Sunday, February 13, 2011

फुटपाथ (एक प्रेम कहानी)

Jai Pratap Singh
मै फुटपाथ हूं। शायद आप चलते वक्त मेरे बारे में जानना नहीं चाहते कि मै कब और कैसे पैदा हुआ? लेकिन मै जानता हूूूूं, आपके बारे में वह सबकुछ जिसके बारे में आप सोचते हैं कि किसी को नहीं पता। यहां तक की आपके जूते के नम्बर भी। जूतों की ठोकरों से पैदा हुए दर्द को भी मै बखूबी महसूस करता हूं। उन तमाम भूखे प्यासे बेघर लोगों के दुख दर्द पर दो-चार आँसू भी बहाता हूं, भले वह मूक ही सही। इसके बावजूद मै एक फुटपाथ हूं। और तो और, मै मोहल्लों से लेकर सभी शहरों में मौजूद हूं, चाहे वह छोटा शहर हो या बड़ा। सभी जगहों पर मै निराश्रितों को आश्रय देता हूं और उनका दुख-दर्द बांटता हूं। अब बेसब्री से मै उनका इंतजार कर रहा हूं।
लालिमा लिए सूरज की किरणें जैसे ही पश्चिम में विलीन होतीं, रात्रि की बेला पूरे शहर को अपने आगोश में समेट लेती। अंधेरा होते ही शहर की बत्तियां जल उठतीं और सबकुछ प्राशमय हो जाता। मै यह सोचकर आनन्दविभोर हो उठता कि अब कुछ पल ही सही, मेरा अपनों का साथ होगा।
रात काफी बीत चुकी थी। छोटी-मोटी दुकाने कभी का हटा ली गई थीं। बीरान पड़ा मै पलकपावड़े बिछाए अपने मेहमानों का इंतजार कर रहा था। मेरे मेहमान भी निराले थे। वे भारी-भरकम गाडिय़ों से नहीं आते और न ही बहुत शेरशराबा ही करते थे। कोई टाट लटकाए तो कोई अखबार लेकर आता, धूल-मिट्टी को झाड़ता और उसे मेरे ऊपर बिछाकर लम्बलेट हो जाता। जब वह हाथ से मिट्टी को झाड़ रहा होता तो ऐसे महसूस होता जैसे कि मेरी प्रेमिका मेरे पीठ हाथ फेर रही हो और बालों में उंगलियों को घुमाते हुए कह रही हो कि तुम चिंता मत करो। मै आ गई हूं, अब सभी दु:ख दर्द को बांट लुंगी। उस समय मेरे आँखों से खुशी के दो बूंद आँसू टपक पड़ते। इन थके-हारे मेहनतकशों को आश्रय देने में मुझे काफी शुकून मिलता।
लोग भले ही अलग-अलग जाति धर्म के हों, लेकिन वे मेरे लिए बस फुटपाथी थे। उनके लिए मै स्वर्ग के समान था। इतने बड़े शहर में इन अभागों को जब कहीं आश्रय नहीं मिलाता तो उस समय चेहरे पर मुश्कान लिए दोनों हाथों को फलाकर मै कहता- आओ! निराश्रितों, मेहनतकशों और मेरे प्यारे लाडलों! तुम्हारा स्वागत है। रात होते ही मोटरों के भोंपू बजना बंद हो जाते। इक्के-दुक्के माल ढोने वाले ट्रक रुक-रुक कर भोपू बजाने से बाज नहीं आते। फिर भी दिन भर के चिल्ल-पों से तो कम ही होता। धेरे-धीरे मेहमानों की जमघट लगनी शुरू हो जाती। इसके बाद शुरू होता नोंकझोंक। ''यह मेरा जगह है, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आसन जमाने की। फुटपाथ किसी की बपौती नहीं है। मैं यहां एक महीने से सोता चला आ रहा हूं और तुम मेरी जगह पर कब्जा जमाने की फिराक में हो।ÓÓ पहले ने नाक-भौंह सिकोड़ते हुए कहा और दोनों भिड़ गये। नया आदमी वहीं पर खड़े खड़े बड़बड़ाए जा रहा था। 'आज मुझसे देर रात तक काम करवाया है। खाने के लिए पैसा मांगा तो वह खूसट मालिक ने दिहाड़ी का पैसा ही नहीं दिया। उल्टे दो-चार गालियां शौगात में दे दीं। भूख के मारे  पेट में दर्द हो रहा है।ÓÓ ''आ बैठ, रूखा-सूखा तू भी खा ले।ÓÓ पहले ने थैले में से दो रोटियां निकाली और उसकी ओर बढ़ा दिया। दोनों एक साथ बैठ कर भूखे भेडि़ए की तरह रोटी पर टूट पड़े। यह सब देखकर मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ। उल्टे मुझे हंसी आ गई।
यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी बल्कि रोज-ब-रोज लोग आपस में लड़ते-झगड़ते और कुछ ही समय बाद एक-दूसरे से अपने दु:ख-दर्द को बांटते हुए घंटों चर्चा करते और बीड़ी सुलगाकर धूएं का गुबार छोड़ते। दिन भर की थकान के बाद जब ठंडी-ठंडी पछुआ हवा बहनी शुरू होती तो उन्हें स्वर्ग जैसी अनुभूति होती। कुछ ही देर बाद आपस में हो रही वार्तालाप और लड़ाई-झगड़ा और खर्राटों में बदल जाती। उनकी चिल्लपों और खर्राटों से मुझे काफी शुकून मिलता। मुझे इनसे कोई शिकवा शिकायत नहीं थी। अगर थी तो मेरे ऊपर दिन भर खड़े वाहनों से, जो बेजान-सी पड़ी रहतीं ओर जिनके बोझ तले पूरा दिन मै दबा रहता।
बीरान हो जाने के बाद मुझे तबतक चैन नहीं मिलता जब तक कि मेरे मेहमान नहीं आ जाते। उसमें से अगर किसी दिन कोई नहीं दिखता तो काफी देर तक मै किसी खतरे की आशंका से सोच में पड़ जाता। ऐसा तबतक होता जब तक कि देर रात या दूसरे दिन वह दिखाई नहीं दे जाता। उनके आते ही मै पार्किंग में खड़े वाहनों के बोझ तले दबे रहने के बावजूद काफी खुश रहता और मन ही मन लोरी गा-गाकर उन्हें सुलाता और खुद जागता रहता।
उस समय मै गुस्से से तमतमा उठता जब डंडा फटकारते हुए कोई सिपाही आता और एक-एक के ऊपर डंडा बजाता, दो-चार गालियां देता और जो कुछ भी जेब में होता, उसे लेकर चल देता। उस समय सिपाही ऐसे अकड़ कर चलता जैसे कि मानों यह उसका अधिकार है। सिपाही को देखते ही सारे लोग आतंकित हो जाते और टकटकी लगाए मुझे देखते रहते। जैसे कि मानों कह रहे हों- मेरे आश्रयदाता! काश, तुम इस महाकाल से भी मुझे बचा सकते। मुझसे यह सब देखा नहीं जाता। खून का घूंट पीकर बेजान मिट्टी की तरह पड़ा रहता और उनपर ढाए जा रहे अत्याचार को मूक बन कर देखता रहता।
सिपाही के वापस जाने के देर रात तक उनकी दर्दनाक कराहने और सुबक-सुबक कर रोने की आवाज सुनता और अपने आप पर गुस्सा करता। मै इनको आश्रय दे सकता हूं तो इनकी हिफाजत भी करनी चाहिए। लेकिन मै ऐसा नहीं कर पाता। आखिर क्यों? मै इसी उधेड़बुन में पूरी रात लगा रहता।
सूरज की किरणों के बिखरने के साथ ही लोग अपने फटे-पुराने चीथड़ों को उठाते, धूल झाड़ते और चल देते। मै उन्हे जाते हुए देखता रहता और उन्हें रोकने का प्रयास करता। लेकिन अपने में खोए चले जाते। एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखते। मै एकटक अपने मेहमानों को जाते हुए देखता रहता। फिर शुरू होता भारी भरकम वाहनों के पहियों का बोझ और जूतों की ठोकरों से पैदा हुआ दर्द। इसके बावजूद मै खुशी-खुशी यह सब वर्दाश्त कर लेता, क्योंकि दिन ढलते ही दुनियाभर का दर्द झेल रहे अपने जैसों का साथ होगा। उनको आश्रय दुंगा और मूक ही सही अपना दु:ख-दर्द बयां करुंगा। 
                - जय प्रताप सिंह
            मोबाइल- 9005919184

2 comments:

  1. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें. यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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  2. बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना, मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
    यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके., हो सके तो फालोवर बनकर हमारा हौसला भी बढ़ाएं.
    मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

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