक्ति थे। वे हर समय अपने जैसे ही धार्मिक लोगों के बीच घिरे रहते थे। यह बात अलग है कि इन धाॢमक लोगों पर लोग मुंह पीछे अपराधी और बलात्कारी होने का आरोप भी लगाते थे। लेकिन इन लोगों पर केस दर्ज होना तो दूर पुलिस पास तक फटकती नहीं थी। कुल मिला जुलाकर बाबूजी धर्म के ठेकेदारों से घिरे रहते थे। बाबूजी कुर्सी पर जब एक बार पसर जाते थे तो फिर जल्दी उठना नहीं चाहते, क्योंकि उनका अग्रभाग इस कदर बढ़ा हुआ था कि वह हमेशा बाहर आने को बेताब रहता था।
बाबूजी बिलकुल अलग किस्म के धार्मिक व्यक्ति थे। वह कभी भी अपनी जेब से दान नहीं करते थे। बल्कि उनके दान करने का तरीका ही कुछ अलग होता था। बाबूजी अखबार के दफ्तर में चपरासी, उपसंपादक और संपादक और अन्य कर्मचारियों के ऊपर जुर्माना लगाते थे। उस जुर्माने की रकम को धार्मिक कामों में लगाते थे। उनकी सबसे बड़ी जो महानता थी वह यह कि कर्मचारियों के खून पसीने से निचोड़े गये पैसों को सहीद फंड में भिजवा देते थे। इस शहीद फंड से जम्मू कश्मीर में हो रहे शहीद परिवारों के पास ट्रक के ट्रक रशद पहुंचाते थे। जिस समय रशद का ट्रक जाना होता था उस समय उपसंपादकों के कान खड़े हो जाते थे। बढ़ी हुई सेलरी और ओवर टाइम तो हर माह जुर्माने में कट जाता था। बाबूजी इन सबके बावजूद दया के मुॢत थे। इस बात का सबूत उस समय मिलता था जब किसी उपसंपादक के पास जुर्माने की रकम देने के लिए जेब में पैसे नहीं हुआ करते थे। उस समय उससे रजिस्टर पर साइन कराकर कर पीली या लाल पर्ची पकड़ा दिया जाता था और वह कैस देने से छुट्टी पा जाता था। अब तो आप सोच रहे होंगे कि ऐसे समय में जेब में पैसा न रहना ही अच्छा है। लेकिन आप इतने चालाक मत बन बनिए। हमारे महान बाबूजी ऐसे थोड़े महान और दया के मुर्ति थे। वह पैसा वेतन से सूद व्याज सहित काट लिया जाता था। ऐसा ही कुछ जय के भी साथ होने वाला था।
फाइलों के लगे ढेर के बीच से सिर को ऊपर उठाते हुए दया के मूर्ति बाबूजी ने लालच भरी निगाहों से जय को घूरते हुए कहा- की बात है पुत्तर? तूसी क्या काम है? बाबूजी यह जुर्माने की पर्ची नहीं काट रहा है? कह रहा है कि मेरी गलती नहीं है। मैनेजर ने जय का हाथ पकड़ कर उनके पास धक्का देते हुए कहा। तुम क्यों नहीं पर्ची कटा रहे हो। बाबूजी यह हेडिंग गलत नहीं है। आप भी इसको पढ़ लीजिए। जय ने रुआंसे स्वर में जवाब दिया। बाबूजी यह झूठ बोल रहा है। खबर और हेडिंग दोनों गलत है। चपरासी ने जल्दी से अखबार को हाथ में पकड़ाते हुए कहा। वह गलत कह रहा है तो गलत है। तुम पहले पर्ची कटाओ फिर जाओ। बाबूजी ने गुस्से से अखबार को एक तरफ फेंकते हुए कहा और फिर अपनी निगाहें फाइलों के बीच गड़ा दी। कितने की पर्ची कटवानी है? जय ने कहा। तुमने हमारा कीमती समय बर्बाद किया है। अब तुम्हें 300 रुपये की पर्ची कटवानी पड़ेगी। बाबूजी ने फाइलों के बीच खोए खोए ही जवाब दिया। लो पर्ची पर साइन करो। चपरासी ने पर्ची को आगे बढ़ा दिया। जय अभी पर्ची पर साइन कर ही रहा था कि बाबूजी ने कहा कि तुम काम करो तो आदमी बन जाओगे। हां बाबूजी मैं आदमी बनना चाहता हूं। जबसे यहां पर आया हूं, आदमी रहा ही नहीं। पर्ची हाथ में पकड़े पकड़े जय ने जवाब दिया। अब बताओ तुम क्या हो? तूसी अब फंस गये हो, तुम्हें बताना ही पड़ेगा कि तुम क्या हो। जय अपने आपको तत्काल संभाल लिया।। उसे समझ में आ गया कि यह खूसट बुड्ढा सबसे कहलवाता था कि कहो कि तुम गधे हो। जय गधा नहीं बनना चाहता था। लेकिन कुछ न कुछ तो उसे कहना ही था। जो आप हैं, वही मैं भी हूं। आप लोगों के बीच रह रहा हूं, वही बन गया हूं। उसने दोहराते हुए कहा कि जो आप हैं वही मैं हूं। जोर से बोलो तुम क्या हो? गधा हूं। जय ने गधा शब्द पर जोर देते हुए बोला। थेड़ी देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। बाबूजी जय का चेहरा एक टक देखे जा रहा था। उसका चेहरा तमतमा उठा। उसने चारो तरफ नजर दौड़ाते हुए कहा कि लड़का निडर है। हां बाबूजी यह निडर है। मैनेजर ने हां में हां मिलाया। देखो यह बात कंपनी में नहीं जानी चाहिए। किसी से भी मत कहना। मैनेजर की ओर नजर दौड़ाते हुए बाबूजी ने कहा। बाबूजी हम किसी से नहीं कहेंगे। मैनेजर, चपरासी और चीफ व्यूरों ने दोनों हाथों को जोड़े लगभग कांपते हुए कहा। लो बेटा बर्फी खाओ। बाबूजी ने बर्फी का डिब्बा आगे बढ़ाते हुए कहा। जय ने नियमानुसार मिठाई के डिब्बे में से तीन बर्फी निकाला और पीछे मुड़ गया। उस संस्थान का सबसे बड़ा नियम यह था कि जो 100 रुपये जुर्माना दे उसे एक पीस बर्फी और 300 रुपये देने पर तीन पीस बर्फी दिया जाता था।
जय पीछे मुड़ा नहीं कि उलटे पांव ऐसे भागा जैसे कि अभी अभी पुलिस कस्टडी से भागा हो। वह कंप्यूटर को ऑन किया और सबकुछ भूल कर खबरों की दुनिया में खो गया। कितने की पर्ची कटाए हो? एक उपसंपादक साथी ने सवाल किया। तीन सौ रुपये का। फिर वह काम में व्यस्त हो गया। यह कोई एक दिन की बात नहीं थी, बल्कि रोज ही किसी न किसी को जुर्माना देना ही पड़ता था। अभी वह पिछली बातें भूल भी नहीं पाया था कि वही चपरासी जिसका पढ़ाई से दूर दूर का रिश्ता नहीं था, पीली पर्ची लिए आ धमका। यह खबर तुमने क्यों नहीं लगाई? उसने जागरण अखबार हाथ में पकड़ाते हुए कहा। नहीं लगाई तो क्या? चलो छोटे बाबूजी बुलाए हैं। उसने सीट से उठाते हुए कहा। जय इस बार कोई बहस नहीं किया। क्योंकि बहस करने पर ही उसने 100 रुपये की जगह तीन सौ रुपये अभी अभी देकर आया था। चपरासी आगे-आगे और वह पीछे-पीछे चल दिया।
तुमसे यह खबर क्यों छूट गयी? छोटे बाबूने कहा। सर, यह खबर रिपोर्टर ने मेरे पास नहीं भेजा था। मुझे क्या मालूम कि शहर से 100 किलोमीटर दूर क्या हो रहा है। जय ने जवाब दिया। 200 की पर्ची काटो और चलो। छोटे बाबू ने लगभग झिड़कते हुए कहा। सर अब मैं पर्ची नहीं काट सकता। मेरी पूरी सेलरी ही जुर्माने में चली जाएगी, मैं पंद्रह दिन में बारह सौ रुपया जुर्माना दे चुका हूं। अब नहीं दे सकता। जय ने रोते हुए कहा। नहीं दे सकते तो सीढिय़ों से नीचे उतर जाओ। उसने पर्ची कटाई और रोते हुए वापस अपनी सीट पर आ गया। इस बार पैसा भी दिया और बर्फी भी नहीं मिली। क्योंकि छोटे बाबू जो जुर्माना लगाते थे, उसका बर्फी नहीं मिलता था। बर्फी शिर्फ बड़े बाबूूजी ही देते थे। वह कंप्यूटर पर बैठा-बैठा अपनी किशमत को रो रहा था कि कहां आ कर मैं फंस गया। यह सब इनशान नहीं बल्कि हैवान हैं। वह बहुत पहले ही चला जाना चाहता था, लेकिन क्या करे? घर जाने के लिए उसके पास पैसा ही नहीं बचता था। सेलरी तो सढ़े छह हजार थी, लेकिन जुर्माना और पीएफ काटने के बाद चार हजार रुपये हाथ में आते थे। जो मकान का किराया और रोटी में ही खत्म हो जाता था। पीएफ भी मात्र एक बहाना था। वह पैसा कहां जाता था, कुछ पता नहीं। उसका कोई प्रूफ नहीं भी नहीं था। जो लोग पांच छह सालों तक काम करते थे, उनमें से किसी किसी को पीएफ कार्ड दे दिया जाता था। एडिटोरियल हेड और मैनेजर अपनी पूरी ऊर्जा बाबूजी को खुश करने में लगा देते थे। वे लोग बारी बारी से सभी उपसंपादकों का जुर्माना जानबूझकर लगवाते थे। वे लोग इतने योग्य थे कि अन्य किसी अखबार में कोई उन्हें ट्रेङ्क्षनग में भी न रखे। लेकिन पंजाब के इस चर्चित अखबार में बतौर समाचार संपादक और मैनेजर थे। ऐसी घटनाएं अक्सर सभी के साथ होती थी। समाचार संपादक और मैनेजर भी जुर्माने से अछूते नहीं थे। जुर्माना इस लिए भी काफी आता था क्योंकि यहां पर प्रत्येक उपसंपादक से आठ घंटा ही नहीं बल्कि बारह-बारह घंटा गुलामों की तरह खटाया जाता था। ऊपर से प्रत्येक उपसंपादक से चार से लेकर आठ-आठ पेज बनवाया जाता था। सहुलियत शिफ इतनी थी कि पेज सेट करने के लिए एक पेजनेटर मिलता था।
एक दिन की घटना तो अभी तक नहीं भूला है। हुआ यूं कि जय एक दिन जालंधर सिटी डेक्स पर बैठा था। उसी समय बाबूजी ने उसको अपने पास बुलाया और हाथ से लिखा हुआ एक कागज पकड़ाते हुए कहा कि इसे चार नंबर पेज पर लीड बना लेना। अच्छी तरह से खबर बनाना, यह मेरी खबर है। वह खबर गीतावाटिका मंदिर के प्रधानगी के चुनाव के बारे में था। जय ने उस खबर को अच्छी तरह से पढ़ कर चार नंबर पेज की लीड बनवाने के बाद उस प्रूफरीडिंग भी करवाई। खबर चूंकि बाबूजी का था इसलिए उस खबर को काफी अच्छी तरह से पढऩे के बाद ही पेज पर लगाया गया। सुबह जब अखबार खोला तो उसमें प्रधानगी का चुनाव पांच को की जगह छपा था कि प्रधानमंत्री का चुनाव पांच को जय को फिर बाबूजी के सामने पेस होना पड़ा। तूसी तो बलंडर कर दिया है। मेरे पास पांच सौ लोगों का फोन आ चुका है कि कैसे लोगों को भर्ती किए हो। अब तुम्हें दो हजार रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। बाबूजी ने गुस्से में कहा। बाबूजी दो हजार रुपये कैसे? एक ही शब्द तो गलत है। बाकी अंदर सब ठीक है। एक शब्द का 100 रुपये ही हुआ। जय ने आत्मविश्वाश के साथ कहा। ठीक है 100 रुपये की पर्ची कटवाओ। बाबूजी फिर अपने काम मे व्यस्त हो गये। जय ने पर्ची कटवाया और नियमानुसार एक बर्फी उठाते हुए कमरे से बाहर हो गया। वह बाबूजी की मूर्खता पर काफी खुश था। उसे इस बात पर हंसी आ रही थी कि इस गधे को यह नहीं मालूम कि यह मात्र एक शब्द की गलती नहीं बल्कि एक प्रतिष्ठत अखबार के लिए बलंडर था। वह फिर अपने कामों में जुट गया और बहुत ही जल्द उस कालकोठरी से निकलने के बारे में सोचता रहा।

Thursday, August 5, 2010

आज का श्रवण या कुछ और...

जय प्रताप सिंह

आज का श्रवण इस समय लगातार मीडिया में मुख्य खबर बनता जा रहा है। दूसरे धर्मों के लोग फूल मालाएं लेकर उसके सम्मान को निकल पड़े हैं। लोग बड़ी-बडी़ खबरें छापने से लेकर भारी-भरकम लेखों पर अपनी कलम चला रहे हैं। चैनलों का तो मानों बहार आ गया है। इस पर गौर करने की बात है कि आखिर यह कौन सा समय है जब लोग इन सब मसलों पर अपना समय नष्ट कर रहे हैं? क्या आज के समय में हमारे पास शिर्फ यही एक खबर है? क्या हमारे सामने भूख, बीमारी और कर्ज के बोझ तले दबकर हो रही मौतें खबर नहीं हैं? क्या हम इन चीजों को ही बढ़ावा देना चाहते हैं? क्या वही इक्के-दुक्के लोग ही बचे हैं जो अपने मां-बाप से प्यार करते हैं, या कुछ और----? इस पर भी सोचने की जरूरत है। आदि, आदि।
जुलाई माह के अंतिम और अगस्त माह की शुरुआत से ही पूर्वी व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सड़कों पर एक तरफ सड़कों पर कंधे में कांवड़ लिए तथा दूसरी ओर अपनी रोजी-रोटी के लिए, जिनके पास नौकरी करके अपने मां-बाप और बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने का और कोई साधन नहीं है, के बीच कांवड़ ही सबसे महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। लोग भी इसे सकारात्मक रूप में सराह रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि कुछ नौजवानों को तो श्रवण कुमार बनने की हसरत भी है, जिनमें इक्के-दुक्के लोग श्रवण कुमार की तरह अपने कंधे पर जुआ लटकाए दोनों तरफ अपने मामा-पिता को बैठा कर लिए जाते हरिद्वार तक कांवड़ भरने जाते हैं। लोगों की निगाह उन्हीं नौजवानों पर टिक जाती हैं। उनके सामने बाकी सभी कुछ गौड़ हो जाता है। लोगों को यह कहते हुए भी सुना जाता है कि 'देखो! वह अपने माता-पिता को कितना प्यार करता है।Ó लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता, इसे चाहे बेवकूफी कहें या अपने मां-बाप के प्रति अमानवीय या कुछ और....। मैं कहना यह चाहता हूं कि क्या वह बेटा अपने मां-बाप को प्यार नहीं करता है जो दिन भर मजदूरी करने के बाद शाम को अपने भूखे व बीमार मां-बाप और बच्चों के लिए भात, रोटी नमक और तरकारी का इंतजाम करता है? या वह नौजवान जो अपनी बीबी बच्चों की दवा और दो वक्त की रोटी कमाने में ही अपनी जिंदगी तबाह कर देता है, लेकिन न चाहते हुए भी अपने बूढ़े मां-बाप के साथ चंद समय भी नहीं निकाल सकता। यदि निकाल भी ले तो दूसरे दिन उसकी नौकरी पर भी तलवार लटकती दिखाई देती है। क्या इसको बढ़ावा देने से हजारों, लाखों नौजवानों ताने नहीं सुनने पड़ेंगे।
यह सब तो कुछ उसी तरह से है जब शाहजहां ने नुरजहां से इस कदर प्यार करता था कि उसकी मौत के बाद उसने आगरे का ताजमहल बनवा दिया। इसका मतलब तो यही हुआ कि शाहजहां ही एक ऐसा शख्श था जो प्यार करता था। बाकी लोग तो शिर्फ ढकोसला करते हैं। और हम भी उसी बहाव में बह जाते हैं। क्या हम यह नहीं सोच सकते कि शाहजहां का प्यार ही मात्र प्यार नहीं है बल्कि ऐसे लाखों लोगा हैं जो एक-दूसरे से इस कदर प्यार करते हैं कि एक-दूसरे के दुख तकलीफों में शेयर करते-करते अपनी जान तक दे देते हैं। लेकिन वह शाहजहां जैसे सुलतान या राजा नहीं थे कि ताजमहल बनवा सकें।
ठीक इसी तरह इक्के-दुक्के को छोड़ कर लाखों नौजवान ऐसे हैं जो अपने माता-पिता को इस कदर प्यार करते हैं कि उन्हें हरिद्वार ही क्या पूरे देश का सैर करवा सकें, लेकिन उनके सामन रोटी का संकट इस कदर हाबी होता है कि वे सैर कराना तो दूर उनके पास दो दिन रुकने का भी समय नहीं निकाल सकते। यदि दो दिन काम पर न जाएं तो मालिक काम पर से निकाल कर इस कदर फेंक देगा कि जैसे दूध से मख्खी।
वहीं दूसरी ओर पूरा का पूरा हाईवे जाम कर दिया जाता है जिससे आवागमन भी बाधित होता है। लोगों को फैक्टरी, कारखानों तथा कार्यालयों में पहुंचने के लिए भी घंटों की दूरियां तय करनी पड़ती हैं। यदि किसी को दवा इलाज के लिए कहीं बाहर जाना हो तो वह कांवड़ लौटने तक इंतजार करे या यमराज से बिनती करे कि भाई कुछ दिन का समय और दे दो फिर हम दवा करवा लेंगे। नहीं तो यमराज के पास जाने का रास्त तो हर समय खाली ही रहता है। वहां पर कोई भी जाम की स्थिति नहीं है। सोचने की बात यह है कि आज हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या रोजी-रोटी की है। दिन दूना रात चौगुनी की तरह महंगाई बढ़ती जा रही है। लोगों का जीना दूभर है। लोगों के पास यदि आमदनी 100 रुपये है तो खर्चा 150 रुपये। लेकिन सरकार को इन सबसे क्या लेना-देना है। उसके लिए तो सबसे जरूरी है इस समय धाॢमक मामलों में सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च पानी की की तरह बहा देना। इस तरह अरबों रुपये पानी की तरह बहाने के लिए सरकार के पास पैसों की कमी नहीं है लेकिन यदि महंगाई को कम करने की बात करें तो देश की हालत ही गंभीर हो जाती है। यह है हमारे देश की स्थिति। ऐसे समय में एक बेहतर ङ्क्षजदगी जीने के लिए हमें क्या करना होगा, इसके बारे में हमें सोचने की जरूरत है। यदि सबकुछ इसी तरह चलता रहा तो आने वाला समय कितना भयावह होगा सहज ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

Friday, July 30, 2010

शशि प्रकाश मेरे आदर्श थे !

हमने महसूस किया कि शशि प्रकाश का शातिर दिमाग पुनर्जागरण-प्रबोधन की बात करते हुए प्रकाशन और संस्थानों के मालिक बनने की होड़ में लग गया और हमलोग उसके पुर्जे होते गए.मेरा साफ मानना है कि शशि प्रकाश को हीरो बनाने में कुछ हद तक कमेटी के वे साथी भीजिम्मेदार रहे हैं जिन्होंने सब कुछ समझते हुए भी इतने दिनों तक एक क्रांति विरोधी आदमी का साथ दिया.
जय प्रताप सिंह
रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया एक कम्पनी है जो शहीदे आजम भगत सिंह नाम पर युवाओं को भर्ती करती है.इसके लिए कई तरह के अभियानों का नाम भी दिया जाता है. उदाहरण के लिए 'क्रांतिकारी लोग स्वराज अभियान. कार्यकर्ता चार पेज का एक पर्चा लेकर सुबह पांच बजे से लेकर रात 8बजे तककालोनियों, मोहल्लों, ट्रेनों, बसों आदि में घर-घर जाकर कम्पनी के मालिक माननीय श्री श्री शशि प्रकाश जी महाराज द्वारा रटाए गये चंद शब्दों को लोगों के सामने उगल देते हैं । लोग भगत सिंह के नाम पर काफी पैसा भी देते हैं। पैसा कहां जाता था यह सब तो ईमानदार कार्यकर्ताओं के लिए कोई मायने नहीं रखता था लेकिन इतना तो साफ था कि पारिवारिक मंडली ऐशो आराम की चीजों का उपभोग करती थी । उदाहरण के लिए लखनऊ और दिल्ली केपाश इलाके में रहने, और उनके बेटे जिन्हें भविष्य के लेनिन के नाम से नवाजा जाता था, उसके लिए महंगा से महंगा म्यूजिक सिस्टम, गिटार आदि उपलब्ध कराया जाता था।
इसी संगठन के एक हिस्सा थे कामरेड अरविन्द जो अब नहीं रहे। अरविंद एक अच्च्छे मार्क्सवादी थे, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी संगठन का मुखर विरोध नहीं करते थे,जो उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। अरविंद चूंकि जन संगठनों से जुड़े हुए थे और जनसंघर्षों का नेत्रृत्व भीकरते थे इसलिए कार्यकर्ताओं के दिल की बात को बखूबी समझते थे। कभी-कभी शशि प्रकाश से हिम्मत करके चर्चा भी करते थे। लेकिन शशि प्रकाश के पास से लौटने के बाद अरविंद उन्हीं सवालों को जायज कहते जिन संदेहों पर हमलोग सवाल उठाये होते. हालाँकि वह बातें उनके दिल से नहीं निकलती थी क्योंकि ऐसे समय में वह आंख मिलाकर बात नहीं करते थे। और फिर लोगों से उनके घरपरिवार और ब्यक्तिगत संबंधों की बातें करने लग जाते थे।
बाद में पता चला कि शशि प्रकाश और कात्यायनी के सामने अरविंद जब संगठन की गलत लाइन पर सवाल उठाते हुए कार्याकर्ताओं के सवालों को अक्षरश:रखते थे तो शशिप्रकाश इसे आदर्शवाद का नाम देकर उनकी जमकर आलोचना करते। उसके ठीक बाद अरविन्द को बिगुल, दायित्ववोध पत्रिकाओं के लिए लेख आदि का काम करने में शशि प्रकाश लगा देते.
वैसे एक बात बताते चलें कि इस दुकान रूपी संगठन में जब भी कोई साथी अपना स्वास्थ्य खराब होने की बात करता तो उसे उसकी ऐसे खिल्ली उड़ाई जाती थीकि वह दोबारा चाहे जितना भी बीमार हो उल्लेख नहीं करता था। इस संगठन में आराम तो हराम था। शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि दिन रात काम करते रहने के कारण साथी अरविंद का शरीर रोगग्रस्त हो गया। दवा के नाम पर मात्र कुछ मामूली दवाएं ही उनके पास होती थीं। इससे अधिक के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे क्योंकि महंगे अस्पतालों में जा कर इलाज कराने का अधिकारतो शशि प्रकाश एंड कम्पनी को ही था।
जवाब दीजिये: हिंदी कवयित्री का सांगठनिक चरित्र
शशि प्रकाश के आंख का इलाज अमेरिका में होता था। सबसे दु:ख की बात तो यह थी कि इस क्रांति विरोधी आदमी के इलाज में जो पैसा खर्च होता था वह उन मजदूरों का होता था जो अपनीरोटी के एक टुकड़ों में से अपनी मुक्ति के लिए लड़े जा रहे आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करते थे।
जहां-जहां अरविंद ने नेत्रृत्वकारी के रूप में काम किया, वहां-वहां सेउन्हें मोर्चे पर फेल हो जाना बताते हुए हटा दिया गया। अंत में उन्हें गोरखपुर के सांस्कृतिक कुटीर में अकेले सोचने के लिए पटक दिया गया। यहां तक कि उस खतरनाक बीमारी के दौरान जब किसी अपने की जरूरत होती है उस समयसाथी अरविंद अकेले उस मकान में अनुवाद कर रहे थे और दायित्वबोध और बिगुल के लिए लेख लिख रहे थे। उधर उनकी पत्नी मीनाक्षी दिल्ली के एक फ्लैट में रहकर युद्ध चला रही थीं। उन्होंने दिल्ली का फ्लैट छोड़कर अरविन्द के पास आना गवारा नहीं समझा या फिर शशि प्रकाश ने उन्हें अरविन्द के पासजाने नहीं दिया। यहां तक की किसी अन्य वरिष्ठ साथी तक को साथी अरविन्द के पास नहीं भेजा। जिस समय हमारा साथी अल्सर के दर्द से तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहा था उस समय उनके पास एक-दो नये साथी ही थे। इन सब चीजों पर अगर गौर करें तो शशि प्रकाशको अरविन्द का हत्यारा नहीं तो और क्या कहा जाएगा?
मेरा मानना है है कि शशि प्रकाश ने बहुत सोच-समझकर अरविन्द को धीमी मौत के हवाले किया था.क्योंकि वरिष्ठ साथियों और संगठनकर्ता में वही अब अकेले बचे थे। और सही मायने में उनके पास मजदूर वर्ग के बीच के कामों का शशि प्रकाश से ज्यादा अनुभव था।
मैं भी इस संगठन में 1998 से लेकर 2006 तक बतौर होलटाइमर के रूप में काम किया हूं। इस दौरान संगठन की पूरी राजनीति को जाना और समझा भी। हमने महसूस किया कि शशि प्रकाश का शातिर दिमाग पुनर्जागरण-प्रबोधन की बात करते हुए प्रकाशन और संस्थानों के मालिक बनने की होड़ में लग गया और हमलोग उसके पुर्जे होते गए. मेरा साफ मानना है कि शशि प्रकाश को हीरो बनाने में कुछ हद तक कमेटी के वे साथी भीजिम्मेदार रहे हैं जिन्होंने सब कुछ समझते हुए भी इतने दिनों तक एक क्रांति विरोधी आदमी का साथ दिया.
ऐसे साथियों का इतने दिनों तक जुडऩे का एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जिस मध्यवर्गीय परिवेश से आये थे वह परिवेश ही रोके रहा हो. शशि प्रकाश के शब्दों में-हमें सर्वहारा के बीच रह कर सर्वहारा नहीं बन जाना चाहिए बल्कि हम उन्हे उन्नत संस्कृति की ओर ले जाएंगे। इसके लिए कमेटी व उच्च घराने से आये हुए लोगों को ब्रांडेड जींस और टीशर्ट तक पहनने के लिए प्रेरित किया जाता रहा है। ऐसा इसलिए कि शशि प्रकाश और कात्यायनी भी उच्च मध्यवर्गीय जीवन जी रहे थे। कोई उन पर सवाल न उठाए इसलिए कमेटी के अन्य साथियों के आगे भी थोड़ा सा जूठन फेंक दिया जाता रहा है। कई कमेटी के साथी शशि प्रकाश और उनके कुनबे के उतारे कपड़े पहनकर धन्य हो जाते थे। यह रोग आगे चल कर ईमानदार साथियों में भी घर कर गया और वे सुविधाभोगी होते गये।
यह भी एक सच्चाई है कि किसी को अंधेरे में रख कर गलत रास्ते पर नहीं चला जा सकता। यही कारण रहा कि शशि प्रकाश को जब भी लगा कि अब तो फलां कार्यकर्ता या कमेठी सदस्य भी सयाना हो गया और हमारे ऊपर सवाल उठाएगा तो उन सबको किनारे लगाने का तरीका अख्तियार किया। इतना तो वह समझ ही गए थे कि इन लोगों को इस कदर सुविधाभोगी बना दिया है कि अपनी सुविधाओं को ही जुटाने में लगे रहेंगे.
शशि प्रकाश इस बात को जीतें हैं कि समाज के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों में ख्याति तो ही गयी है,लोग आते रहेंगे, दुकान से जुड़ते रहेंग। रही बात कार्यकर्ताओं की तो वे चाहे ज्यादा दिनों तक रुकें या न रुकें फिर भी जितना दिन रुकेंगे भीख मांग कर लाएंगे ही और उसकी झोली भरकर चले जाएंगे। कुल मिला कर शशि प्रकाश एंड कंपनी अपनी सोच में कामयाब हो गयी है।
इसमें मैं भी अपने आप को साफ सुथरा नहीं मानता क्योंकि जब यह संगठन इतना ही मानव द्रोही था तो इतने दिनों तक मैंने काम ही क्यों किया? मैं भी सिद्धार्थ नगर जिले के ग्रामीण परिवेश से आया और भगत सिंह की सोच को आगे बढ़ाने के नाम पर देश में एक क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करने के लिए काम में जुट गया। इसके लिए मैंने ज्यादा पढऩा लिखना उचित नहीं समझा। मुझे यहशिक्षा भी मिली कि पढऩा लिखना तो बुद्धिजीवियों का काम है। हमें संगठन के लिए अधिक से अधिक पैसा जुटाना और युवाओं को संगठन से जोडऩा है। और मैंइसी काम में लग गया। मुझे संगठन की ओर से घर भी छोडवा़ दिया गया और मर्यादपुर में तीन सालों तक रहकर देहाती मजदूर किसान यूनियन,नारी सभा औरनौजवान भारत सभा के नाम पर काम करने के लिए लगा दिया गया। पीछे के सारे रिश्ते नाते एवं घर परिवार से संगठन ने विरोध करवा दिया जिससे कि हम बहुत जल्द वापस न जा पाएं। यही नहीं बल्कि अपना घर और जमीन बेचने के लिए अपने ही पिता के खिलाफ कोर्ट में केस भी लगभग करवा ही दिया गया था। लेकिन पता नहीं क्यों (शायद मैं अभी पूरी तरह उसकी गिरफ्त में नहीं आया था),मेरा मन ऐसा करने को नहीं हुआ।
मैं शशि प्रकाश को ही आदर्श मानता था। मुझे यह शिक्षा दी गयी थी कि भाईसाहब दुनिया में चौथी खोपड़ी हैं। मेरे अंदरयह सवाल कई बार उठा कि जब यह चौथी खोपड़ी हैं तो प्रथम, दूसरी और तीसरी खोपड़ी कौन है? बाद में पता चला कि पहली खोपड़ी मार्क्स थे,दूसरी लेनिन,तीसरी खोपड़ी माओ थे। अब माओ के बाद तो कोई हुआ नहीं। इसलिए चौथी खोपड़ी भाई साहब हुए न।
भाईसाहब कहते थे कि वही एक क्रांतिकारी संगठन है। बाकी तो दुस्साहसवादी और संशोधनवादी पार्टियां हैं। लेकिन सब्र का बांध तो एक दिन टूटना ही था। जो आप के सामने है। यदि इन सबके बावजूद कहीं कोने में भी इस मानव विरोधी संगठन को सहयोग देने के बारे में आप में से कोई सोच रहा है तो उसे बर्बाद होने से कौन रोक सकता है?

Tuesday, July 20, 2010

भीख मांगते वनवासी

-अनिल दूबे, जौनपुर
पिछले दिनों जब मैं उत्तर प्रदेश स्थित जौनपुर जिले के अंतर्गत सुजानगंज के भुइधरा गांव लौटा तो वहां की स्थिति देखकर दंग रह गया। ब्राह्मण बाहुल्य इस गंाव में कई अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं, जो इस व्यथा को दर्शाता है कि जाति सदैव कर्म से जुड़ी होती है। आप सिर्फ अपनी जाति द्वारा किया गया कार्य ही कर सकते हैं। खैर बढ़ती जनसंख्या एवं घटते संसाधनों ने अधिकतर नौजवानों को बड़े शहरों में जाकर कमाने के लिए मजबूर कर दिया है। गांवों में बस बूढ़े मां-बाप ही बाकी बचे हैं। इसी गांव में एक जाति है वनवासी, हालांकि उन्हें मुसहरा के नाम से भी पुकारा जाता है। गांव में बिजली, सड़क, परिवहन, विद्यालय आदि का विकास हुआ या नहीं, यह नहीं कह सकते लेकिन एक कार्य अवश्य देखने को मिला है कि पहले जहां शादी या भोज के अवसर पर लोग पत्तलों में भोजन करते थे और मिट्टी के कुल्हड़ों में पानी पीते थे। वहीं अब बाजार से खरीदे गए प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ढाक एवं बरगद के पत्तों से पत्तल बनाने वाले बनवासियों के जीवन पर संकट के बादल छा गये हैं। ऐसे बादल जो शायद इस जाति के समाप्त होने पर ही हटेंगें।
एक माह पूर्व मैं सुजानगंज स्थित एक मंदिर में अपनी माताजी के साथ दर्शन के लिए गया था। मंदिर से निकलते ही सीढिय़ों पर बैठा भीखरियों का हुजूम हमारी ओर बढ़ता चला आया। मैं जैसे ही दो कदम आगे को बढ़ाया कि भिखारियों का एक परिवार जिसमें दो औरतें एक बूढ़ा और दो बच्चे हमारी तरफ आये। माताजी ने उनसे कहा कि फूटकर पैसे समाप्त हो गये हैं। इस पर एक भिखारी ने कहा कि आपने हमें पहचाना नहीं, हम आपके गांव के बनवासी हैं। माताजी ने दस रुपये के सिक्के को उन्हीं लोगों के बीच में बांट दिया।
जब परिवार के अन्य सदस्य अन्य समानों की खरीदारी में लगे हुए थे, उस समय मैंने उनसे उनकी समस्या को जानने की कोशिश की। जो कुछ उन्होंने बताया उसे सुनकर बड़ा अचंभा हुआ।
उन्होनें बाताया कि अपने पूर्वजों की तरह ढाक एवं बरगद के पत्तों से पत्तल बनाने, खलिहानी खत्म होने पर खेतों में पड़े अन्न को बीनने एवं भोज कार्य में कुत्तों से भोजन छीन कर जीवन निर्वाह करते थे। इसमें सबसे मुख्य कार्य पत्तल बनाकर बेचना था जिसमें 20 से 25 रुपये में 100 पत्तल और दोने दिये जाते थे, लेकिन पिछले दो सालों में शहर की हवा गांवों में पहुंच चुकी थी। लोग पत्तलों की बजाय प्लास्टिक के बर्तनों, जो 200 रुपये सैकड़ा था, का प्रयोग करना शुरू कर दिया। ऐसे में बनवासियों के दोने और पत्तल कौन खरीदता। जिसका सीधा असर उनके वर्तमान स्थिति से जुड़ा था। चूंकि बनवासी होने के कारण वे अन्य कार्य करने के लिए निषेध थे। गरीबी और भुखमरी के कारण उनके बच्चे कुपोषण के शिकार हो गये या असमय बूढ़े हो गये। वे काम की तलाश में आसपास के शहरों में पलायन कर चुके हैं। पिछे रह गये घर के बुजुर्ग, औरतें और बच्चे जो अब मंदिरों या गलियों में भीख मांग कर अपना तथा अपने परिवार का पेट भर रहे हैं।
जो सबसे बड़ा प्रश्न है वह यह है कि बनवासीयों की व्यथा के लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, प्रशासन या हम सभी। वैसे तो हम सभी शामिल हैं। बनवासी हमसे कुछ नही मांगते और न ही हमे दोष देते हैं। वे अपने बच्चों के लिए शिक्षा और बीमारी से मर रहे बुजुर्गों के लिए दवाइया व ईलाज पैसे भी नहीं मांगते। उन्हें सिर्फ पेटभर भोजन चाहिए, क्यों न दिन में एक बार ही मिले। लानत है, इस व्यवस्था, प्रशासन और समाज पर जो उन्हें पेट भर भोजन मुहैया नहीं करा सकता। मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि कल अगर मेरे अपने गांव से एक और नक्सलबाड़ी आंदोलन का उदय होता है, क्योंकि हमारी आदत बन चुकी है कि जब तक हमें चोट नहीं लगती तब तक हमें दूसरों के दर्द का एहसास नहीं होता, जब तक हमारे कान में कोई जोर से न चिल्लाये हमें सुनाई नहीं देता। हम सो नहीं रहे, सोने का नाटक कर रहे हैं। हम देख नहीं पा रहे बल्कि हम देखना नहीं चाहते। अब भी समय है हम नहीं चेते तो बहुत देर हो जायेगी। इस जाति व्यवस्था के चक्कर में हम एक जनजाति की बली नहीं ले सकते। किसी भी तरह गांव के लोगों को समझना होगा कि प्लास्टिक का बर्तन न केवल बनवासियों के जीवन पर मृत्यू बनकर छाया है बल्कि पर्यावरण के लिए भी घातक है। बनवासियों हिम्मत मत हारना, हमे तुम्हारी आवष्कता है, कोशिश जारी है। तबाही की गर्त में जाने वाले अकेले तुम ही नहीं हो बल्कि हम सभी हैं। यह व्यवस्था खुद-ब खुद हमें तबाही गर्त की ओर ले जाने का प्रयास कर रही है। हमें इस व्यवस्था, इस समाज को ही बदलना होगा।